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उत्तर-पूर्व भारत में बाढ़ नियंत्रण को मिलेगी नई मजबूती, केंद्र ने बाढ़ प्रबंधन पर बढ़ाए प्रयास
केंद्र सरकार ने संसद में जानकारी दी है कि उत्तर-पूर्व भारत में बाढ़ और नदी कटाव की समस्या से निपटने के लिए बड़े स्तर पर काम किया जा रहा है। बाढ़ प्रबंधन एवं सीमावर्ती क्षेत्र कार्यक्रम (FMBAP) के तहत मार्च 2026 तक 263 परियोजनाओं के लिए 2,536.96 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता दी गई है। केंद्रीय जल आयोग 360 बाढ़ पूर्वानुमान केंद्रों के माध्यम से 24 घंटे पहले चेतावनी जारी कर रहा है, जबकि नई प्रणाली के जरिए 7 दिन पहले तक बाढ़ की एडवाइजरी भी उपलब्ध कराई जा रही है। सरकार ने फ्लड प्लेन जोनिंग, आधुनिक तकनीक, पड़ोसी देशों के साथ डेटा साझा करने और ब्रह्मपुत्र बोर्ड के 52 मास्टर प्लान के जरिए उत्तर-पूर्व में बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करने की दिशा में कई अहम कदम उठाए हैं।
Anshuman Mishra03 अग. 2026, 06:53 PM IST

हर वर्ष मानसून के दौरान उत्तर-पूर्व भारत के असम, अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा जैसे राज्य भीषण बाढ़ और नदी कटाव की समस्या का सामना करते हैं। इन राज्यों में बाढ़ केवल प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका, कृषि, सड़क संपर्क और बुनियादी ढांचे के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाती है। इसी बीच केंद्र सरकार ने संसद में जानकारी देते हुए बताया है कि उत्तर-पूर्व क्षेत्र में बाढ़ नियंत्रण, कटाव रोकने और बेहतर पूर्वानुमान प्रणाली को मजबूत करने के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं।
जल शक्ति मंत्रालय के अनुसार बाढ़ प्रबंधन और कटाव-रोधी परियोजनाओं का क्रियान्वयन संबंधित राज्य सरकारें अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार करती हैं, जबकि केंद्र सरकार "बाढ़ प्रबंधन एवं सीमावर्ती क्षेत्र कार्यक्रम" (Flood Management and Border Areas Programme - FMBAP) के माध्यम से राज्यों को तकनीकी मार्गदर्शन और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराती है। इस योजना के तहत बाढ़ नियंत्रण, नदी तटों के कटाव को रोकने, जल निकासी व्यवस्था विकसित करने तथा समुद्री तटीय कटाव से सुरक्षा जैसे कार्यों के लिए सहायता दी जाती है।
सरकार ने बताया कि इस कार्यक्रम के तहत मार्च 2026 तक सिक्किम सहित पूरे उत्तर-पूर्व क्षेत्र में 263 बाढ़ प्रबंधन परियोजनाओं के लिए कुल 2,536.96 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता प्रदान की जा चुकी है। यह निवेश उन क्षेत्रों में किया गया है जहां हर वर्ष बाढ़ के कारण भारी जन-धन की हानि होती है।
बाढ़ से निपटने के लिए केवल बांध और तटबंध ही पर्याप्त नहीं हैं। आधुनिक तकनीक की मदद से समय रहते चेतावनी देना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इसी उद्देश्य से केंद्रीय जल आयोग (CWC) देशभर में 360 बाढ़ पूर्वानुमान केंद्रों के माध्यम से चेतावनी जारी कर रहा है। इनमें 159 इनफ्लो (जल प्रवाह) पूर्वानुमान केंद्र और 201 जलस्तर पूर्वानुमान केंद्र शामिल हैं। उत्तर-पूर्व क्षेत्र में अकेले 53 केंद्र कार्यरत हैं, जिनमें 15 इनफ्लो और 38 जलस्तर पूर्वानुमान केंद्र शामिल हैं। इन केंद्रों के माध्यम से स्थानीय प्रशासन को 24 घंटे पहले तक बाढ़ का पूर्वानुमान उपलब्ध कराया जाता है, जिससे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने और राहत कार्य शुरू करने के लिए अतिरिक्त समय मिल सके।
इसके अलावा केंद्रीय जल आयोग ने वर्षा और नदी प्रवाह के वैज्ञानिक विश्लेषण पर आधारित सात दिन पहले तक बाढ़ की एडवाइजरी जारी करने वाली बेसिन आधारित मॉडलिंग प्रणाली भी विकसित की है। यह प्रणाली संभावित बाढ़ की गंभीरता का पहले से आकलन करने में मदद करती है और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को अधिक प्रभावी तैयारी का अवसर देती है। सरकार ने बाढ़ चेतावनी प्रणाली को कॉमन अलर्ट प्रोटोकॉल (CAP), राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और "फ्लड वॉच इंडिया" मोबाइल ऐप से भी जोड़ा है ताकि चेतावनी तेजी से लोगों तक पहुंच सके।
उत्तर-पूर्व की अधिकांश बड़ी नदियां अंतरराष्ट्रीय स्वरूप की हैं। ब्रह्मपुत्र जैसी नदियां चीन और भूटान से होकर भारत में प्रवेश करती हैं। ऐसे में जल प्रवाह का सटीक आकलन करने के लिए पड़ोसी देशों के साथ जल विज्ञान और मौसम संबंधी आंकड़ों का आदान-प्रदान भी किया जा रहा है। इससे बाढ़ के पूर्वानुमान की सटीकता बढ़ती है और आपदा प्रबंधन अधिक प्रभावी बनता है। जल शक्ति मंत्रालय राज्यों को "फ्लड प्लेन जोनिंग" यानी बाढ़ संभावित क्षेत्रों का वैज्ञानिक निर्धारण अपनाने के लिए भी लगातार प्रोत्साहित कर रहा है। इसके लिए अगस्त 2025 में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तकनीकी दिशानिर्देश जारी किए गए थे। इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे क्षेत्रों में अनियोजित निर्माण रोकना और भविष्य में बाढ़ से होने वाले नुकसान को कम करना है।
सरकार ने यह भी बताया कि ब्रह्मपुत्र बोर्ड ने उत्तर-पूर्व राज्यों के लिए 52 मास्टर प्लान तैयार किए हैं, जिनमें अल्पकालिक, मध्यम अवधि और दीर्घकालिक बाढ़ प्रबंधन उपाय शामिल हैं। इन योजनाओं में तटबंध निर्माण, नदी प्रशिक्षण कार्य, जल निकासी सुधार, भूमि उपयोग योजना और गैर-संरचनात्मक उपायों को भी शामिल किया गया है। बाढ़ प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने के लिए राज्य सरकारें राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से सहायता प्रदान करती हैं। यदि किसी आपदा को अत्यंत गंभीर माना जाता है और अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय दल द्वारा उसका आकलन किया जाता है, तो निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) से अतिरिक्त वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जाती है।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर-पूर्व भारत देश के सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में शामिल है। यहां हर वर्ष लाखों लोग प्रभावित होते हैं, हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि जलमग्न हो जाती है और सड़क, पुल तथा अन्य बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचता है। बेहतर पूर्वानुमान प्रणाली, आधुनिक तकनीक, वैज्ञानिक नदी प्रबंधन और केंद्र-राज्य समन्वय से भविष्य में जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है। साथ ही राहत एवं बचाव कार्यों की गति बढ़ेगी, किसानों को समय पर चेतावनी मिलेगी, बुनियादी ढांचे की सुरक्षा बेहतर होगी और दीर्घकाल में आर्थिक नुकसान में भी कमी आने की उम्मीद है।
राज्यसभा में यह जानकारी जल शक्ति राज्य मंत्री राज भूषण चौधरी ने एक लिखित उत्तर के माध्यम से दी, जिसमें उत्तर-पूर्व क्षेत्र में बाढ़ प्रबंधन की वर्तमान स्थिति और केंद्र सरकार द्वारा उठाए जा रहे कदमों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया गया है।
