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भदोही बना ‘संत रविदास नगर’ — योगी का बड़ा सियासी दांव!
सीएम योगी आदित्यनाथ ने भदोही जिले का नाम बदलकर फिर से ‘संत रविदास नगर’ कर दिया है। मायावती के पुराने फैसले को बहाल करते हुए बीजेपी ने दलित राजनीति में बड़ा संदेश देने की कोशिश की है। इस कदम से यूपी की सियासत में 2027 चुनाव से पहले नई हलचल तेज हो गई है।

उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर बड़ा और प्रतीकात्मक फैसला सामने आया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वाराणसी में आयोजित संत शिरोमणि रविदास जी महाराज के कार्यक्रम के दौरान भदोही जिले का नाम बदलकर ‘संत रविदास नगर’ करने की घोषणा कर दी। यह वही नाम है जिसे बहुजन समाज पार्टी की सरकार में मायावती ने दिया था, लेकिन 2012 में सत्ता में आने के बाद समाजवादी पार्टी की सरकार ने इसे बदल दिया था।
योगी सरकार का यह कदम केवल नाम बदलने तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे दलित अस्मिता और राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। दरअसल, मायावती ने अपने शासनकाल में कई जिलों, पार्कों और संस्थानों का नाम दलित महापुरुषों के नाम पर रखा था, जिससे दलित समाज में सम्मान और पहचान का भाव मजबूत हो। लेकिन अखिलेश यादव सरकार ने इनमें से कई नामों को बदल दिया, जिसे लेकर विपक्ष और खासतौर पर बसपा लगातार सवाल उठाती रही है।
वाराणसी में आयोजित इस बड़े कार्यक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि पिछली सरकारों ने संत रविदास जैसे महान संतों के सम्मान के साथ अन्याय किया। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार समाज को जोड़ने और महान संतों के आदर्शों को आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। इसी क्रम में उन्होंने यह भी याद दिलाया कि सपा सरकार ने बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर के नाम पर बने मेडिकल कॉलेज का नाम भी बदल दिया था, जिसे बीजेपी सरकार ने फिर से बहाल किया।
संत रविदास, जिन्हें लगभग 650 साल पहले सामाजिक समानता और छुआछूत के खिलाफ आवाज उठाने वाले महान संत के रूप में जाना जाता है, आज भी देशभर में करोड़ों लोगों की आस्था के केंद्र हैं। उनके अनुयायी उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बड़ी संख्या में मौजूद हैं। यही वजह है कि राजनीतिक दल इस वर्ग को साधने के लिए लगातार प्रयास करते रहते हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, योगी सरकार का यह फैसला 2027 के विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए लिया गया एक बड़ा ‘मास्टरस्ट्रोक’ हो सकता है। दलित वोट बैंक, जो पहले कांग्रेस और बाद में बसपा का मजबूत आधार रहा है, अब धीरे-धीरे बीजेपी की ओर आकर्षित करने की कोशिश की जा रही है। इस फैसले के जरिए बीजेपी ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह दलित महापुरुषों के सम्मान और उनकी विरासत को प्राथमिकता देती है।
हालांकि, इस फैसले के बाद विपक्ष की ओर से प्रतिक्रिया आना भी तय माना जा रहा है। समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी दोनों इस मुद्दे को अपने-अपने तरीके से उठाएंगी। एक तरफ जहां बीजेपी इसे सम्मान और पहचान की राजनीति बता रही है, वहीं विपक्ष इसे चुनावी रणनीति और प्रतीकात्मक राजनीति करार दे सकता है। फिलहाल, भदोही का नाम फिर से ‘संत रविदास नगर’ किए जाने के ऐलान ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि यह फैसला जमीन पर कितना असर डालता है और क्या यह वास्तव में बीजेपी को दलित वोट बैंक में बढ़त दिला पाएगा या नहीं।
