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मदरसों में 'वंदे मातरम्' पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: "आसमान नहीं टूट पड़ेगा", कोर्ट में गरमाई संविधान बनाम धार्मिक स्वतंत्रता की बहस

पश्चिम बंगाल में मदरसों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे गाने को लेकर शुरू हुआ विवाद अब कलकत्ता हाईकोर्ट पहुंच गया है। सुनवाई के दौरान अदालत की एक मौखिक टिप्पणी पूरे देश में चर्चा का विषय बन गई, जब कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने कहा, "यदि मदरसों में वंदे मातरम् गाया जाता है तो आसमान नहीं टूट पड़ेगा।" हालांकि अदालत ने यह भी साफ किया कि यह अंतिम फैसला नहीं है और पूरे मामले पर अभी विस्तृत सुनवाई बाकी है।

Sonali05 अग. 2026, 04:49 PM IST
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मदरसों में 'वंदे मातरम्' पर हाईकोर्ट की बड़ी टिप्पणी: "आसमान नहीं टूट पड़ेगा", कोर्ट में गरमाई संविधान बनाम धार्मिक स्वतंत्रता की बहस

यह मामला जनहित याचिका (PIL) संख्या WPA(P)/86/2026 से जुड़ा है, जिसे सौरव दत्ता ने कलकत्ता हाईकोर्ट में दायर किया है। याचिका में मदरसों में वंदे मातरम् के सभी छह अंतरे अनिवार्य रूप से गाने संबंधी अधिसूचना को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता का कहना है कि राष्ट्रीय गीत का सम्मान सभी नागरिकों का कर्तव्य है, लेकिन इसे धार्मिक शिक्षण संस्थानों के छात्रों पर अनिवार्य रूप से लागू करना संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों, विशेष रूप से धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता, से जुड़ा संवेदनशील प्रश्न है। मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन की खंडपीठ कर रही है।

वंदे मातरम् को लेकर विवाद क्यों हुआ?

'वंदे मातरम्' भारत का राष्ट्रीय गीत है, जिसे बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने अपने उपन्यास 'आनंदमठ' में लिखा था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना। हालांकि वर्षों से इसके सभी छह अंतरों को लेकर धार्मिक और संवैधानिक बहस होती रही है। कुछ मुस्लिम संगठनों का कहना रहा है कि बाद के अंतरों में भारत माता का देवी स्वरूप में वर्णन है, जो उनकी धार्मिक मान्यताओं से मेल नहीं खाता। दूसरी ओर, कई संगठन और पक्ष इसे भारतीय संस्कृति और राष्ट्रभक्ति का प्रतीक मानते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में यह विवाद अदालत तक पहुंचा।

अदालत में क्या-क्या बहस हुई?

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता बिकाश रंजन भट्टाचार्य ने याचिकाकर्ता की ओर से कहा कि राष्ट्रीय गीत का दर्जा अपनी जगह है, लेकिन इसे छात्रों पर अनिवार्य नहीं बनाया जा सकता। उन्होंने अदालत से कहा कि संविधान नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है और राष्ट्रीय गीत को लेकर किसी भी प्रकार की बाध्यता संवैधानिक जांच के दायरे में आती है। उन्होंने यह भी दलील दी कि राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत दोनों का संवैधानिक दर्जा अलग-अलग है तथा राष्ट्रगान को जो कानूनी संरक्षण प्राप्त है, वही स्थिति राष्ट्रीय गीत की नहीं है।

अदालत ने सरकार से पूछा अहम सवाल

सुनवाई के दौरान कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने याचिकाकर्ताओं से पूछा—

"क्या इस अधिसूचना का पालन नहीं करने पर अब तक किसी छात्र, शिक्षक या मदरसे के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई है?" याचिकाकर्ताओं ने जवाब दिया कि सरकार ने अभी तक इस आदेश को सख्ती से लागू नहीं किया है। इस पर अदालत ने कहा कि यदि अभी तक किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई है, तो केवल आशंका के आधार पर अदालत तत्काल हस्तक्षेप कैसे कर सकती है? अदालत ने संकेत दिया कि यदि भविष्य में किसी के खिलाफ कार्रवाई होती है, तब उसके संवैधानिक प्रभाव पर विचार किया जा सकता है।

"आसमान नहीं टूट पड़ेगा" टिप्पणी का पूरा संदर्भ

यही सुनवाई का सबसे चर्चित हिस्सा रहा।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने कहा—

"यदि आज मुझे मेरे धर्म से अलग कोई उद्धरण बोलने के लिए कहा जाए तो क्या होगा? क्या मैं दूसरे धर्म का व्यक्ति बन जाऊंगा? आसमान नहीं टूट पड़ेगा।" यह टिप्पणी अदालत ने उस दलील के संदर्भ में की, जिसमें कहा गया था कि मदरसों में वंदे मातरम् गाने से धार्मिक स्वतंत्रता प्रभावित होगी।

ईसाई स्कूलों का उदाहरण भी दिया

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि देश में हजारों ईसाई शिक्षण संस्थान हैं, जहां विभिन्न धर्मों के छात्र पढ़ते हैं और वे विद्यालय की प्रार्थना में शामिल होते हैं।

खंडपीठ ने पूछा—

"क्या दूसरे धर्म के छात्र यह कहते हैं कि वे प्रार्थना में भाग नहीं लेंगे क्योंकि वह किसी अन्य धर्म से जुड़ी है?" अदालत ने कहा कि केवल किसी दूसरे धर्म से जुड़े शब्द बोल देने से किसी व्यक्ति का धर्म नहीं बदल जाता। हालांकि यह पूरी टिप्पणी सुनवाई के दौरान मौखिक रूप से की गई थी।

संसद की बहस का भी हुआ जिक्र

वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बंदोपाध्याय ने अदालत को बताया कि वर्ष 2025 में संसद में वंदे मातरम् के मुद्दे पर लगभग 12 घंटे तक बहस हुई थी। उन्होंने कहा कि संसद इस विषय पर किसी सर्वसम्मत निर्णय तक नहीं पहुंच सकी थी। ऐसे में यदि संसद भी इस विषय पर अंतिम नीति नहीं बना सकी, तो प्रशासनिक अधिसूचना के माध्यम से इसे लागू करने का प्रयास विवाद को जन्म दे सकता है। हालांकि अदालत ने इस दलील पर कोई टिप्पणी नहीं की।

राज्य सरकार की ओर से क्या कहा गया?

राज्य की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल धीरज कुमार त्रिवेदी ने अदालत से समय मांगा ताकि सरकार इस पूरे मामले पर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल कर सके। उन्होंने कहा कि केवल आशंका के आधार पर अदालत से किसी अधिसूचना पर रोक लगाने की मांग नहीं की जा सकती। उन्होंने यह भी कहा कि अभी तक किसी छात्र, शिक्षक या मदरसे के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं हुई है।

अदालत ने फिलहाल क्या आदेश दिया?

सुनवाई के बाद अदालत ने कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया। खंडपीठ ने राज्य सरकार को विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया और मामले की अगली सुनवाई निर्धारित कर दी। अदालत ने न तो अधिसूचना पर रोक लगाई और न ही उसे वैध या अवैध घोषित किया।

कानूनी दृष्टि से मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

यह मामला केवल वंदे मातरम् तक सीमित नहीं है, बल्कि कई बड़े संवैधानिक प्रश्नों से जुड़ा है—

  • क्या राष्ट्रीय गीत गाना अनिवार्य किया जा सकता है?

  • क्या धार्मिक शिक्षण संस्थानों पर अलग नियम लागू हो सकते हैं?

  • क्या बिना किसी दंडात्मक कार्रवाई के केवल आशंका के आधार पर अदालत हस्तक्षेप कर सकती है?

  • धार्मिक स्वतंत्रता और राष्ट्रहित के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए?

संभव है कि आगे की सुनवाई में संविधान के अनुच्छेद 19, 21 और 25 से जुड़े प्रश्नों पर भी विस्तार से बहस हो।

केस विवरण

मामला: Sourav Dutta vs Union of India & Anr.

केस संख्या: WPA(P)/86/2026

पीठ:
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तपब्रत चक्रवर्ती
न्यायमूर्ति पार्थ सारथी सेन

स्थिति: मामला विचाराधीन, अगली सुनवाई राज्य सरकार की रिपोर्ट दाखिल होने के बाद होगी।