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अयोध्या में 200 साल पुरानी झूलनोत्सव परंपरा की अनूठी छटा, झूले पर विराजे श्रीसीताराम; 'गलबहियां झांकी' बनेगी मुख्य आकर्षण

सावन की फुहारों के बीच रामनगरी अयोध्या एक बार फिर भक्ति और परंपरा के रंग में रंग गई है। प्राचीन रंगमहल मंदिर में करीब 200 वर्ष पुरानी झूलनोत्सव परंपरा पूरे वैभव के साथ जीवंत हो उठी है। भगवान श्रीराम और माता सीता दिव्य झूले पर विराजमान हैं, मंदिर परिसर भजन-कीर्तन से गुंजायमान है और हजारों श्रद्धालु झूला दर्शन के लिए उमड़ रहे हैं। विशेष बात यह है कि इस ऐतिहासिक परंपरा में केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि प्रतिदिन सांस्कृतिक एवं संगीतमय कार्यक्रम, संकीर्तन, रामभक्ति से ओत-प्रोत प्रस्तुतियां और पारंपरिक झांकियां भी आयोजित की जा रही हैं। आगामी सावन कृष्ण एकादशी को सजने वाली 'गलबहियां झांकी' को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह है, जिसे झूलनोत्सव का सबसे भव्य और आकर्षक आयोजन माना जाता है।

Sonali07 अग. 2026, 05:03 PM IST
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अयोध्या में 200 साल पुरानी झूलनोत्सव परंपरा की अनूठी छटा, झूले पर विराजे श्रीसीताराम; 'गलबहियां झांकी' बनेगी मुख्य आकर्षण

अयोध्या।

सावन का पावन महीना शुरू होते ही रामनगरी अयोध्या भक्तिरस में डूब गई है। प्राचीन रंगमहल मंदिर में करीब 200 वर्ष पुरानी झूलनोत्सव की परंपरा इन दिनों श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। यहां भगवान श्रीराम और माता सीता को प्रतिदिन सुसज्जित झूले पर विराजमान कर विशेष पूजा-अर्चना, भजन-कीर्तन और झूला सेवा की जा रही है। मंदिर परिसर में सुबह से देर शाम तक श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है और पूरा वातावरण भक्तिमय बना हुआ है।


क्या है झूलनोत्सव की विशेषता?

अयोध्या के अधिकांश मंदिरों में झूलनोत्सव की शुरुआत सावन शुक्ल तृतीया से होती है, लेकिन रंगमहल मंदिर की परंपरा अलग है। यहां उत्सव सावन आरंभ होने से पहले ही प्रारंभ हो जाता है। पूरे सावन माह प्रतिदिन भगवान श्रीसीताराम का विशेष श्रृंगार किया जाता है, उन्हें सुशोभित झूले पर विराजमान कराया जाता है और श्रद्धालु झूला दर्शन का पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।


झूलनोत्सव क्यों मनाया जाता है? क्या है इसके पीछे की धार्मिक मान्यता और कथा?

झूलनोत्सव का संबंध सावन ऋतु, प्रकृति की हरियाली और भगवान के प्रति प्रेम-भक्ति की भावना से जुड़ा है। सनातन परंपरा में मान्यता है कि वर्षा ऋतु के आगमन पर संपूर्ण सृष्टि आनंदित होती है। इसी आनंद में भगवान को भी झूला झुलाकर उनका स्वागत किया जाता है। यह उत्सव भगवान और भक्त के बीच प्रेम, सेवा और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। वैष्णव परंपरा में झूलनोत्सव की सबसे प्रसिद्ध कथा भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी से जुड़ी है। मान्यता है कि सावन के महीने में वृंदावन की सखियां राधा-कृष्ण को फूलों और हरियाली से सजे झूलों पर झुलाती थीं। वर्षा ऋतु के मनोहारी वातावरण में राधा-कृष्ण के इस दिव्य झूला-विहार का वर्णन ब्रज साहित्य, भक्ति काव्य और वैष्णव परंपरा में विस्तार से मिलता है। यही परंपरा आगे चलकर देशभर के वैष्णव मंदिरों में "झूलन उत्सव" या "हिंडोला उत्सव" के रूप में स्थापित हुई।

अयोध्या में यही परंपरा भगवान श्रीराम और माता सीता के स्वरूप के साथ निभाई जाती है। धार्मिक मान्यता है कि सावन के दौरान भगवान श्रीराम और माता सीता को झूले पर विराजमान कर झुलाने से परिवार में सुख-समृद्धि, दांपत्य जीवन में मधुरता और समाज में प्रेम एवं सौहार्द का संदेश मिलता है। इसलिए अयोध्या के मंदिरों में श्रीसीताराम के झूला-विहार का विशेष महत्व माना जाता है।


                                                                                                              दो शताब्दियों से चली आ रही परंपरा

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मंदिर के महंत रामशरण दास के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत लगभग 200 वर्ष पहले संत स्वामी सरयूशरण ने की थी। उनके लिए भगवान केवल पूजनीय विग्रह नहीं, बल्कि सजीव और चैतन्य स्वरूप थे। इसी भावना के साथ उन्होंने झूलनोत्सव की शुरुआत की, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा और परंपरा के साथ निभाया जा रहा है। हर दिन होता है विशेष श्रृंगार और संकीर्तन झूलनोत्सव के दौरान प्रतिदिन भगवान श्रीसीताराम का विशेष श्रृंगार किया जाता है। इसके बाद विशेष भोग अर्पित किया जाता है और भजन-कीर्तन के बीच श्रद्धालु झूला दर्शन करते हैं। मंदिर परिसर में सुबह से लेकर रात तक धार्मिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है, जिसमें स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ देश के विभिन्न राज्यों से आए भक्त भी शामिल होते हैं।



'गलबहियां झांकी' बनेगी सबसे बड़ा आकर्षण

झूलनोत्सव के दौरान सावन कृष्ण एकादशी (9 अगस्त) को निकलने वाली 'गलबहियां झांकी' इस पूरे महोत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस झांकी में भगवान श्रीराम और माता सीता एक-दूसरे के कंधे में बांह डालकर विराजमान होते हैं। यह झांकी प्रेम, सौहार्द और दांपत्य जीवन में स्नेह का प्रतीक मानी जाती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस विशेष झांकी के दर्शन के लिए अयोध्या पहुंचते हैं।


अयोध्या की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा उत्सव

धार्मिक जानकारों के अनुसार झूलनोत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि अयोध्या की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सावन के महीने में भगवान को झूला झुलाने की परंपरा उत्तर भारत के अनेक मंदिरों में निभाई जाती है, लेकिन रंगमहल मंदिर का आयोजन अपनी प्राचीनता और विशिष्ट परंपरा के कारण विशेष महत्व रखता है।


सद्गुरु सदन में भी चल रहा झूलनोत्सव

रंगमहल मंदिर के अलावा अयोध्या के गोलाघाट स्थित सद्गुरु सदन में भी पूरे सावन माह झूलनोत्सव का आयोजन किया जा रहा है। यहां भी प्रतिदिन भगवान का श्रृंगार, झूला दर्शन, भजन-कीर्तन और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन हो रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग ले रहे हैं।


अब आगे क्या?

पूरे सावन माह रंगमहल मंदिर में झूलनोत्सव के विभिन्न धार्मिक आयोजन जारी रहेंगे। विशेष रूप से 9 अगस्त को आयोजित होने वाली 'गलबहियां झांकी' को लेकर मंदिर प्रशासन ने व्यापक तैयारियां की हैं। श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या को देखते हुए दर्शन व्यवस्था और सुरक्षा के भी विशेष इंतजाम किए जा रहे हैं।