business

ईरान-अमेरिका टकराव से बाजार सहमा, तेल कीमतों ने बढ़ाई मुश्किल

शेयर बाजार अपडेट: ईरान-अमेरिका तनाव और नए अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच 25 अगस्त 2026 को भारतीय शेयर बाजार दबाव में रहा। सेंसेक्स और निफ्टी में गिरावट दर्ज हुई, जबकि ब्रेंट क्रूड करीब 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना रहा। बाजार में चिंता है कि लंबे समय तक भू-राजनीतिक तनाव रहने से तेल आपूर्ति, महंगाई और कंपनियों की लागत पर असर पड़ सकता है।

Neha Sharma25 अग. 2026, 04:51 PM IST
खबर शेयर करें:
ईरान-अमेरिका टकराव से बाजार सहमा, तेल कीमतों ने बढ़ाई मुश्किल

मुंबई: ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर मंगलवार, 25 अगस्त 2026 को भारतीय शेयर बाजार पर साफ दिखाई दिया। नए अमेरिकी प्रतिबंधों और ईरान की जवाबी कार्रवाई की चेतावनी के बीच निवेशकों में सतर्कता बढ़ी। शुरुआती कारोबार में सेंसेक्स और निफ्टी दोनों गिरावट के साथ कारोबार करते दिखे, जबकि कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहीं। रॉयटर्स के अनुसार, सुबह करीब 9:15 बजे निफ्टी 50 लगभग 0.18% गिरकर 24,175.75 और सेंसेक्स 0.10% नीचे 77,295.49 पर था। शुरुआती कारोबार में 16 प्रमुख सेक्टरों में से 14 में गिरावट दर्ज की गई।


ईरान-अमेरिका तनाव से बाजार क्यों प्रभावित हुआ?

शेयर बाजार आमतौर पर भू-राजनीतिक अनिश्चितता को नकारात्मक संकेत के रूप में लेता है। ईरान और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने से निवेशकों को वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और महंगाई पर संभावित असर की चिंता है। अमेरिका ने ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं, जबकि ईरान ने इन कदमों के जवाब में कार्रवाई की चेतावनी दी है। इससे बाजार में यह आशंका बनी हुई है कि तनाव बढ़ने पर ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकते हैं।


कच्चे तेल की कीमत बनी बड़ी चिंता

भारत के लिए इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक असर कच्चे तेल पर पड़ सकता है। मंगलवार को ब्रेंट क्रूड करीब 92 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा। हालांकि पिछले सत्र में तेल की कीमतों में गिरावट आई थी, लेकिन मध्य-पूर्व में जारी तनाव के कारण बाजार में आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के आयात से पूरा करता है। ऐसे में लंबे समय तक तेल की कीमतें ऊंची रहने पर देश के आयात बिल, महंगाई और कंपनियों की लागत पर दबाव बढ़ सकता है।


रुपये पर भी दबाव

भू-राजनीतिक तनाव और महंगे तेल का असर भारतीय रुपये पर भी पड़ा है। मंगलवार को रुपया करीब ₹95.74 प्रति डॉलर पर कारोबार कर रहा था। आयातकों की डॉलर मांग और ऊंचे कच्चे तेल की कीमतों को रुपये पर दबाव की प्रमुख वजहों में बताया गया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, RBI ने रुपये में अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप किया, जिसके चलते रुपये की चाल अपेक्षाकृत सीमित रही।


किन सेक्टरों पर ज्यादा असर?

ईरान-अमेरिका तनाव का असर सभी कंपनियों पर एक जैसा नहीं होता। सबसे ज्यादा चिंता उन क्षेत्रों को लेकर रहती है जिनकी लागत या कारोबार कच्चे तेल और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ा है।

ऑटो सेक्टर

महंगा पेट्रोल-डीजल और ऊंची इनपुट लागत ऑटो कंपनियों के लिए दबाव बढ़ा सकती है। मंगलवार के शुरुआती कारोबार में मारुति जैसे शेयरों में कमजोरी दिखाई दी।

आईटी सेक्टर

वैश्विक अनिश्चितता और कमजोर अंतरराष्ट्रीय बाजारों का असर आईटी शेयरों पर भी पड़ सकता है। शुरुआती कारोबार में HCL Tech और Tech Mahindra प्रमुख कमजोर शेयरों में रहे।

बैंकिंग और वित्तीय क्षेत्र

बाजार में जोखिम बढ़ने पर निवेशक बैंकिंग और वित्तीय शेयरों में भी सतर्क रुख अपना सकते हैं। हालांकि घरेलू अर्थव्यवस्था और कंपनियों के प्रदर्शन से जुड़े कारक इस क्षेत्र पर अलग से असर डालते हैं।

तेल और गैस

कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से तेल से जुड़ी कंपनियों पर असर अलग-अलग हो सकता है। कीमतों में बदलाव से रिफाइनिंग मार्जिन, इनपुट लागत और विपणन कारोबार प्रभावित हो सकता है।


क्या पूरा बाजार गिरावट में है?

फिलहाल तस्वीर पूरी तरह एकतरफा नहीं है। मंगलवार को अधिकांश प्रमुख सेक्टर दबाव में रहे, लेकिन कुछ शेयरों में खरीदारी भी दिखाई दी। Trent, Adani Ports, ICICI Bank और Bharat Electronics शुरुआती कारोबार में बढ़त वाले शेयरों में शामिल रहे। इससे संकेत मिलता है कि बाजार में केवल ईरान-अमेरिका तनाव ही नहीं, बल्कि कंपनियों से जुड़े अलग-अलग कारोबारी घटनाक्रम भी शेयरों की चाल तय कर रहे हैं।


निवेशकों की नजर किन संकेतों पर?

  • ईरान-अमेरिका तनाव और नए प्रतिबंध
  • स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में तेल आपूर्ति की स्थिति
  • ब्रेंट क्रूड की कीमत
  • रुपये की चाल
  • विदेशी निवेशकों की खरीद-बिक्री
  • अमेरिका की मौद्रिक नीति से जुड़े संकेत
  • भारतीय कंपनियों के तिमाही प्रदर्शन

इसके अलावा निफ्टी के मासिक डेरिवेटिव्स एक्सपायरी को लेकर भी बाजार में सावधानी बनी हुई है।


भारत की अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ सकता है?

अगर ईरान-अमेरिका तनाव लंबे समय तक बना रहता है और इसके कारण कच्चे तेल की कीमतें लगातार ऊंची रहती हैं, तो भारत के लिए सबसे बड़ा जोखिम ऊर्जा आयात लागत का होगा। महंगा तेल परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ा सकता है। इसका असर कंपनियों के मुनाफे और कुछ क्षेत्रों में उपभोक्ता कीमतों पर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर, अगर तनाव कम होता है और तेल की कीमतें स्थिर होती हैं, तो बाजार पर बना दबाव भी कम हो सकता है।


आगे बाजार की चाल कैसी रह सकती है?

फिलहाल भारतीय शेयर बाजार में सतर्कता का माहौल है। घरेलू स्तर पर कंपनियों के मजबूत प्रदर्शन और आर्थिक गतिविधियों से बाजार को सहारा मिल सकता है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ईरान-अमेरिका तनाव और कच्चे तेल की कीमतें निकट अवधि में महत्वपूर्ण जोखिम बने हुए हैं। इसलिए आने वाले सत्रों में निवेशकों की नजर केवल सेंसेक्स और निफ्टी पर नहीं, बल्कि तेल की कीमत, रुपये की चाल और मध्य-पूर्व के घटनाक्रम पर भी रहेगी।