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गर्भावस्था में बढ़ रहा गैर-संचारी रोगों का खतरा, Diabetes, Hypertension और Obesity बन रहे बड़ी चुनौती
गर्भावस्था को आमतौर पर मां और बच्चे की सेहत से जुड़ी अवधि के रूप में देखा जाता है, लेकिन बदलती जीवनशैली और बढ़ते गैर-संचारी रोगों यानी Non-Communicable Diseases के दौर में pregnancy care की तस्वीर तेजी से बदल रही है। Diabetes, high blood pressure और obesity अब गर्भावस्था के दौरान सामने आने वाली महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौतियों में शामिल हैं। इन स्थितियों का असर केवल गर्भावस्था या प्रसव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मां और बच्चे दोनों के भविष्य के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है।

भारत में यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में एक तरफ कुपोषण और एनीमिया जैसी समस्याएं अभी भी मौजूद हैं, वहीं दूसरी ओर अधिक वजन, मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी जीवनशैली से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं भी बढ़ रही हैं। ऐसे में गर्भावस्था महिला के स्वास्थ्य की ऐसी महत्वपूर्ण अवस्था बन जाती है, जिसमें इन रोगों की समय रहते पहचान और रोकथाम की जा सकती है।
गर्भावस्था और मधुमेह का बढ़ता संबंध
गर्भावस्था के दौरान मधुमेह मुख्य रूप से दो परिस्थितियों में देखा जाता है। पहली स्थिति में महिला को गर्भधारण से पहले ही मधुमेह होता है, जबकि दूसरी स्थिति में गर्भावस्था के दौरान पहली बार रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ता है, जिसे गर्भावधि मधुमेह कहा जाता है। गर्भावधि मधुमेह कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के होता है और नियमित जांच के दौरान इसका पता चलता है। उपलब्ध भारतीय अध्ययनों की समीक्षा में गर्भावधि मधुमेह की व्यापकता लगभग 13 प्रतिशत पाई गई है, हालांकि अलग-अलग राज्यों, आबादी और जांच के तरीकों के कारण इसके आंकड़ों में काफी अंतर देखा गया है। गर्भावस्था में रक्त शर्करा का स्तर लंबे समय तक अधिक रहने पर मां और गर्भस्थ शिशु दोनों के लिए जटिलताओं का खतरा बढ़ सकता है। मां में गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप और अन्य समस्याओं का खतरा बढ़ सकता है, जबकि बच्चे का वजन सामान्य से अधिक होने, प्रसव के दौरान कठिनाई और जन्म के बाद रक्त शर्करा कम होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गर्भावस्था के दौरान मधुमेह की देखभाल के लिए नवंबर 2025 में पहली व्यापक वैश्विक दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें खान-पान, शारीरिक गतिविधि, रक्त शर्करा की नियमित निगरानी, आवश्यक दवाओं और गर्भावस्था से पहले मौजूद मधुमेह वाली महिलाओं के लिए समन्वित चिकित्सा देखभाल पर जोर दिया गया है।
उच्च रक्तचाप और गर्भावस्था
गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप भी गंभीर स्वास्थ्य समस्या बन सकता है। कुछ महिलाओं को गर्भधारण से पहले ही उच्च रक्तचाप होता है, जबकि कुछ में गर्भावस्था के दौरान पहली बार रक्तचाप बढ़ता है। इसके अलावा गर्भावस्था में होने वाली एक गंभीर स्थिति प्री-एक्लेम्पसिया भी उच्च रक्तचाप से जुड़ी होती है। प्री-एक्लेम्पसिया सामान्यतः गर्भावस्था के 20वें सप्ताह के बाद सामने आ सकता है। इसमें उच्च रक्तचाप के साथ शरीर के कुछ महत्वपूर्ण अंगों पर असर पड़ सकता है। गंभीर स्थिति में यह एक्लेम्पसिया में बदल सकता है, जिसमें महिला को दौरे पड़ सकते हैं और स्थिति जानलेवा भी हो सकती है। गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप का असर गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ सकता है। इससे बच्चे के विकास में रुकावट, समय से पहले प्रसव और कुछ गंभीर परिस्थितियों में गर्भस्थ शिशु की मृत्यु का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए गर्भावस्था के दौरान नियमित रक्तचाप की जांच बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।
मोटापा केवल वजन बढ़ने की समस्या नहीं
गर्भावस्था से पहले मोटापा होना भी मां और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण जोखिम कारक हो सकता है। मोटापा शरीर में इंसुलिन के प्रति संवेदनशीलता को कम कर सकता है, जिससे रक्त में शर्करा का स्तर बढ़ने और गर्भावधि मधुमेह का खतरा बढ़ सकता है। इसके अलावा मोटापा उच्च रक्तचाप और प्री-एक्लेम्पसिया जैसी गर्भावस्था संबंधी जटिलताओं से भी जुड़ा हुआ है। मोटापे को केवल शरीर का वजन बढ़ना मानना पर्याप्त नहीं है। यह एक ऐसी चयापचय संबंधी स्थिति है, जिसका संबंध रक्त शर्करा, रक्तचाप, हार्मोन, सूजन और हृदय संबंधी स्वास्थ्य से भी है। इसलिए गर्भावस्था की देखभाल में महिला के वजन और शरीर में होने वाले बदलावों पर नजर रखना महत्वपूर्ण है।
मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापा आपस में जुड़े हैं
इन तीनों स्थितियों को अलग-अलग स्वास्थ्य समस्याओं के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। मोटापा शरीर में इंसुलिन प्रतिरोध को बढ़ा सकता है। इससे गर्भावधि मधुमेह का खतरा बढ़ सकता है। मोटापा और मधुमेह दोनों गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप और प्री-एक्लेम्पसिया के जोखिम से जुड़े हो सकते हैं। इसलिए गर्भावस्था में केवल एक बीमारी की जांच करना पर्याप्त नहीं है। महिला के पूरे चयापचय स्वास्थ्य को ध्यान में रखना जरूरी है। शरीर का वजन, रक्तचाप, रक्त शर्करा, पिछली गर्भावस्था का इतिहास और परिवार में मधुमेह या उच्च रक्तचाप का इतिहास मिलकर महिला के जोखिम का बेहतर आकलन करने में मदद कर सकते हैं।
गर्भधारण से पहले स्वास्थ्य जांच की जरूरत
गैर-संचारी रोगों के मामले में गर्भावस्था शुरू होने के बाद उपचार शुरू करना ही पर्याप्त नहीं है। गर्भधारण से पहले स्वास्थ्य की तैयारी भी महत्वपूर्ण है। जिन महिलाओं को पहले से मधुमेह, उच्च रक्तचाप या मोटापा है, उन्हें गर्भधारण से पहले अपने रक्त शर्करा और रक्तचाप को नियंत्रित करने, वजन को स्वस्थ सीमा में रखने, चल रही दवाओं की चिकित्सकीय समीक्षा कराने और आवश्यक स्वास्थ्य जांच कराने पर ध्यान देना चाहिए। पहले से मधुमेह से पीड़ित महिलाओं के लिए गर्भधारण से पहले रक्त शर्करा को नियंत्रित रखना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि गर्भावस्था की शुरुआती अवधि में ही गर्भस्थ शिशु का विकास शुरू हो जाता है।
गर्भावस्था में नियमित जांच क्यों जरूरी?
मधुमेह और उच्च रक्तचाप कई बार बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी मौजूद हो सकते हैं। इसलिए गर्भावस्था के दौरान नियमित स्वास्थ्य जांच महत्वपूर्ण है। रक्तचाप की जांच, रक्त में शर्करा की जांच, वजन की निगरानी और चिकित्सकीय सलाह के अनुसार मूत्र तथा अन्य प्रयोगशाला जांच से कई जोखिमों की समय रहते पहचान की जा सकती है। प्री-एक्लेम्पसिया जैसी गंभीर स्थिति में समय पर पहचान बेहद महत्वपूर्ण है। शुरुआती अवस्था में इसका पता चलने पर महिला की अधिक निगरानी की जा सकती है और जरूरत पड़ने पर उपचार शुरू किया जा सकता है।
गर्भावस्था में भोजन को लेकर बदलनी होगी सोच
गर्भावस्था के दौरान पर्याप्त और संतुलित पोषण जरूरी है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि महिला को सामान्य से दोगुना भोजन करना चाहिए। गर्भावस्था में भोजन की मात्रा और पोषक तत्वों की आवश्यकता महिला के स्वास्थ्य, गर्भावस्था की अवस्था और चिकित्सकीय परिस्थितियों के अनुसार बदलती है। अत्यधिक वजन बढ़ना भी गर्भावस्था में जटिलताओं का जोखिम बढ़ा सकता है। इसलिए गर्भावस्था में लक्ष्य वजन कम करना नहीं, बल्कि चिकित्सकीय सलाह के अनुसार स्वस्थ और उचित वजन बढ़ाना होना चाहिए। संतुलित भोजन, पर्याप्त प्रोटीन, आवश्यक विटामिन और खनिज, उचित शारीरिक गतिविधि तथा नियमित चिकित्सकीय जांच मां और बच्चे के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
शारीरिक गतिविधि भी महत्वपूर्ण
यदि गर्भावस्था सामान्य है और चिकित्सक ने शारीरिक गतिविधि पर रोक नहीं लगाई है, तो उचित स्तर की शारीरिक गतिविधि महिला के चयापचय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हो सकती है। इससे अत्यधिक वजन बढ़ने को नियंत्रित करने और शरीर की इंसुलिन संवेदनशीलता को बेहतर बनाए रखने में मदद मिल सकती है। हालांकि हर गर्भवती महिला के लिए एक जैसी व्यायाम योजना उचित नहीं होती। उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था, रक्तस्राव, समय से पहले प्रसव का खतरा, प्लेसेंटा से जुड़ी समस्या या अन्य चिकित्सकीय परिस्थितियों में शारीरिक गतिविधि को लेकर निर्णय चिकित्सक की सलाह के अनुसार होना चाहिए।
प्रसव के बाद भी खत्म नहीं होता खतरा
गर्भावधि मधुमेह या गर्भावस्था के दौरान उच्च रक्तचाप को केवल प्रसव तक सीमित समस्या मानना उचित नहीं है। गर्भावधि मधुमेह से गुजरने वाली महिलाओं में भविष्य में दूसरे प्रकार के मधुमेह का खतरा बढ़ सकता है। इसी तरह गर्भावस्था में उच्च रक्तचाप या प्री-एक्लेम्पसिया का इतिहास महिला के भविष्य के हृदय और चयापचय संबंधी स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण संकेत हो सकता है। इसलिए प्रसव के बाद भी महिला की स्वास्थ्य निगरानी जारी रहनी चाहिए। रक्त शर्करा और रक्तचाप की जांच, वजन नियंत्रण, संतुलित आहार, नियमित शारीरिक गतिविधि और भविष्य की गर्भावस्था की योजना पर ध्यान देना जरूरी है।
मां के स्वास्थ्य का असर बच्चे पर भी
गर्भावस्था के दौरान मां की चयापचय संबंधी स्थिति का असर गर्भस्थ शिशु पर भी पड़ सकता है। अनियंत्रित मधुमेह में बच्चे का वजन सामान्य से अधिक हो सकता है और जन्म के बाद रक्त शर्करा कम होने जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं। वहीं उच्च रक्तचाप और प्री-एक्लेम्पसिया गर्भस्थ शिशु के विकास को प्रभावित कर सकते हैं और समय से पहले प्रसव का खतरा बढ़ा सकते हैं। इसलिए गर्भावस्था में गैर-संचारी रोगों की रोकथाम केवल महिला के स्वास्थ्य का विषय नहीं है। यह बच्चे के वर्तमान और भविष्य के स्वास्थ्य से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।
भारत में एकीकृत देखभाल की जरूरत
भारत में मातृ स्वास्थ्य और गैर-संचारी रोगों को अक्सर स्वास्थ्य व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों के रूप में देखा जाता है। लेकिन मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापे के बढ़ते बोझ को देखते हुए दोनों को अधिक प्रभावी तरीके से जोड़ने की जरूरत है। एक बेहतर स्वास्थ्य व्यवस्था में गर्भधारण से पहले जोखिम की पहचान, गर्भावस्था के दौरान नियमित जांच, रक्त शर्करा और रक्तचाप का नियंत्रण, पोषण संबंधी सलाह, उचित शारीरिक गतिविधि, गर्भस्थ शिशु की निगरानी और प्रसव के बाद लगातार स्वास्थ्य देखभाल को एक ही निरंतर प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। गर्भावस्था के दौरान सामने आने वाला मधुमेह या उच्च रक्तचाप केवल उस समय की समस्या नहीं हो सकता। कई मामलों में यह महिला के भविष्य में मधुमेह, उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी रोगों के जोखिम का संकेत भी हो सकता है। यही कारण है कि गर्भावस्था को केवल सुरक्षित प्रसव की तैयारी के रूप में देखने के बजाय महिला के दीर्घकालिक स्वास्थ्य की निगरानी के अवसर के रूप में भी देखा जाना चाहिए।
गर्भावस्था और गैर-संचारी रोगों का संबंध तेजी से महत्वपूर्ण होता जा रहा है। मधुमेह, उच्च रक्तचाप और मोटापा एक-दूसरे से जुड़े स्वास्थ्य जोखिम हैं, जो गर्भावस्था के दौरान मां और बच्चे दोनों को प्रभावित कर सकते हैं। इन स्थितियों की समय पर पहचान, गर्भधारण से पहले स्वास्थ्य तैयारी, नियमित प्रसवपूर्व जांच, संतुलित पोषण, उचित शारीरिक गतिविधि, आवश्यक उपचार और प्रसव के बाद लगातार निगरानी इस जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। मातृ स्वास्थ्य की अगली चुनौती केवल यह सुनिश्चित करना नहीं है कि महिला सुरक्षित रूप से बच्चे को जन्म दे। चुनौती यह भी है कि गर्भावस्था के बाद महिला स्वस्थ रहे और आने वाले वर्षों में मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा तथा हृदय रोगों के जोखिम को कम किया जा सके। यही दृष्टिकोण गर्भावस्था की देखभाल को केवल मातृत्व-केंद्रित स्वास्थ्य सेवा से आगे बढ़ाकर महिला के पूरे जीवनकाल के स्वास्थ्य से जोड़ सकता है।
