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चिल्लूपार में बसपा का बड़ा दांव: अस्मिता चंद बनीं आधिकारिक प्रत्याशी, 2027 की लड़ाई में बदले सियासी समीकरण
गोरखपुर: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 से पहले गोरखपुर की चिल्लूपार विधानसभा सीट पर सियासी हलचल तेज हो गई है। बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने भाजपा की पूर्व महिला मोर्चा प्रदेश उपाध्यक्ष अस्मिता चंद को चिल्लूपार से अपना आधिकारिक प्रत्याशी घोषित कर दिया है। बसपा मंडल प्रभारी ने कार्यकर्ता सम्मेलन के मंच से उनके नाम की औपचारिक घोषणा की। इसके साथ ही चिल्लूपार में आगामी चुनाव को लेकर मुकाबला और दिलचस्प होने के संकेत मिल रहे हैं।

अस्मिता चंद (Asmita Chand) : लंबे समय तक भाजपा की सक्रिय राजनीति से जुड़ी रही हैं। उन्हें 2021 में भाजपा महिला मोर्चा का प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया गया था। इससे पहले भी वह संगठन में अलग-अलग जिम्मेदारियां संभाल चुकी थीं और 2007 में चिल्लूपार विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुकी हैं। अगस्त 2026 में उन्होंने भाजपा से दूरी बनाते हुए बसपा का रुख किया। उनके बसपा में शामिल होने की खबर ने चिल्लूपार की राजनीति में तत्काल हलचल पैदा कर दी थी, क्योंकि काफी समय से उनके भाजपा की ओर से विधानसभा चुनाव लड़ने की चर्चा चल रही थी।अब बसपा ने उनके नाम पर आधिकारिक मुहर लगा दी है। इससे पहले जो बातें राजनीतिक गलियारों में संभावित दावेदारी के तौर पर चल रही थीं, वे अब औपचारिक प्रत्याशिता में बदल गई हैं।
चिल्लूपार में बसपा का पुराना राजनीतिक आधार
चिल्लूपार विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक इतिहास बसपा के लिए महत्वपूर्ण रहा है। यहां पूर्व मंत्री हरिशंकर तिवारी का लंबे समय तक प्रभाव रहा। उपलब्ध चुनावी रिपोर्टों के अनुसार हरिशंकर तिवारी इस सीट से पांच बार विधायक रहे। 2017 के विधानसभा चुनाव में उनके पुत्र विनय शंकर तिवारी ने बसपा के टिकट पर जीत दर्ज की थी। हालांकि 2022 में समीकरण बदले और भाजपा के राजेश त्रिपाठी ने विनय शंकर तिवारी को हराकर सीट अपने नाम की। यही वजह है कि चिल्लूपार में बसपा की ओर से अस्मिता चंद को उतारना महज एक उम्मीदवार की घोषणा नहीं, बल्कि पुराने राजनीतिक प्रभाव को दोबारा मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
अस्मिता के आने से क्यों बदला समीकरण?
अस्मिता चंद की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनका चिल्लूपार क्षेत्र से पुराना जुड़ाव और भाजपा संगठन में लंबे समय तक सक्रिय रहना माना जा रहा है। वह 2007 में इसी सीट से चुनाव भी लड़ चुकी हैं। दूसरी ओर, भाजपा छोड़कर बसपा में उनका जाना स्थानीय राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव है। इससे बसपा को ऐसा चेहरा मिला है, जो पहले भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में सक्रिय रहा है और क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पहचान रखता है। हालांकि चुनाव में इसका वास्तविक असर कितना होगा, यह मतदाताओं और अन्य दलों के प्रत्याशियों के सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
2027 में त्रिकोणीय मुकाबले के आसार
चिल्लूपार में फिलहाल चुनावी तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट नहीं हुई है, क्योंकि सभी प्रमुख दलों ने अपने उम्मीदवार घोषित नहीं किए हैं। लेकिन मौजूदा राजनीतिक समीकरणों को देखते हुए यहां त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना जताई जा रही है। एक तरफ भाजपा के मौजूदा विधायक राजेश त्रिपाठी का राजनीतिक आधार है। दूसरी ओर बसपा ने अस्मिता चंद को मैदान में उतारकर मुकाबले को नया आयाम दिया है। वहीं सपा खेमे से विनय शंकर तिवारी की संभावित भूमिका भी इस सीट के समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।
इस स्थिति में चुनावी मुकाबला केवल पार्टी बनाम पार्टी नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय राजनीतिक प्रभाव, पुराने समीकरण और उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
बसपा सम्मेलन में दिखी संगठनात्मक ताकत
अस्मिता चंद की बसपा में एंट्री के बाद चिल्लूपार में पार्टी ने कार्यकर्ता सम्मेलनों और जनसभाओं के जरिए अपनी सक्रियता बढ़ाई है। अगस्त में आयोजित विधानसभा स्तरीय कार्यक्रम में बसपा के वरिष्ठ नेताओं की मौजूदगी में अस्मिता ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की थी। उस दौरान उन्होंने मायावती को पांचवीं बार उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने के लिए काम करने का संकल्प भी व्यक्त किया था। 25 अगस्त की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, पार्टी के मंडल प्रभारी ने मंच से उन्हें चिल्लूपार का आधिकारिक प्रत्याशी घोषित किया। घोषणा के बाद उनके समर्थकों में उत्साह देखने को मिला।
पति भाजपा के MLC, अस्मिता बसपा के टिकट पर
अस्मिता चंद के बसपा में जाने का एक और राजनीतिक पहलू है। उनके पति सीपी चंद भाजपा से विधान परिषद सदस्य (MLC) हैं। ऐसे में अस्मिता का बसपा में जाना स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना है। यह पारिवारिक और राजनीतिक समीकरण आने वाले चुनाव में किस तरह प्रभाव डालता है, यह अभी देखना बाकी है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि अस्मिता के बसपा में आने से चिल्लूपार में भाजपा और बसपा के बीच राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक नया आयाम जुड़ गया है।
चिल्लूपार में अब किन मुद्दों पर होगी लड़ाई?
आगामी चुनाव में स्थानीय विकास, रोजगार, शिक्षा, सड़क और बुनियादी सुविधाओं के अलावा क्षेत्र की राजनीतिक विरासत भी अहम मुद्दा बन सकती है। बसपा की ओर से सामाजिक न्याय और संगठन को मजबूत करने की बात सामने रखी जा रही है। वहीं भाजपा के पास सत्ता में रहने और विकास परियोजनाओं का मुद्दा होगा। सपा भी इस सीट पर अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश करेगी। इसलिए आने वाले महीनों में प्रत्याशियों की अंतिम सूची, स्थानीय संगठनों की सक्रियता और क्षेत्रवार समर्थन का समीकरण चिल्लूपार की चुनावी तस्वीर को और स्पष्ट करेगा।
2027 से पहले चिल्लूपार बना हॉट सीट
अस्मिता चंद की आधिकारिक उम्मीदवारी के साथ चिल्लूपार उत्तर प्रदेश की उन सीटों में शामिल हो गई है, जहां 2027 से पहले ही राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।
भाजपा से बसपा में आया एक जाना-पहचाना चेहरा, बसपा का पुराना राजनीतिक आधार और भाजपा के मौजूदा विधायक—इन तीनों फैक्टरों ने चिल्लूपार की लड़ाई को खास बना दिया है। हालांकि किस पार्टी को इसका वास्तविक लाभ मिलेगा, इसका फैसला चुनाव के दौरान मतदाताओं के रुख और अंतिम उम्मीदवारों पर निर्भर करेगा।
