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पुणे पुलिस की 'सिंघमगिरी' पड़ी भारी: मानवाधिकार आयोग के एक्शन के बाद PI मानसिंग पाटिल का तड़काफडकी तबादला
पुणे के भारती विद्यापीठ पुलिस स्टेशन में नाबालिगों सहित आरोपियों को पुलिस गाड़ी के बोनट पर बैठाकर घुमाने और उनके साथ सार्वजनिक मारपीट का वीडियो वायरल होने के बाद बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। इस 'सिंघमगिरी' और मानवाधिकारों के उल्लंघन का स्वतः संज्ञान लेते हुए राज्य मानवाधिकार आयोग ने पुणे पुलिस आयुक्त और पुलिस महानिदेशक को कारण बताओ नोटिस जारी किया है और जांच के लिए तीन सदस्यीय विशेष समिति का गठन किया है। इस कार्रवाई के बाद पुणे पुलिस प्रशासन ने वरिष्ठ पुलिस निरीक्षक मानसिंग पाटिल का तत्काल प्रभाव से विशेष शाखा में तबादला कर दिया है और मामले की आंतरिक जांच के आदेश दिए हैं।

पुणे: पुणे में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर आरोपियों का जुलूस निकालने और उनके साथ अभद्र व्यवहार करने की 'सिंघम शैली' अब पुलिस के अपने ही गले की हड्डी बन गई है। राज्य मानवाधिकार आयोग के कड़े रुख और कारण बताओ नोटिस के बाद, पुणे पुलिस आयुक्त को भारती विद्यापीठ पुलिस स्टेशन के वरिष्ठ निरीक्षक मानसिंग पाटिल का आनन-फानन में तबादला करना पड़ा है। अक्सर पुलिस महकमे में ऑन-कैमरा अपराधियों का खौफ पैदा करने के लिए कानून को ताक पर रख दिया जाता है। लेकिन यह मामला साबित करता है कि जनता की वाहवाही बटोरने के लिए की गई 'ऑन-स्पॉट जस्टिस' या 'सिंघमगिरी' संवैधानिक मर्यादाओं का उल्लंघन है। अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने से पहले किसी भी आरोपी, विशेषकर नाबालिगों के मानवाधिकारों का हनन पुलिस को भारी प्रशासनिक जांच के मुहाने पर खड़ा कर सकता है।
भारती विद्यापीठ पुलिस क्षेत्र में नाबालिगों सहित कुछ आरोपियों को पुलिस वाहन के बोनट पर बैठाकर और बांधकर सार्वजनिक सड़कों पर घुमाया गया था, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इस वीडियो में पुलिस की मौजूदगी में एक महिला द्वारा आरोपियों को पीटते हुए भी देखा गया। इसके तुरंत बाद एक और वीडियो सामने आया जिसमें आरोपियों को घुटनों के बल सड़क पर चलाया जा रहा था।जनता के बीच इन वीडियो को लेकर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं आईं, लेकिन विधिक और मानवाधिकार विशेषज्ञों ने इसे सीधे तौर पर 'कस्टोडियल टॉर्चर' और 'मॉब जस्टिस' को बढ़ावा देने वाला कदम माना।मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य मानवाधिकार आयोग ने पूर्ण पीठ का गठन कर पुणे पुलिस कमिश्नर और राज्य पुलिस महानिदेशक से जवाब तलब किया। आयोग की स्वतंत्र तीन सदस्यीय समिति (जिसमें जिला न्यायाधीश स्तर के अधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधिकारी शामिल हैं) ने भारती विद्यापीठ पुलिस स्टेशन पहुंचकर संबंधित पुलिसकर्मियों के आधिकारिक बयान दर्ज किए और मामले के रिकॉर्ड को ज़ब्त किया। प्रशासनिक दबाव और मानवाधिकार आयोग की कार्रवाई के बीच, पुणे पुलिस कमिश्नर अमितेश कुमार ने मामले की आंतरिक जांच जोन-2 के डीसीपी मिलिंद मोहिते को सौंपी है। वहीं, थाना प्रभारी मानसिंग पाटिल को तत्काल हटाकर विशेष शाखा में भेज दिया गया है और क्राइम ब्रांच के सुदर्शन गायकवाड़ को कमान सौंपी गई है।
बयान और आधिकारिक पुष्टि (कोट्स एंड एट्रिब्यूशन): राज्य मानवाधिकार आयोग की पूर्ण पीठ (न्यायमूर्ति ए. एम. बादर, न्यायमूर्ति स्वप्ना जोशी और सदस्य संजय कुमार) ने अपनी टिप्पणी में कहा: "कानून लागू कराने वाली एजेंसियों द्वारा ही प्रक्रियात्मक कानून और मानवाधिकारों की धज्जियां उड़ाना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। किसी भी आरोपी को, चाहे उसका अपराध कितना भी गंभीर हो, सार्वजनिक रूप से अपमानित करना या पुलिस हिरासत में किसी नागरिक से पिटवाना कानून के शासन के खिलाफ है।"
मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए पुणे पुलिस आयुक्त अमितेश कुमार ने कहा: "पुलिस प्रशासन में अनुशासन और कानून के दायरे का पालन सर्वोपरि है। वायरल वीडियो की आंतरिक जांच कराई जा रही है और रिपोर्ट के आधार पर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ आवश्यक प्रशासनिक कदम उठाए जाएंगे।"
