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Grasslands Conservation: भारत ने UNCCD COP17 में पहली गाइड की लॉन्च
भारत ने मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित UNCCD COP17 में घासभूमि और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (Open Natural Ecosystems) पर अपनी पहली गाइड लॉन्च की। पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने घासभूमि को जैव विविधता, स्थानीय आजीविका और जलवायु लचीलेपन के लिए महत्वपूर्ण बताते हुए इनके वैज्ञानिक संरक्षण पर जोर दिया। गाइड में भारत की घासभूमियों, सवाना, रेगिस्तानी क्षेत्रों, झाड़ियों, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र और अन्य प्राकृतिक क्षेत्रों की जानकारी शामिल है।

भारत ने संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय (UNCCD) के COP17 सम्मेलन में भारत के घासभूमि और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र (Open Natural Ecosystems–ONEs) पर अपनी पहली गाइड लॉन्च की। यह लॉन्च मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित COP17 के एक विशेष साइड इवेंट में किया गया।
पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने कहा कि घासभूमि, झाड़ियां और रैविन जैसे क्षेत्रों को लंबे समय से केवल पेड़ों की अनुपस्थिति के आधार पर देखा जाता रहा है। जबकि ये क्षेत्र जैव विविधता के संरक्षण के साथ-साथ स्थानीय और पशुपालक समुदायों की आजीविका में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि स्वस्थ घासभूमियां जैव विविधता, आजीविका और जलवायु लचीलेपन के लिए बेहद जरूरी हैं।
घासभूमि संरक्षण पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर जोर
मंत्री ने गाइड को भारत के खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र को पहचान देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों का संरक्षण केवल वनों के साथ नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधार पर समान प्राथमिकता के साथ किया जाना चाहिए।
यह गाइड पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के मार्गदर्शन में लॉन्च की गई। इसके प्रकाशन और कार्यक्रम का आयोजन Ashoka Trust for Research in Ecology and the Environment (ATREE) ने IUCN, Centre of Excellence on Sustainable Land Management, ICFRE और ISRO के Space Applications Centre के सहयोग से किया।
भारत के अलग-अलग प्राकृतिक क्षेत्रों की जानकारी शामिल
गाइड में भारत के प्रमुख Open Natural Ecosystems की भौगोलिक स्थिति, पारिस्थितिक विशेषताओं, जैव विविधता और इन क्षेत्रों से जुड़े समुदायों एवं जनजातियों की जानकारी शामिल की गई है।
इसमें हिमालयी और तराई की घासभूमि, थार और बन्नी क्षेत्र, दक्कन के सवाना, चट्टानी पठार, रैविन, झाड़ियां, तटीय पारिस्थितिकी तंत्र और रेगिस्तानी क्षेत्र शामिल हैं। ये पारिस्थितिकी तंत्र मिट्टी और जल प्रक्रियाओं में योगदान देने के साथ-साथ मिट्टी में कार्बन का भंडारण करते हैं और पशुपालन व कृषि आधारित आजीविका को सहारा देते हैं।
Land Degradation Neutrality लक्ष्य में मददगार
COP17 के दौरान विशेषज्ञों ने घासभूमि और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, जलवायु लचीलापन, रेंज लैंड गवर्नेंस और बड़े भू-दृश्य स्तर पर संरक्षण की जरूरत पर चर्चा की। साथ ही भारत के Land Degradation Neutrality (LDN) लक्ष्यों को हासिल करने में इन क्षेत्रों की बहाली की भूमिका पर भी जोर दिया गया।
भारत सरकार के अनुसार, यह गाइड नीति-निर्माताओं, शोधकर्ताओं, संरक्षण विशेषज्ञों, विकास एजेंसियों और स्थानीय समुदायों के लिए उपयोगी संसाधन साबित हो सकती है। इसके जरिए भारत के घासभूमि और अन्य खुले प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण, पुनर्स्थापना और टिकाऊ प्रबंधन को बढ़ावा देने की उम्मीद है।
स्रोत: प्रेस सूचना ब्यूरो (PIB), पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय
