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JPNIC पर सियासी संग्राम, योगी-अखिलेश आमने-सामने l
लखनऊ के जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर यानी JPNIC को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी पर सरकारी धन के दुरुपयोग और JPNIC को निजी हितों के लिए इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। वहीं अखिलेश यादव ने बीजेपी सरकार पर भ्रष्टाचार को संरक्षण देने का आरोप लगाते हुए पलटवार किया है
Kashish Rai30 अग. 2026, 02:12 PM IST

लखनऊ के जयप्रकाश नारायण इंटरनेशनल सेंटर यानी JPNIC को लेकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सियासी घमासान शुरू हो गया है। इस परियोजना को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक और समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव के बीच आरोप-प्रत्यारोप तेज हो गए हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और ब्रजेश पाठक ने समाजवादी पार्टी की पिछली सरकार पर JPNIC के निर्माण में सरकारी धन के दुरुपयोग का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि इस परियोजना की शुरुआती लागत करीब 200 करोड़ रुपये थी, लेकिन बाद में यह बढ़कर करीब 864 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। इसके बावजूद परियोजना पूरी तरह तैयार नहीं हो सकी।
सीएम योगी के मुताबिक, JPNIC को पूरा और कार्यात्मक बनाने के लिए अब भी करीब 150 से 200 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनता के पैसे से बनाई गई इस सरकारी संपत्ति को एक निजी व्यवस्था के जरिए यादव परिवार और उनके करीबियों के नियंत्रण में देने की कोशिश की गई थी। योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि JPNIC में होटल, जिम और क्लब जैसी सुविधाओं के संचालन के लिए एक ऐसी व्यवस्था तैयार की गई थी, जिससे इससे होने वाली कमाई परिवार और करीबियों तक पहुंच सके। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने सरकारी संपत्ति को निजी लाभ के लिए इस्तेमाल करने की योजना बनाई थी। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने भी अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि JPNIC परियोजना की लागत लगातार बढ़ती गई, लेकिन काम पूरा नहीं हुआ। उन्होंने दावा किया कि करीब 850 से 864 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद परियोजना का लगभग 60 प्रतिशत काम ही पूरा हो पाया।
ब्रजेश पाठक ने सवाल उठाया कि जब परियोजना की शुरुआती लागत 200 करोड़ रुपये थी, तो यह इतनी अधिक राशि तक कैसे पहुंच गई। उन्होंने कहा कि लागत बढ़ने के बावजूद काम अधूरा रहना गंभीर सवाल खड़े करता है और यह जांच का विषय है कि परियोजना से जुड़े ठेकेदारों और अधिकारियों की भूमिका क्या रही। डिप्टी सीएम ने यह भी आरोप लगाया कि JPNIC के संचालन के लिए एक निजी संचालन समिति बनाने की व्यवस्था की गई थी। उनके अनुसार, इस समिति में अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव और वासिफ हसन समेत कई लोगों के नाम शामिल थे। ब्रजेश पाठक ने इस व्यवस्था को “पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड” करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी संपत्ति का मालिकाना हक सरकार के पास रहते हुए उसके संचालन की जिम्मेदारी निजी और पारिवारिक लोगों को देने की कोशिश की गई। बीजेपी नेताओं का आरोप है कि यह व्यवस्था सरकारी संपत्ति को निजी नियंत्रण में लेने की योजना का हिस्सा थी।
JPNIC को लेकर सामने आए दस्तावेजों और रिपोर्टों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी सरकार के कार्यकाल में एक विशेष सोसायटी के गठन की व्यवस्था की गई थी। आरोप है कि इसके नियम इस तरह बनाए गए थे कि सत्ता परिवर्तन के बाद भी इसका नियंत्रण यादव परिवार और उनके करीबी लोगों के पास बना रहे। इस सोसायटी में अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, राजेंद्र चौधरी, पूर्व मुख्यमंत्री के निजी सचिव गजेंद्र सिंह, अंजू नारायण, वासिफ हसन और अनुपमा प्रकाश समेत कई लोगों के नाम बताए गए हैं। बीजेपी इसी व्यवस्था को लेकर सपा पर परिवारवाद और सरकारी संपत्ति के निजी इस्तेमाल का आरोप लगा रही है। अखिलेश यादव ने बीजेपी के आरोपों पर सोशल मीडिया के जरिए तीखा पलटवार किया। उन्होंने योगी सरकार पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी सरकार में भ्रष्टाचार का “स्वर्ण ठोसीकरण” हो रहा है।
अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा कि मुख्यमंत्री जनता के सामने ऐसा मॉडल रख रहे हैं, जिसमें किसी को JPNIC दे दिया जाए और उसके बदले ईंट के बजाय सोने की सिल्ली ले ली जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार भ्रष्टाचार को छिपाने और राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने की कोशिश कर रही है। सपा प्रमुख ने यह भी कहा कि बीजेपी सरकार के दौरान किए जा रहे कथित भ्रष्टाचार की सच्चाई एक दिन जनता के सामने जरूर आएगी। उन्होंने धार्मिक मुद्दों का जिक्र करते हुए बीजेपी पर राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। JPNIC को लेकर विवाद उस समय और बढ़ गया, जब उत्तर प्रदेश सरकार ने इस अधूरे केंद्र को निजी कंपनियों को लंबे समय की लीज पर देने का फैसला किया। सरकार ने इसे बेचने के बजाय संचालन के लिए लीज पर देने की बात कही है। सरकार का कहना है कि JPNIC का मालिकाना हक राज्य सरकार और लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी LDA के पास ही रहेगा।
सरकार के अनुसार, परियोजना को पूरा कर जनता के इस्तेमाल के लिए तैयार करने और इसके संचालन के लिए निजी क्षेत्र की मदद ली जा रही है। JPNIC में कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स फैसिलिटी और म्यूजियम जैसी सुविधाएं विकसित की जानी हैं।
ब्रजेश पाठक ने कहा कि JPNIC को किसी को बेचा नहीं गया है, बल्कि संचालन के लिए लीज पर दिया गया है। उन्होंने दावा किया कि इसके लिए खुली प्रतियोगिता और टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई। सरकार का कहना है कि निजी संचालन के बावजूद संपत्ति का स्वामित्व राज्य सरकार के पास ही रहेगा। वहीं, समाजवादी पार्टी इस फैसले का विरोध कर रही है। सपा का आरोप है कि बीजेपी सरकार सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंप रही है और JPNIC को लीज पर देने का फैसला राजनीतिक बदले की कार्रवाई है। पार्टी का कहना है कि JPNIC समाजवादी विचारधारा और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विरासत से जुड़ा केंद्र है, इसलिए इसका निजीकरण या निजी संचालन स्वीकार नहीं किया जा सकता।
JPNIC को लेकर विवाद केवल वित्तीय आरोपों तक सीमित नहीं है। यह परियोजना लंबे समय से बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक टकराव का प्रतीक बनी हुई है। अखिलेश यादव इसे अपने कार्यकाल की प्रमुख परियोजनाओं में गिनाते रहे हैं, जबकि बीजेपी इसे सपा शासन के कथित भ्रष्टाचार और परिवारवाद का उदाहरण बताती है। सरकार का कहना है कि JPNIC के कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम, खेल सुविधाओं और संग्रहालय को जनता के लिए विकसित किया जाएगा। वहीं सपा का आरोप है कि सरकारी संपत्ति के संचालन के नाम पर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। फिलहाल JPNIC को लेकर दोनों पक्ष अपने-अपने आरोपों पर कायम हैं। बीजेपी लागत बढ़ने, काम अधूरा रहने और संचालन समिति में परिवार से जुड़े लोगों की मौजूदगी को मुद्दा बना रही है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी लीज प्रक्रिया, निजी कंपनियों की भूमिका और सरकार के कथित भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठा रही है। JPNIC विवाद ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी और सपा के बीच राजनीतिक संघर्ष को और तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में इस परियोजना से जुड़े दस्तावेज, लीज प्रक्रिया और निर्माण लागत की जांच को लेकर बहस और बढ़ने की संभावना है।
सीएम योगी के मुताबिक, JPNIC को पूरा और कार्यात्मक बनाने के लिए अब भी करीब 150 से 200 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ सकती है। उन्होंने आरोप लगाया कि जनता के पैसे से बनाई गई इस सरकारी संपत्ति को एक निजी व्यवस्था के जरिए यादव परिवार और उनके करीबियों के नियंत्रण में देने की कोशिश की गई थी। योगी आदित्यनाथ ने दावा किया कि JPNIC में होटल, जिम और क्लब जैसी सुविधाओं के संचालन के लिए एक ऐसी व्यवस्था तैयार की गई थी, जिससे इससे होने वाली कमाई परिवार और करीबियों तक पहुंच सके। मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि समाजवादी पार्टी की सरकार ने सरकारी संपत्ति को निजी लाभ के लिए इस्तेमाल करने की योजना बनाई थी। डिप्टी सीएम ब्रजेश पाठक ने भी अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि JPNIC परियोजना की लागत लगातार बढ़ती गई, लेकिन काम पूरा नहीं हुआ। उन्होंने दावा किया कि करीब 850 से 864 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद परियोजना का लगभग 60 प्रतिशत काम ही पूरा हो पाया।
ब्रजेश पाठक ने सवाल उठाया कि जब परियोजना की शुरुआती लागत 200 करोड़ रुपये थी, तो यह इतनी अधिक राशि तक कैसे पहुंच गई। उन्होंने कहा कि लागत बढ़ने के बावजूद काम अधूरा रहना गंभीर सवाल खड़े करता है और यह जांच का विषय है कि परियोजना से जुड़े ठेकेदारों और अधिकारियों की भूमिका क्या रही। डिप्टी सीएम ने यह भी आरोप लगाया कि JPNIC के संचालन के लिए एक निजी संचालन समिति बनाने की व्यवस्था की गई थी। उनके अनुसार, इस समिति में अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव और वासिफ हसन समेत कई लोगों के नाम शामिल थे। ब्रजेश पाठक ने इस व्यवस्था को “पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड” करार दिया। उन्होंने कहा कि सरकारी संपत्ति का मालिकाना हक सरकार के पास रहते हुए उसके संचालन की जिम्मेदारी निजी और पारिवारिक लोगों को देने की कोशिश की गई। बीजेपी नेताओं का आरोप है कि यह व्यवस्था सरकारी संपत्ति को निजी नियंत्रण में लेने की योजना का हिस्सा थी।
JPNIC को लेकर सामने आए दस्तावेजों और रिपोर्टों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी सरकार के कार्यकाल में एक विशेष सोसायटी के गठन की व्यवस्था की गई थी। आरोप है कि इसके नियम इस तरह बनाए गए थे कि सत्ता परिवर्तन के बाद भी इसका नियंत्रण यादव परिवार और उनके करीबी लोगों के पास बना रहे। इस सोसायटी में अखिलेश यादव, डिंपल यादव, धर्मेंद्र यादव, राजेंद्र चौधरी, पूर्व मुख्यमंत्री के निजी सचिव गजेंद्र सिंह, अंजू नारायण, वासिफ हसन और अनुपमा प्रकाश समेत कई लोगों के नाम बताए गए हैं। बीजेपी इसी व्यवस्था को लेकर सपा पर परिवारवाद और सरकारी संपत्ति के निजी इस्तेमाल का आरोप लगा रही है। अखिलेश यादव ने बीजेपी के आरोपों पर सोशल मीडिया के जरिए तीखा पलटवार किया। उन्होंने योगी सरकार पर भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का आरोप लगाते हुए कहा कि बीजेपी सरकार में भ्रष्टाचार का “स्वर्ण ठोसीकरण” हो रहा है।
अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा कि मुख्यमंत्री जनता के सामने ऐसा मॉडल रख रहे हैं, जिसमें किसी को JPNIC दे दिया जाए और उसके बदले ईंट के बजाय सोने की सिल्ली ले ली जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार भ्रष्टाचार को छिपाने और राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने की कोशिश कर रही है। सपा प्रमुख ने यह भी कहा कि बीजेपी सरकार के दौरान किए जा रहे कथित भ्रष्टाचार की सच्चाई एक दिन जनता के सामने जरूर आएगी। उन्होंने धार्मिक मुद्दों का जिक्र करते हुए बीजेपी पर राजनीतिक और धार्मिक भावनाओं का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। JPNIC को लेकर विवाद उस समय और बढ़ गया, जब उत्तर प्रदेश सरकार ने इस अधूरे केंद्र को निजी कंपनियों को लंबे समय की लीज पर देने का फैसला किया। सरकार ने इसे बेचने के बजाय संचालन के लिए लीज पर देने की बात कही है। सरकार का कहना है कि JPNIC का मालिकाना हक राज्य सरकार और लखनऊ विकास प्राधिकरण यानी LDA के पास ही रहेगा।
सरकार के अनुसार, परियोजना को पूरा कर जनता के इस्तेमाल के लिए तैयार करने और इसके संचालन के लिए निजी क्षेत्र की मदद ली जा रही है। JPNIC में कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम, स्पोर्ट्स फैसिलिटी और म्यूजियम जैसी सुविधाएं विकसित की जानी हैं।
ब्रजेश पाठक ने कहा कि JPNIC को किसी को बेचा नहीं गया है, बल्कि संचालन के लिए लीज पर दिया गया है। उन्होंने दावा किया कि इसके लिए खुली प्रतियोगिता और टेंडर प्रक्रिया अपनाई गई। सरकार का कहना है कि निजी संचालन के बावजूद संपत्ति का स्वामित्व राज्य सरकार के पास ही रहेगा। वहीं, समाजवादी पार्टी इस फैसले का विरोध कर रही है। सपा का आरोप है कि बीजेपी सरकार सरकारी संपत्तियों को निजी हाथों में सौंप रही है और JPNIC को लीज पर देने का फैसला राजनीतिक बदले की कार्रवाई है। पार्टी का कहना है कि JPNIC समाजवादी विचारधारा और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विरासत से जुड़ा केंद्र है, इसलिए इसका निजीकरण या निजी संचालन स्वीकार नहीं किया जा सकता।
JPNIC को लेकर विवाद केवल वित्तीय आरोपों तक सीमित नहीं है। यह परियोजना लंबे समय से बीजेपी और समाजवादी पार्टी के बीच राजनीतिक टकराव का प्रतीक बनी हुई है। अखिलेश यादव इसे अपने कार्यकाल की प्रमुख परियोजनाओं में गिनाते रहे हैं, जबकि बीजेपी इसे सपा शासन के कथित भ्रष्टाचार और परिवारवाद का उदाहरण बताती है। सरकार का कहना है कि JPNIC के कन्वेंशन सेंटर, ऑडिटोरियम, खेल सुविधाओं और संग्रहालय को जनता के लिए विकसित किया जाएगा। वहीं सपा का आरोप है कि सरकारी संपत्ति के संचालन के नाम पर निजी कंपनियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की जा रही है। फिलहाल JPNIC को लेकर दोनों पक्ष अपने-अपने आरोपों पर कायम हैं। बीजेपी लागत बढ़ने, काम अधूरा रहने और संचालन समिति में परिवार से जुड़े लोगों की मौजूदगी को मुद्दा बना रही है। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी लीज प्रक्रिया, निजी कंपनियों की भूमिका और सरकार के कथित भ्रष्टाचार को लेकर सवाल उठा रही है। JPNIC विवाद ने उत्तर प्रदेश में बीजेपी और सपा के बीच राजनीतिक संघर्ष को और तेज कर दिया है। आने वाले दिनों में इस परियोजना से जुड़े दस्तावेज, लीज प्रक्रिया और निर्माण लागत की जांच को लेकर बहस और बढ़ने की संभावना है।
