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छात्र प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा स्पष्टीकरण: राज्य कानून के तहत वापस ले सकते हैं FIR, 'क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स' का मतलब केवल गंभीर अपराध

20 जुलाई के छात्र प्रदर्शन के बाद दर्ज सैकड़ों एफआईआर और पुलिस कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा स्पष्टीकरण दिया है। अदालत ने साफ किया कि राज्य सरकारें कानून के अनुसार छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर बंद (Closure Report) करने या मुकदमे वापस लेने के लिए स्वतंत्र हैं। साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि "क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स" का मतलब केवल गंभीर और जघन्य अपराधों से है, सामान्य मामलों में फंसे छात्रों से नहीं।

Sonali04 अग. 2026, 06:27 PM IST
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छात्र प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा स्पष्टीकरण: राज्य कानून के तहत वापस ले सकते हैं FIR, 'क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स' का मतलब केवल गंभीर अपराध


नई दिल्ली: कोर्ट ने 3 अगस्त 2026 (सोमवार) को 20 जुलाई के "चलो संसद" छात्र प्रदर्शन से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण जारी किया। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन की खंडपीठ ने कहा कि 28 जुलाई के अंतरिम आदेश का उद्देश्य किसी भी राज्य सरकार को कानून के अनुसार एफआईआर बंद (Closure Report) करने या आगे की कार्रवाई वापस लेने से रोकना नहीं था। राज्य सरकारें उपलब्ध वैधानिक प्रक्रिया के अनुसार ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हैं। 

कोर्ट ने स्पष्ट किया- 'क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स' का मतलब क्या है?

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने "क्रिमिनल एंटीसिडेंट्स" शब्द को स्पष्ट करने की मांग की। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसका अर्थ केवल गंभीर और जघन्य अपराध (Grievous/Heinous Offences) हैं। छोटे-मोटे या सामान्य मामलों में नाम आने वाले छात्रों को इस आधार पर राहत से वंचित नहीं किया जाएगा। 

राज्यों को कानून के अनुसार करनी होगी कार्रवाई

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि केंद्र सरकार छात्रों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेने की अपनी प्रतिबद्धता पर कायम है, लेकिन भारतीय कानून में एफआईआर सीधे वापस लेने का प्रावधान नहीं है। इसलिए राज्यों को कानून के तहत उपलब्ध प्रक्रिया, जैसे क्लोजर रिपोर्ट या अन्य वैधानिक उपायों का पालन करना होगा। सरकार इस संबंध में विभिन्न कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है। 

सुप्रीम कोर्ट ने दिया संतुलित संदेश

सुनवाई के दौरान CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट कहा कि अदालत किसी एक पक्ष को संरक्षण देने के पक्ष में नहीं है। यदि पुलिस ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ अत्यधिक बल प्रयोग किया है तो संबंधित अधिकारियों को भी जवाबदेह ठहराया जाएगा। वहीं छात्र आंदोलन की आड़ में यदि किसी ने हिंसा या गंभीर अपराध किया है तो उसे भी कानून का सामना करना होगा। अदालत ने कहा कि न पुलिस की ज्यादती स्वीकार होगी और न ही हिंसक प्रदर्शनकारियों को संरक्षण मिलेगा। 

पेलेट गन और पुलिस कार्रवाई पर बन सकता है प्रोटोकॉल

सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा कथित पेलेट गन के इस्तेमाल, लाठीचार्ज, फेशियल रिकग्निशन तकनीक और बायोमेट्रिक निगरानी जैसे मुद्दे भी उठाए गए। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि नागरिक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पेलेट गन के इस्तेमाल को लेकर भविष्य में एक मानक प्रोटोकॉल (Standard Protocol) तैयार किया जा सकता है।

जस्टिस बागची ने दिया महत्वपूर्ण संकेत

न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि यदि आवश्यकता हुई तो सुप्रीम कोर्ट स्वयं एफआईआर समाप्त करने की एक समान और उपयुक्त प्रक्रिया तय कर सकता है, ताकि छात्रों को अनावश्यक कानूनी परेशानियों का सामना न करना पड़े। 

व्यापक एफआईआर पर भी जताई गई चिंता

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने कहा कि हजारों अज्ञात लोगों के खिलाफ दर्ज व्यापक (Catch-all) एफआईआर का दुरुपयोग हो सकता है। उनका कहना था कि ऐसी एफआईआर भविष्य में निर्दोष छात्रों को परेशान करने का माध्यम बन सकती हैं। इस मुद्दे पर भी अदालत ने गंभीरता दिखाई। 

28 जुलाई के आदेश का भी किया गया उल्लेख

सुप्रीम कोर्ट ने याद दिलाया कि 28 जुलाई के अंतरिम आदेश में छात्रों के खिलाफ कठोर कार्रवाई पर रोक, सीसीटीवी और अन्य डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने, नाबालिग छात्रों को राहत देने तथा पुलिस कार्रवाई की जांच जैसे निर्देश दिए गए थे। 3 अगस्त का आदेश उसी अंतरिम आदेश का स्पष्टीकरण है। 

राजनीतिक प्रतिक्रिया भी आई

सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण के बाद छात्र आंदोलन से जुड़े संगठन CJP ने इसे युवाओं की बड़ी जीत बताते हुए केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों से छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने की प्रक्रिया तुरंत शुरू करने की मांग की। हालांकि यह राजनीतिक प्रतिक्रिया है और अदालत के आदेश का हिस्सा नहीं है। 

मामला सुप्रीम कोर्ट तक कैसे पहुंचा?

20 जुलाई 2026 को हुए "चलो संसद" छात्र प्रदर्शन के दौरान कई राज्यों में पुलिस कार्रवाई, लाठीचार्ज, पेलेट गन के कथित इस्तेमाल और बड़ी संख्या में दर्ज एफआईआर को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थीं। याचिकाओं में पुलिस की कथित बर्बरता, छात्रों के मौलिक अधिकारों और शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार का मुद्दा उठाया गया था। दूसरी ओर, पुलिस ने प्रदर्शन के दौरान हिंसा और पुलिसकर्मियों के घायल होने का पक्ष रखा। 

आदेश विवरण

  • आदेश की तारीख: 3 अगस्त 2026 (सोमवार)

  • अदालत: सुप्रीम कोर्ट

  • पीठ: CJI सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहन

  • मुख्य आदेश: राज्य सरकारें कानून के अनुसार छात्रों के खिलाफ दर्ज एफआईआर बंद (Closure Report) करने या मुकदमे वापस लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

  • अगली सुनवाई: 18 अगस्त 2026।