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बप्पा, नगर निगम को सद्बुद्धि दो! पीओपी-शाडू विवाद बरकरार; पर्यावरण और मूर्तिकारों की आजीविका के बीच बढ़ा संघर्ष
गणेशोत्सव में अब कुछ ही दिन शेष हैं, लेकिन महाराष्ट्र में एक बार फिर पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) और शाडू मिट्टी से बनने वाली गणेश प्रतिमाओं को लेकर विवाद गहरा गया है। कल्याण-डोंबिवली समेत राज्य के कई हिस्सों में मूर्तिकारों का कहना है कि पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव के लिए शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है, लेकिन मिट्टी की बढ़ती कीमत, सीमित उपलब्धता और सरकारी नीति में स्पष्टता की कमी के कारण हजारों कारीगर आर्थिक संकट का सामना कर रहे हैं। वहीं पर्यावरण विशेषज्ञ जल प्रदूषण को रोकने के लिए पीओपी के बजाय शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं के उपयोग पर जोर दे रहे हैं।
Priyanka Gaikwad03 अग. 2026, 05:38 PM IST

गणेशोत्सव महाराष्ट्र की संस्कृति, आस्था और परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। हर वर्ष हजारों मूर्तिकार महीनों पहले से गणेश प्रतिमाओं के निर्माण में जुट जाते हैं। इस वर्ष भी गणेशोत्सव की तैयारियां जोरों पर हैं, लेकिन पीओपी (प्लास्टर ऑफ पेरिस) और शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं को लेकर विवाद फिर चर्चा का विषय बन गया है। कल्याण-डोंबिवली, ठाणे, मुंबई, पुणे सहित राज्य के कई हिस्सों के मूर्तिकारों ने सरकार की मौजूदा नीति पर सवाल उठाए हैं। मूर्तिकारों का कहना है कि उन्हें पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव से कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन यदि सरकार और स्थानीय निकाय केवल शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देना चाहते हैं, तो इसके लिए पर्याप्त मात्रा में शाडू मिट्टी उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। उनका दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में शाडू मिट्टी की कीमत में लगातार वृद्धि हुई है, जिससे छोटे और मध्यम वर्ग के मूर्तिकारों के लिए प्रतिमा निर्माण का खर्च काफी बढ़ गया है।
कल्याण क्षेत्र की कई कार्यशालाओं में आज भी पीओपी और शाडू मिट्टी, दोनों प्रकार की प्रतिमाएं बनाई जा रही हैं। मूर्तिकारों के अनुसार बाजार में दोनों प्रकार की प्रतिमाओं की मांग बनी हुई है। ऐसे में सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि पीओपी प्रतिमाओं पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया जाएगा या नियंत्रित शर्तों के साथ उनके निर्माण और बिक्री की अनुमति दी जाएगी। कल्याण गणेश मूर्तिकार सेवा संस्था के अध्यक्ष नरेश चव्हाण ने मीडिया से बातचीत में कहा, "हम पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव के खिलाफ नहीं हैं। लेकिन नगर निगम की ओर से मिलने वाली शाडू मिट्टी पर्याप्त नहीं है। यदि सरकार केवल शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं को ही बढ़ावा देना चाहती है, तो मूर्तिकारों को पर्याप्त मिट्टी, प्रशिक्षण और आर्थिक सहायता भी उपलब्ध करानी चाहिए।
" यह उनका व्यक्तिगत दावा है, जिसकी स्वतंत्र सरकारी पुष्टि उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर, कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) के उप आयुक्त रामदास कोकरे ने कहा कि नगर निगम की नीति पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव को प्रोत्साहित करने की है। उन्होंने बताया कि शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देने के लिए जनजागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यशालाएं और अन्य आवश्यक पहल की जा रही हैं। इस बीच, प्रतिमाओं की ऊंचाई और विसर्जन को लेकर भी नियम लागू किए गए हैं। बड़ी प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए विशेष व्यवस्था, कृत्रिम विसर्जन तालाब और पर्यावरण-अनुकूल विसर्जन पद्धति अपनाने पर प्रशासन विशेष जोर दे रहा है।
कई नगर निगमों ने इस वर्ष भी कृत्रिम विसर्जन कुंड, निर्माल्य संग्रह केंद्र और पर्यावरण संरक्षण अभियान शुरू किए हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पीओपी से बनी प्रतिमाएं पानी में आसानी से नहीं घुलतीं। इनमें इस्तेमाल होने वाले रासायनिक रंग और अन्य पदार्थ नदियों, तालाबों और समुद्र के जल को प्रदूषित करते हैं तथा जलीय जीवों के लिए भी हानिकारक साबित हो सकते हैं। इसी कारण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और विभिन्न न्यायालय समय-समय पर शाडू मिट्टी, प्राकृतिक रंगों और पर्यावरण-अनुकूल सजावट के उपयोग पर जोर देते रहे हैं।
" यह उनका व्यक्तिगत दावा है, जिसकी स्वतंत्र सरकारी पुष्टि उपलब्ध नहीं है। दूसरी ओर, कल्याण-डोंबिवली महानगरपालिका (KDMC) के उप आयुक्त रामदास कोकरे ने कहा कि नगर निगम की नीति पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव को प्रोत्साहित करने की है। उन्होंने बताया कि शाडू मिट्टी की प्रतिमाओं को बढ़ावा देने के लिए जनजागरूकता अभियान, प्रशिक्षण कार्यशालाएं और अन्य आवश्यक पहल की जा रही हैं। इस बीच, प्रतिमाओं की ऊंचाई और विसर्जन को लेकर भी नियम लागू किए गए हैं। बड़ी प्रतिमाओं के विसर्जन के लिए विशेष व्यवस्था, कृत्रिम विसर्जन तालाब और पर्यावरण-अनुकूल विसर्जन पद्धति अपनाने पर प्रशासन विशेष जोर दे रहा है।
कई नगर निगमों ने इस वर्ष भी कृत्रिम विसर्जन कुंड, निर्माल्य संग्रह केंद्र और पर्यावरण संरक्षण अभियान शुरू किए हैं। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि पीओपी से बनी प्रतिमाएं पानी में आसानी से नहीं घुलतीं। इनमें इस्तेमाल होने वाले रासायनिक रंग और अन्य पदार्थ नदियों, तालाबों और समुद्र के जल को प्रदूषित करते हैं तथा जलीय जीवों के लिए भी हानिकारक साबित हो सकते हैं। इसी कारण केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और विभिन्न न्यायालय समय-समय पर शाडू मिट्टी, प्राकृतिक रंगों और पर्यावरण-अनुकूल सजावट के उपयोग पर जोर देते रहे हैं।
हालांकि, मूर्तिकारों का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ हजारों कारीगरों और उनके परिवारों की आजीविका का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। यदि सरकार शाडू मिट्टी आसानी से उपलब्ध कराए, उत्पादन लागत पर अनुदान दे, प्रशिक्षण की व्यवस्था करे और बाजार उपलब्ध कराए, तो पर्यावरण-अनुकूल गणेशोत्सव को और अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। कुल मिलाकर, गणेशोत्सव से पहले एक बार फिर पर्यावरण संरक्षण और हजारों मूर्तिकारों के रोजगार के बीच संतुलन बनाने का सवाल सामने आ गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार, स्थानीय निकाय, पर्यावरणविदों और मूर्तिकारों के समन्वय से ही इस विवाद का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।
