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भारत के विकास का आधार उत्पादनवाद या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा? बेहतर शिक्षा के बिना विकास की रफ्तार अधूरी

भारत को वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनना है, तो केवल उत्पादन बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। देश के दीर्घकालीन विकास के लिए गुणवत्तापूर्ण और समावेशी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करना बेहद जरूरी है। स्कूलों की घटती संख्या, शिक्षकों की कमी, शिक्षा में बढ़ती असमानता और सरकारी शिक्षा व्यवस्था की चुनौतियों के कारण भारत के मानव संसाधन की गुणवत्ता को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने के साथ हर विद्यार्थी को बेहतर शिक्षा, आवश्यक कौशल और समान अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है।

Priyanka Gaikwad12 अग. 2026, 08:30 PM IST
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भारत के विकास का आधार उत्पादनवाद या गुणवत्तापूर्ण शिक्षा? बेहतर शिक्षा के बिना विकास की रफ्तार अधूरी
भारत के विकास के सामने आर्थिक वृद्धि के साथ-साथ मानव संसाधनों की गुणवत्ता का मुद्दा भी महत्वपूर्ण होता जा रहा है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने विज्ञान, तकनीक, उद्योग और सेवा क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। हालांकि, इस विकास को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए देश की शिक्षा व्यवस्था को और मजबूत करना जरूरी है। लेख में नीति आयोग और शिक्षा मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया है कि वर्ष 2017-18 से 2022-23 के बीच देश में करीब 92 हजार स्कूल बंद हुए हैं। वहीं, एक लाख से अधिक स्कूलों के एक-शिक्षक वाले होने का भी उल्लेख किया गया है। ये आंकड़े विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराने के सामने मौजूद चुनौतियों को उजागर करते हैं।

शिक्षा का रोजगार और आर्थिक विकास से सीधा संबंध है। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की गुणवत्ता का असर आगे की पढ़ाई, कौशल विकास और रोजगार के अवसरों पर पड़ता है। इसलिए केवल स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि विद्यार्थियों को वास्तव में अच्छी गुणवत्ता वाली शिक्षा मिल रही है या नहीं। लेख में दिल्ली के सरकारी स्कूलों में हुए कुछ सकारात्मक बदलावों का भी उल्लेख किया गया है। हालांकि, इस तरह के सुधारों को देशभर में बड़े स्तर पर लागू करने के लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन, प्रशिक्षित शिक्षक, आधुनिक शैक्षणिक साधन, डिजिटल सुविधाएं और बेहतर बुनियादी ढांचा जरूरी है। ग्रामीण और वंचित क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के समान अवसर मिलना बेहद महत्वपूर्ण है।

शिक्षकों की कमी और स्थायी नियुक्तियों पर पर्याप्त ध्यान न दिया जाना भी शिक्षा व्यवस्था की एक बड़ी चुनौती है। कुछ निजी महाविद्यालयों में स्थायी शिक्षकों की नियुक्ति के लिए बड़ी आर्थिक लागत आती है। वहीं, सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में भी आवश्यक मानव संसाधन और सुविधाओं की कमी दिखाई देती है। दूसरी ओर, केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देकर भारत लंबे समय तक वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे नहीं रह सकता। अमेरिका, चीन, जापान और अन्य विकसित देशों ने शिक्षा, शोध और नवाचार के क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश किया है। भारत को भी उत्पादन क्षेत्र के साथ-साथ शिक्षा, अनुसंधान और कौशल विकास को अपनी विकास नीति के केंद्र में रखना होगा।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल आर्थिक विकास का साधन नहीं, बल्कि प्रत्येक विद्यार्थी के बेहतर भविष्य की बुनियाद है। बच्चों को अच्छा शिक्षण वातावरण, स्वास्थ्य, डिजिटल सुविधाएं और कौशल विकास के अवसर मिलेंगे, तो भारत का मानव संसाधन और मजबूत होगा। इसलिए भारत के विकास का वास्तविक आधार केवल उत्पादन बढ़ाने में नहीं, बल्कि उत्पादन वृद्धि के साथ गुणवत्तापूर्ण, समान और समावेशी शिक्षा व्यवस्था तैयार करने में है। बेहतर शिक्षा से ही देश को कुशल मानव संसाधन मिलेगा और यही मानव संसाधन भारत को दीर्घकालीन आर्थिक, सामाजिक और वैश्विक प्रगति की दिशा में आगे ले जा सकता है।