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घर और ज़मीन पर बढ़ रहा महिलाओं का अधिकार, NFHS-5 रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के अनुसार, भारत में 15-49 वर्ष आयु वर्ग की 42.3% महिलाएं अकेले या संयुक्त रूप से घर की मालिक हैं, जबकि 31.7% महिलाओं के पास भूमि का स्वामित्व है। महिलाओं की आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण और शहरी), दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन और महिला समृद्धि योजना जैसी योजनाएं चला रही है। इसके अलावा भूमि रिकॉर्ड में जेंडर कॉलम जोड़ने की पहल भी की गई है, जिससे महिलाओं के भूमि स्वामित्व का सटीक रिकॉर्ड तैयार किया जा सके।

Vindhya Dubey05 अग. 2026, 08:10 PM IST
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घर और ज़मीन पर बढ़ रहा महिलाओं का अधिकार, NFHS-5 रिपोर्ट में बड़ा खुलासा

नई दिल्ली: महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और सामाजिक सशक्तिकरण को मजबूत करने के लिए केंद्र सरकार लगातार ऐसी योजनाओं को बढ़ावा दे रही है, जिनका उद्देश्य महिलाओं को घर और जमीन जैसी संपत्तियों का मालिकाना हक दिलाना है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (National Family Health Survey-NFHS-5) के ताजा उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि देश में 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग की 42.3 प्रतिशत महिलाएं अकेले या संयुक्त रूप से किसी घर की मालिक हैं, जबकि 31.7 प्रतिशत महिलाएं अकेले या संयुक्त रूप से भूमि की मालिक हैं।

यह जानकारी महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री सावित्री ठाकुर ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी। उन्होंने बताया कि महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार की कई योजनाएं संपत्ति के स्वामित्व को प्रोत्साहित कर रही हैं, जिससे महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक स्थिति दोनों मजबूत हो रही हैं।

NFHS-5 क्या है?
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के तहत आयोजित देश का सबसे व्यापक सामाजिक-स्वास्थ्य सर्वेक्षण है। इसका संचालन अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप किया जाता है और इसमें स्वास्थ्य, पोषण, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, परिवार नियोजन, शिक्षा, महिलाओं की स्थिति, घरेलू निर्णयों में भागीदारी, संपत्ति का स्वामित्व और अन्य सामाजिक-आर्थिक संकेतकों से जुड़ा डेटा एकत्र किया जाता है।

NFHS-5 का सर्वेक्षण वर्ष 2019-21 के दौरान किया गया था और यह नीति निर्माण के लिए भारत का सबसे महत्वपूर्ण सामाजिक डेटा स्रोत माना जाता है।

क्या कहते हैं आंकड़े?
सर्वेक्षण के अनुसार, देश में 15 से 49 वर्ष आयु वर्ग के 42.3 प्रतिशत महिलाओं के पास अकेले या संयुक्त रूप से घर का स्वामित्व है, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 60.1 प्रतिशत है। भूमि स्वामित्व के मामले में 31.7 प्रतिशत महिलाएं अकेले या संयुक्त रूप से जमीन की मालिक हैं, जबकि पुरुषों में यह प्रतिशत 42.3 है। हालांकि महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी पुरुषों से कम है, लेकिन पिछले वर्षों में सरकारी योजनाओं के कारण महिलाओं के नाम पर संपत्ति पंजीकरण और संयुक्त स्वामित्व में लगातार वृद्धि देखी गई है।

किन योजनाओं से मिल रहा लाभ?
महिलाओं को संपत्ति का अधिकार और आर्थिक सुरक्षा देने के लिए केंद्र सरकार कई प्रमुख योजनाएं चला रही है। प्रधानमंत्री आवास योजना-ग्रामीण (PMAY-G) के तहत घर का आवंटन प्राथमिकता से महिला के नाम या पति-पत्नी के संयुक्त नाम पर किया जाता है। केवल विशेष परिस्थितियों, जैसे अविवाहित, विधुर, अलग रह रहे व्यक्ति या ट्रांसजेंडर लाभार्थी के मामलों में अलग व्यवस्था लागू होती है। प्रधानमंत्री आवास योजना-शहरी (PMAY-Urban) में भी यह अनिवार्य किया गया है कि घर की महिला मुखिया को मालिक या सह-मालिक बनाया जाए। इस प्रावधान का उद्देश्य महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा बढ़ाना और परिवार में उनकी निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करना है।

इसके अलावा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत संचालित दीनदयाल अंत्योदय योजना-राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (DAY-NRLM) स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के माध्यम से महिलाओं को स्वरोजगार, वित्तीय साक्षरता, बैंक ऋण और आय बढ़ाने के अवसर उपलब्ध कराती है। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग की महिला समृद्धि योजना भी महिलाओं को स्वरोजगार और वित्तीय सहायता उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

भूमि रिकॉर्ड में होगा महिलाओं का अलग रिकॉर्ड
महिलाओं की वास्तविक हिस्सेदारी दर्ज करने के लिए भूमि संसाधन विभाग (Department of Land Resources) ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को भूमि अभिलेखों (Record of Rights-RoR) में 'जेंडर कॉलम' जोड़ने का सुझाव दिया है। इससे यह स्पष्ट रूप से दर्ज हो सकेगा कि कितनी महिलाएं भूमि की मालिक हैं और भविष्य में महिला भूमि स्वामित्व से जुड़े आंकड़े अधिक सटीक रूप से उपलब्ध हो सकेंगे।

यह कदम क्यों महत्वपूर्ण है?
विशेषज्ञों के अनुसार, किसी महिला के नाम पर घर या जमीन होना केवल संपत्ति का अधिकार नहीं बल्कि आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और निर्णय लेने की क्षमता का प्रतीक है। जिन महिलाओं के पास संपत्ति होती है, वे परिवार और समाज में अधिक आत्मनिर्भर होती हैं, उन्हें बैंक ऋण मिलने में आसानी होती है, उद्यम शुरू करने के अवसर बढ़ते हैं और घरेलू हिंसा व आर्थिक असुरक्षा का जोखिम भी अपेक्षाकृत कम होता है।

विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र महिला (UN Women) और कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में भी यह पाया गया है कि महिलाओं के नाम पर संपत्ति होने से बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और परिवार की आर्थिक स्थिरता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

महिला सशक्तिकरण की दिशा में बड़ा कदम
सरकार का मानना है कि महिला सशक्तिकरण केवल रोजगार तक सीमित नहीं है, बल्कि संपत्ति पर अधिकार भी इसका महत्वपूर्ण आधार है। इसी सोच के तहत आवास योजनाओं में महिला स्वामित्व को प्राथमिकता दी जा रही है और भूमि रिकॉर्ड को अधिक पारदर्शी बनाया जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि संपत्ति के स्वामित्व के साथ महिलाओं को वित्तीय साक्षरता, बैंकिंग सेवाओं, उद्यमिता और कानूनी जागरूकता से भी जोड़ा जाए, तो यह भारत में लैंगिक समानता और समावेशी विकास की दिशा में बड़ा परिवर्तन साबित हो सकता है।

केंद्र सरकार की ये पहलें महिलाओं को केवल घर या जमीन का मालिक बनाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर, सामाजिक रूप से सशक्त और परिवार के निर्णयों में अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार प्रदान कर रही हैं। यह प्रयास 'नारी शक्ति' को विकास की मुख्यधारा में लाने और आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।