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रेलवे कर्मचारी के सरकारी आवास पर बुलडोजर कार्रवाई, बिना नोटिस मकान गिराने का आरोप; रेलवे ने बताया कंडेम भवन

लखनऊ में उत्तर रेलवे के एक सरकारी आवास को ध्वस्त किए जाने पर विवाद खड़ा हो गया है। कर्मचारी के परिवार ने बिना पूर्व सूचना और पर्याप्त समय दिए बुलडोजर चलाने का आरोप लगाया है, जबकि रेलवे प्रशासन का कहना है कि भवन पहले ही कंडेम घोषित किया जा चुका था और सुरक्षा कारणों से उसे हटाया गया। मामला अब प्रशासनिक प्रक्रिया और सरकारी आवासों के प्रबंधन पर सवाल खड़े कर रहा है।

Anshuman Mishra06 अग. 2026, 06:36 PM IST
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रेलवे कर्मचारी के सरकारी आवास पर बुलडोजर कार्रवाई, बिना नोटिस मकान गिराने का आरोप; रेलवे ने बताया कंडेम भवन


लखनऊ: उत्तर रेलवे के लखनऊ मंडल में एक सरकारी रेलवे आवास को बुलडोजर से ध्वस्त किए जाने का मामला विवादों में आ गया है। रेलवे कर्मचारी के परिवार ने आरोप लगाया है कि बिना पर्याप्त पूर्व सूचना और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए उनके आवास पर बुलडोजर चला दिया गया, जबकि रेलवे प्रशासन का कहना है कि संबंधित भवन पहले ही जर्जर और रहने योग्य नहीं होने के कारण "कंडेम" घोषित किया जा चुका था। ऐसे में सुरक्षा कारणों से उसे हटाना आवश्यक था।


जानकारी के अनुसार मामला लखनऊ स्थित रेलवे कॉलोनी के आवास संख्या II-41 का है। परिवार का कहना है कि यह आवास सहायक विद्युत अभियंता कार्यालय की ओर से रेलवे कर्मचारी रामेंद्र प्रताप सिंह को 28 अप्रैल 2026 को आवंटित किया गया था। पीड़ित परिवार के अनुसार वे नियमित रूप से आवास का किराया और बिजली बिल जमा कर रहे थे और किसी प्रकार के बकाया की स्थिति नहीं थी।


परिवार का आरोप है कि 27 जुलाई को मंडल अभियंता कार्यालय के अधिकारी और कर्मचारी अचानक बुलडोजर लेकर पहुंचे और आवास को खाली कराने की कार्रवाई शुरू कर दी। उनका कहना है कि उन्हें पहले से पर्याप्त लिखित सूचना नहीं दी गई और न ही घर का सामान सुरक्षित निकालने के लिए पर्याप्त समय मिला। कार्रवाई के दौरान घर की खिड़कियां, दरवाजे और अन्य हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए, जिससे घरेलू सामान को भी नुकसान पहुंचा।


पीड़ित परिवार का यह भी आरोप है कि यदि भवन वास्तव में असुरक्षित था तो रेलवे प्रशासन को पहले वैकल्पिक आवास उपलब्ध कराना चाहिए था या फिर नियमानुसार समय देकर भवन खाली कराया जाना चाहिए था। उनका कहना है कि कॉलोनी के अन्य आवासों पर ऐसी कार्रवाई नहीं की गई, जिससे चयनात्मक कार्रवाई की आशंका भी पैदा होती है।

दूसरी ओर रेलवे प्रशासन ने अपने पक्ष में कहा है कि संबंधित आवास का तकनीकी निरीक्षण कराया गया था, जिसमें भवन को जर्जर और असुरक्षित पाया गया। इसके बाद उसे "कंडेम" घोषित किया गया और सुरक्षा के मद्देनजर भवन को हटाने का निर्णय लिया गया। अधिकारियों का कहना है कि ऐसे भवनों में कर्मचारियों का रहना किसी बड़े हादसे का कारण बन सकता था, इसलिए कार्रवाई सार्वजनिक सुरक्षा को ध्यान में रखकर की गई।


क्या होता है कंडेम भवन?

भारतीय रेलवे समय-समय पर अपने पुराने आवासों और इमारतों का तकनीकी निरीक्षण कराती है। यदि किसी भवन की संरचना कमजोर, जर्जर या दुर्घटना की आशंका वाली पाई जाती है तो उसे "कंडेम" घोषित किया जाता है। इसके बाद निर्धारित प्रक्रिया के तहत भवन खाली कराने और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाती है। हालांकि, ऐसी कार्रवाई के दौरान नोटिस, रिकॉर्ड और प्रशासनिक प्रक्रिया का पालन किया जाना भी आवश्यक माना जाता है।


यह मामला क्यों महत्वपूर्ण है?

देशभर में रेलवे अपनी पुरानी कॉलोनियों के पुनर्विकास और जर्जर आवासों को हटाने का अभियान चला रहा है। ऐसे में यह मामला सरकारी संपत्ति के प्रबंधन और कर्मचारियों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता को सामने लाता है। यदि भवन वास्तव में असुरक्षित था तो उसे हटाना सुरक्षा की दृष्टि से आवश्यक था, लेकिन यदि नोटिस और वैधानिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया तो इससे प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठ सकते हैं।


विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी आवास खाली कराने की किसी भी कार्रवाई में पारदर्शिता, पर्याप्त पूर्व सूचना और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना जरूरी है। इससे अनावश्यक विवादों से बचा जा सकता है और कर्मचारियों के अधिकारों की भी रक्षा होती है। फिलहाल इस मामले में परिवार और रेलवे प्रशासन के दावे अलग-अलग हैं। यदि पीड़ित परिवार औपचारिक शिकायत दर्ज कराता है या मामला न्यायालय तक पहुंचता है, तो उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर यह तय होगा कि कार्रवाई पूरी तरह नियमों के अनुरूप की गई थी या नहीं।