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'वोकल फॉर लोकल' अभियान को मजबूत बनाने का आह्वान, प्रधानमंत्री मोदी के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने की अपील

राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने देशवासियों से भारतीय हथकरघा उत्पादों को अपनाने और देश के लाखों बुनकरों एवं कारीगरों का सम्मान बढ़ाने की अपील की है। उन्होंने कहा कि भारत का हथकरघा केवल वस्त्र निर्माण की परंपरा नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान, विरासत और लाखों परिवारों की आजीविका का मजबूत आधार है। भारतीय हैंडलूम को अपनाना केवल स्थानीय उत्पाद खरीदने का निर्णय नहीं, बल्कि देश की समृद्ध परंपराओं, कारीगरों के कौशल और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

Vindhya Dubey07 अग. 2026, 05:59 PM IST
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'वोकल फॉर लोकल' अभियान को मजबूत बनाने का आह्वान, प्रधानमंत्री मोदी के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने की अपील


राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर जारी अपने संदेश में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारतीय हथकरघा उद्योग सदियों पुरानी कला, परंपरा और संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। देश के अलग-अलग राज्यों में बनने वाले हस्तनिर्मित वस्त्र न केवल भारत की विविधता को दर्शाते हैं, बल्कि दुनिया भर में भारतीय शिल्पकला की पहचान भी बन चुके हैं। उन्होंने कहा कि इन उत्पादों के पीछे लाखों बुनकर परिवारों का कठिन परिश्रम, रचनात्मकता और पीढ़ियों से चली आ रही पारंपरिक तकनीक जुड़ी हुई है। अन्नपूर्णा देवी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान का उल्लेख करते हुए नागरिकों से आग्रह किया कि वे अपने पसंदीदा भारतीय हैंडलूम उत्पादों के साथ वीडियो साझा करें और सोशल मीडिया के माध्यम से राष्ट्रीय हथकरघा दिवस को एक व्यापक जनआंदोलन का रूप दें। उन्होंने कहा कि जितनी अधिक जनभागीदारी होगी, उतना ही अधिक देश के बुनकरों और कारीगरों को प्रोत्साहन मिलेगा।


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उन्होंने कहा कि 'वोकल फॉर लोकल' केवल एक अभियान नहीं बल्कि भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता का आधार है। जब लोग स्थानीय स्तर पर तैयार किए गए उत्पादों को प्राथमिकता देते हैं तो इससे छोटे उद्योगों, पारंपरिक कुटीर उद्योगों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिलती है। भारतीय हैंडलूम उत्पादों की खरीद सीधे उन लाखों परिवारों की आय और रोजगार से जुड़ी है, जो वर्षों से इस परंपरागत कला को जीवित रखे हुए हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि आज वैश्विक स्तर पर टिकाऊ (Sustainable) और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों की मांग लगातार बढ़ रही है। भारतीय हथकरघा उद्योग इस दिशा में एक उत्कृष्ट उदाहरण है, क्योंकि अधिकांश हैंडलूम उत्पाद पारंपरिक तकनीकों से तैयार किए जाते हैं और इनका पर्यावरण पर अपेक्षाकृत कम प्रभाव पड़ता है। ऐसे में भारतीय हैंडलूम को बढ़ावा देना पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास के लक्ष्य के अनुरूप भी है।


उन्होंने कहा कि भारतीय हथकरघा केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा है। प्रत्येक राज्य की अपनी विशिष्ट बुनाई शैली, डिज़ाइन और वस्त्र परंपरा है, जो भारत की सांस्कृतिक विविधता को दुनिया के सामने प्रस्तुत करती है। इन परंपराओं को जीवित रखने के लिए आवश्यक है कि लोग स्थानीय बुनकरों द्वारा तैयार किए गए उत्पादों को अधिक से अधिक अपनाएं।


अन्नपूर्णा देवी ने कहा कि राष्ट्रीय हथकरघा दिवस केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि उन लाखों बुनकरों के योगदान को सम्मान देने का भी दिन है, जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी भारतीय हस्तकरघा परंपरा को जीवित रखा है। उन्होंने नागरिकों से अपील की कि वे भारतीय हैंडलूम उत्पादों का उपयोग कर स्थानीय कारीगरों का मनोबल बढ़ाएं और आने वाली पीढ़ियों तक इस समृद्ध विरासत को सुरक्षित रखने में अपनी भूमिका निभाएं। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि प्रत्येक नागरिक भारतीय हथकरघा उत्पादों को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाए और 'वोकल फॉर लोकल' के संदेश को आगे बढ़ाए, तो इससे न केवल बुनकरों की आय में वृद्धि होगी, बल्कि देश की सांस्कृतिक विरासत, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आत्मनिर्भर भारत अभियान को भी नई गति मिलेगी। राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर उन्होंने सभी देशवासियों से भारतीय हैंडलूम अपनाने, स्थानीय बुनकरों का समर्थन करने और देश की समृद्ध शिल्प परंपरा को नई पहचान दिलाने का संकल्प लेने का आह्वान किया।