culture
कोयना वन्यजीव अभयारण्य: सह्याद्रि की गोद में बसा जैव विविधता का अनमोल खजाना; इतिहास, प्रकृति, वन्यजीव और लोकआस्थाओं का अद्भुत संगम
सह्याद्रि पर्वतमाला में स्थित कोयना वन्यजीव अभयारण्य महाराष्ट्र के सबसे समृद्ध जैव विविधता वाले संरक्षित वन क्षेत्रों में से एक है। घने सदाबहार वन, कोयना नदी, शिवसागर जलाशय, दुर्लभ वनस्पतियां, बाघ, तेंदुआ और भारतीय गौर जैसे वन्यजीवों के साथ-साथ पश्चिमी घाट के विश्व प्राकृतिक धरोहर क्षेत्र का हिस्सा होने के कारण यह अभयारण्य विशेष महत्व रखता है। इतिहास, पर्यावरण, स्थानीय जनजीवन और सह्याद्रि की सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए यह अभयारण्य आज महाराष्ट्र के प्रमुख पर्यटन एवं पर्यावरणीय स्थलों में गिना जाता है।
Priyanka Gaikwad04 अग. 2026, 06:22 PM IST

महाराष्ट्र के सतारा, सांगली, रत्नागिरी और सिंधुदुर्ग जिलों की सीमा से लगे सह्याद्रि पर्वतमाला में फैला कोयना वन्यजीव अभयारण्य प्रकृति प्रेमियों के लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है। लगभग 424 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस अभयारण्य में घने सदाबहार जंगल, गहरी घाटियां, ऊंची पहाड़ियां, अनेक झरने, प्राकृतिक जलधाराएं और शिवसागर जलाशय का मनमोहक दृश्य देखने को मिलता है। कोयना क्षेत्र का इतिहास हजारों वर्ष पुराना माना जाता है। प्राचीन काल से ही सह्याद्रि के इन जंगलों में अनेक आदिवासी समुदाय निवास करते रहे हैं। कातकरी, महादेव कोली, धनगर तथा अन्य वनवासी समुदायों ने प्रकृति के साथ सामंजस्यपूर्ण जीवनशैली अपनाई। उनकी आजीविका जंगलों से प्राप्त औषधीय पौधों, फलों, शहद और अन्य प्राकृतिक संसाधनों पर आधारित थी।
मराठा साम्राज्य के समय सह्याद्रि के ये घने जंगल छत्रपति शिवाजी महाराज की गुरिल्ला युद्ध नीति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण साबित हुए। प्रतापगढ़, वासोटा, महिमंडणगढ़, मकरंदगढ़ और जंगली जयगढ़ जैसे किले इस क्षेत्र के निकट स्थित होने के कारण इन जंगलों का सामरिक महत्व बहुत अधिक था। दुश्मनों से बचने और अचानक आक्रमण करने के लिए इन वनों का उपयोग किया जाता था। ब्रिटिश शासन के दौरान इन जंगलों के सागौन, ऐन, किंजल, हिरड़ा, बेहड़ा तथा अन्य बहुमूल्य वृक्षों की बड़े पैमाने पर कटाई की गई। हालांकि बाद में जंगलों के संरक्षण के लिए कुछ क्षेत्रों को संरक्षित वन घोषित किया गया।
स्वतंत्रता के बाद भारत सरकार और महाराष्ट्र सरकार ने पश्चिमी घाट की जैव विविधता के महत्व को देखते हुए वर्ष 1985 में कोयना क्षेत्र को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया। इसके बाद वर्ष 2010 में कोयना वन्यजीव अभयारण्य और चांदोली राष्ट्रीय उद्यान को मिलाकर 'सह्याद्रि टाइगर रिजर्व' की स्थापना की गई, जो आज महाराष्ट्र के प्रमुख बाघ संरक्षण क्षेत्रों में से एक है। कोयना नदी का उद्गम सतारा जिले के महाबलेश्वर के निकट होता है। लगभग 130 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद यह कराड में कृष्णा नदी से मिलती है। इसी नदी पर निर्मित कोयना बांध भारत की सबसे बड़ी जलविद्युत परियोजनाओं में से एक है। 1960 के दशक में बने इस बांध से विशाल शिवसागर जलाशय का निर्माण हुआ, जिसने पूरे क्षेत्र के पर्यावरण, पर्यटन और वन्यजीवों को नया स्वरूप प्रदान किया।
स्थानीय मान्यताओं के अनुसार कोयना नदी को 'कोयनामाता' के रूप में पूजा जाता है। महाबलेश्वर क्षेत्र को कृष्णा, वेण्णा, सावित्री, गायत्री और कोयना जैसी पंचनदियों का उद्गम स्थल माना जाता है। श्रद्धालु कोयना नदी को देवी का स्वरूप मानकर उसकी पूजा-अर्चना करते हैं। सह्याद्रि पर्वतमाला का उल्लेख रामायण, महाभारत और विभिन्न पुराणों में 'सह्यपर्वत' के रूप में मिलता है। लोकमान्यताओं के अनुसार अनेक ऋषि-मुनियों ने इन वनों में तपस्या की थी। हालांकि कोयना वन्यजीव अभयारण्य से सीधे जुड़ी कोई विशिष्ट पौराणिक कथा उपलब्ध नहीं है, लेकिन संपूर्ण सह्याद्रि क्षेत्र को धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत पवित्र माना जाता है। कोयना वन्यजीव अभयारण्य पश्चिमी घाट के जैव विविधता हॉटस्पॉट का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यहां सैकड़ों प्रकार की वनस्पतियां, पक्षी, सरीसृप, उभयचर और स्तनधारी जीव पाए जाते हैं।
प्रमुख वन्यजीव
- बाघ
- तेंदुआ
- भारतीय गौर
- भालू
- सांभर
- चीतल
- भेकर
- जंगली सूअर
- भारतीय विशाल गिलहरी (शेकरू)
- जंगल बिल्ली
- लोमड़ी
- खरगोश
प्रमुख पक्षी
- मलाबार ग्रे हॉर्नबिल
- क्रेस्टेड सर्प ईगल
- एशियन पैराडाइज फ्लायकैचर
- वुडपेकर
- बुलबुल
- सनबर्ड
- उल्लू की विभिन्न प्रजातियां
प्रमुख सरीसृप
- नाग
- रसेल वाइपर (घोणस)
- अजगर
- धामन
- विभिन्न प्रकार की छिपकलियां
यहां के जंगलों में सागौन, हिरड़ा, बेहड़ा, ऐन, जामुन, किंजल, अंजन, करवी, बांस तथा अनेक औषधीय पौधे पाए जाते हैं। प्रत्येक सात वर्ष में खिलने वाले करवी के फूल इस क्षेत्र का एक अद्भुत प्राकृतिक आकर्षण माने जाते हैं। कोयना वन्यजीव अभयारण्य में जंगल सफारी, ट्रैकिंग, बर्ड वॉचिंग, नेचर फोटोग्राफी, वन भ्रमण तथा शिवसागर जलाशय के आसपास नौकायन जैसी गतिविधियों का आनंद लिया जा सकता है। धुंध से ढके पहाड़, हरियाली से भरपूर घाटियां और शांत वातावरण पर्यटकों को अविस्मरणीय अनुभव प्रदान करते हैं। यूनेस्को द्वारा पश्चिमी घाट को विश्व प्राकृतिक धरोहर का दर्जा दिया गया है। कोयना वन्यजीव अभयारण्य इस महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का अभिन्न हिस्सा है। जल स्रोतों का संरक्षण, वर्षा चक्र को संतुलित बनाए रखना, नदियों के उद्गम क्षेत्रों की रक्षा करना तथा दुर्लभ वन्यजीवों का संरक्षण करना इस अभयारण्य की सबसे महत्वपूर्ण भूमिकाओं में शामिल है। अक्टूबर से मई तक का समय कोयना वन्यजीव अभयारण्य घूमने के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है। मानसून के दौरान पूरा क्षेत्र हरियाली से भर जाता है, लेकिन भारी वर्षा के कारण कुछ क्षेत्रों में पर्यटकों का प्रवेश सीमित कर दिया जाता है।
कोयना वन्यजीव अभयारण्य केवल एक जंगल नहीं, बल्कि सह्याद्रि की हजारों वर्षों पुरानी प्राकृतिक धरोहर का जीवंत संग्रहालय है। इतिहास, जैव विविधता, स्थानीय संस्कृति, सह्याद्रि की भव्यता और पर्यावरण संरक्षण का अद्भुत संगम देखने के लिए कोयना वन्यजीव अभयारण्य महाराष्ट्र के सबसे महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों में से एक माना जाता है।
