crime
दहेज कानून के अंधाधुंध इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केवल रिश्तेदार होने के आधार पर किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता, सबूतों के बिना मुकदमा चलाना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ
Vindhya Dubey14 जुल. 2026, 06:18 PM IST

नई दिल्ली, 14 जुलाई 2026। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2000 के एक दहेज मृत्यु मामले में पति को बरी करते हुए ट्रायल और अभियोजन की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि केवल मृतका के ससुराल पक्ष से संबंध होने के आधार पर 17 लोगों को आरोपी बनाकर मुकदमा चलाना न्यायिक प्रक्रिया का यांत्रिक और अनुचित इस्तेमाल था। कोर्ट ने यह भी माना कि अभियोजन पक्ष दहेज प्रताड़ना और दहेज मृत्यु के आरोप संदेह से परे साबित करने में असफल रहा।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्यों से यह अधिक संभावित प्रतीत होता है कि महिला की मृत्यु रसोई में खाना बनाते समय लगी आकस्मिक आग से झुलसने के कारण हुई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में केवल पारिवारिक संबंध किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने का आधार नहीं बन सकते। प्रत्येक आरोपी के खिलाफ स्वतंत्र और ठोस साक्ष्य होना आवश्यक है। यह मामला वर्ष 2000 का है। मृतका के पिता ने घटना के लगभग एक महीने बाद एफआईआर दर्ज कराई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि पति और उसके परिवार ने 50 हजार रुपये दहेज की मांग को लेकर बेटी को प्रताड़ित किया, जिसके कारण उसकी दहेज मृत्यु हुई। इस एफआईआर में पति समेत कुल 17 ससुराल वालों को आरोपी बनाया गया था। जांच के दौरान पुलिस ने पहले केवल सास और ससुर के खिलाफ आरोपपत्र दाखिल किया, जबकि अन्य आरोपियों के खिलाफ जांच जारी रखी गई। बाद में दो अलग-अलग ट्रायल हुए। पहले ट्रायल में सास-ससुर बरी हो गए। दूसरे ट्रायल में 14 अन्य रिश्तेदार भी बरी हो गए, जबकि केवल पति को दोषी ठहराया गया। बाद में पटना हाई कोर्ट ने कुछ गवाहों से जिरह का अवसर न मिलने का हवाला देते हुए मामला दोबारा ट्रायल कोर्ट भेज दिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश की भी आलोचना की। अदालत ने कहा कि लगभग 26 वर्ष पुराने आपराधिक मुकदमे को केवल तकनीकी कारणों से फिर से ट्रायल के लिए भेजना उचित नहीं था। अपीलीय अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि न्यायिक प्रक्रिया अनावश्यक रूप से लंबी न हो। सुप्रीम कोर्ट ने पूरे रिकॉर्ड का पुनर्मूल्यांकन किया और पाया कि अभियोजन पक्ष दहेज मांग, क्रूरता और दहेज मृत्यु के आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका। वहीं बचाव पक्ष द्वारा प्रस्तुत चिकित्सीय रिकॉर्ड, गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्यों से यह संकेत मिला कि महिला की मौत एक दुर्घटना का परिणाम हो सकती है। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में केवल अनुमान के आधार पर दोषसिद्धि नहीं की जा सकती। इन सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पति की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया। अदालत ने अपने फैसले में यह भी दोहराया कि दहेज से जुड़े मामलों में दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए, लेकिन निर्दोष लोगों को बिना पर्याप्त साक्ष्य के मुकदमे में घसीटना न्याय व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय है।
