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पवित्र श्रावण मास में करें इन आधुनिक व्रत-वैकल्य का संकल्प

श्रावण मास का नाम आते ही भक्ति, श्रद्धा और व्रत-वैकल्य का समय सामने आ जाता है। बारिश से हरा-भरा हुआ प्रकृति का नजारा, मंदिरों में उमड़ती भीड़ और भगवान महादेव की आराधना से पूरा वातावरण भक्तिमय हो जाता है। श्रावण को मन में नई ऊर्जा और आत्मसंयम की भावना पैदा करने वाला महीना माना जाता है। हालांकि बदलते समय के साथ पारंपरिक व्रत-वैकल्य के साथ कुछ आधुनिक व्रतों का भी संकल्प लिया जा सकता है। मोबाइल का कम इस्तेमाल करना, सोशल मीडिया से कुछ समय दूर रहना, टीवी से दूरी बनाना, घर की साफ-सफाई करना, व्यसनों से दूर रहना और परिवार के लिए समय निकालना जैसे छोटे-छोटे संकल्पों के जरिए श्रावण की भक्ति को आधुनिक जीवनशैली से जोड़ा जा सकता है।

Priyanka Gaikwad13 अग. 2026, 09:38 PM IST
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पवित्र श्रावण मास में करें इन आधुनिक व्रत-वैकल्य का संकल्प
श्रावण मास के लिए मन को प्रसन्न करने वाली हरी-भरी पहाड़ियां, बांधों से बहता पानी और बारिश के कारण प्रकृति में दिखाई देने वाली हरियाली और चैतन्य का नजारा देखने को मिलता है। पवित्र श्रावण शुरू होते ही बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी में भक्ति और उत्साह का माहौल दिखाई देता है। श्रावण मन को नई ऊर्जा देने वाला महीना है और इस दौरान अलग-अलग व्रत-वैकल्य तथा धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। श्रावण मास में सोमवार के व्रत का विशेष महत्व है। श्रद्धालु भगवान महादेव के मंदिरों में जाकर पूजा, अभिषेक और दर्शन करते हैं। कई लोग पूरे श्रावण मास में उपवास या अलग-अलग धार्मिक नियमों का पालन करते हैं।

 श्रावण के प्रत्येक दिन का धार्मिक दृष्टि से अलग महत्व होने के कारण इस दौरान विभिन्न पूजा-विधियां करने की परंपरा रही है। पंचांगकर्ता और खगोलशास्त्री डॉ. कु. सोमण ने श्रावण के व्रत-वैकल्य के साथ आधुनिक समय के अनुरूप कुछ संकल्पों की कल्पना सामने रखी है। उनके अनुसार, पहले के समय में व्रत-वैकल्य के माध्यम से संयम, अनुशासन और मन पर नियंत्रण रखने का प्रयास किया जाता था। आज के समय में भी इसी उद्देश्य को आधुनिक तरीके से अपनाया जा सकता है।

ऐसे करें आधुनिक व्रत
आज के दौर में मोबाइल रोजमर्रा की जिंदगी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है। इसलिए श्रावण में व्रत के रूप में सोमवार को मोबाइल का कम इस्तेमाल करने का संकल्प लिया जा सकता है। मंगलवार को व्हॉट्सऐप का कम इस्तेमाल करना, बुधवार को सोशल मीडिया का उपयोग कम करना, गुरुवार को टीवी बंद रखना, शुक्रवार को घर की साफ-सफाई करना, शनिवार को कोई अच्छी आदत अपनाना और रविवार को परिवार के साथ समय बिताने का संकल्प लिया जा सकता है। इन छोटे-छोटे संकल्पों से रोजमर्रा की जिंदगी में इस्तेमाल होने वाली अनावश्यक चीजों से कुछ समय के लिए दूरी बनाई जा सकती है। मोबाइल और सोशल मीडिया के कारण लगातार व्यस्त रहने वाले मन को आराम मिलेगा। परिवार के सदस्यों के साथ संवाद बढ़ेगा और खुद के लिए भी कुछ समय निकालना संभव होगा।

पारंपरिक व्रतों के साथ आधुनिक विचारों की जोड़
श्रावण के व्रत-वैकल्य में संयम को विशेष महत्व दिया जाता है। उपवास के माध्यम से खान-पान पर नियंत्रण रखने की परंपरा रही है। उसी तरह आधुनिक समय में मोबाइल, सोशल मीडिया, टीवी या मनोरंजन के अन्य साधनों पर नियंत्रण रखना भी एक तरह का आधुनिक व्रत माना जा सकता है। जिन चीजों का हम दिनभर जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, उनसे कुछ समय के लिए खुद को दूर रखने का प्रयास करने से मन पर नियंत्रण रखने की आदत विकसित हो सकती है। इसलिए श्रावण के व्रतों के मूल उद्देश्य को कायम रखते हुए उन्हें आज की जीवनशैली के अनुरूप नया रूप दिया जा सकता है।

श्रावण में किए जाने वाले धार्मिक कार्यों में बदलाव जरूरी
वर्तमान समय में श्रावण में किए जाने वाले कुछ धार्मिक कार्यों को देखने पर उनकी परंपरा अलग दिखाई देती है। पहले श्रावण के प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव की पिंडी पर काठोल लपेटा जाता था। उस पर कहीं दही तो कहीं लोटाभर पानी अर्पित किया जाता था। पूरे महीने सभी सोमवार को शिवपिंडी पर बेलपत्र अर्पित करने की भी परंपरा थी। कुछ स्थानों पर मंगलवार को शिवामूठी का अनाज शिवपिंडी पर अर्पित किया जाता था। अर्पित किए गए अनाज की राशि प्राप्त करने के लिए एक व्यक्ति मंदिर के बाहर बैठता था। पूजा के दौरान अर्पित किए जाने वाले पानी, दूध, दही, अनाज और बेलपत्र के कारण पूजा के बाद मंदिर परिसर की सफाई करनी पड़ती थी। अगले दिन मंदिर में मौजूद बेलपत्र और अन्य पूजा सामग्री की उचित व्यवस्था की जाती थी। हालांकि समय बदलने के साथ धार्मिक विधियों के साथ स्वच्छता, पर्यावरण और संसाधनों के उचित इस्तेमाल पर भी ध्यान देना जरूरी है।

धार्मिक श्रद्धा के साथ स्वच्छता का संकल्प
श्रावण में मंदिरों में श्रद्धालुओं की बड़ी भीड़ होती है। पूजा-अर्चना के लिए फूल, बेलपत्र, दूध, दही और अन्य सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इसके कारण मंदिर परिसर में निर्माल्य और अन्य कचरा जमा होने की संभावना रहती है। ऐसे में प्रत्येक श्रद्धालु को मंदिर परिसर को स्वच्छ रखने की जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। पूजा में इस्तेमाल होने वाली सामग्री व्यर्थ न जाए, पानी का अनावश्यक इस्तेमाल न हो और निर्माल्य का उचित तरीके से निपटारा किया जाए, इसके लिए श्रद्धालुओं का सहयोग भी जरूरी है।

श्रावण के व्रतों का नया अर्थ
श्रावण केवल उपवास, पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों का महीना न रहकर खुद में सकारात्मक बदलाव लाने का अवसर भी बन सकता है। इस दौरान कोई बुरी आदत छोड़ना, व्यसन से दूर रहना, मोबाइल का इस्तेमाल कम करना, कुछ समय के लिए सोशल मीडिया से दूरी बनाना या परिवार के बुजुर्गों के साथ समय बिताने जैसे संकल्प लिए जा सकते हैं। श्रावण की पारंपरिक श्रद्धा और आधुनिक जीवनशैली का मेल होने से व्रत-वैकल्य को नया अर्थ मिल सकता है। भक्ति के साथ संयम, अनुशासन, स्वच्छता और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने का संकल्प लिया जाए तो श्रावण मास अधिक सार्थक बन सकता है। इसलिए इस पवित्र श्रावण में केवल धार्मिक विधियां करने के साथ-साथ अपने दैनिक जीवन में कोई अच्छा बदलाव लाने का संकल्प करने का भी यह सही समय है।