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श्री क्षेत्र गाणगापुर: भगवान दत्तात्रेय की कृपा से पावन हुआ दत्त संप्रदाय का जागृत तीर्थ; श्री नृसिंह सरस्वती के 23 वर्षों के दिव्य प्रवास से बना आस्था का केंद्र
कर्नाटक के कलबुर्गी (गुलबर्गा) जिले में स्थित श्री क्षेत्र गाणगापुर दत्त संप्रदाय के सबसे पवित्र और जागृत तीर्थस्थलों में से एक माना जाता है। भगवान दत्तात्रेय के द्वितीय अवतार माने जाने वाले श्री नृसिंह सरस्वती ने यहां लगभग 23 वर्षों तक निवास कर धर्म, अध्यात्म, सेवा और समाज जागरण का संदेश दिया। श्री गुरुचरित्र में वर्णित इस पवित्र धाम की निर्गुण पादुकाएं, भीमा-अमरजा संगम, अष्टतीर्थ और माधुकरी परंपरा आज भी लाखों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था का केंद्र हैं।
Priyanka Gaikwad04 अग. 2026, 06:43 PM IST

भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी श्रेष्ठ स्थान दिया गया है। "गुरु ब्रह्मा, गुरु विष्णु, गुरु देवो महेश्वरः" यह श्लोक गुरु के महत्व को दर्शाता है। दत्त संप्रदाय इसी गुरु परंपरा का एक महान आध्यात्मिक प्रवाह है और श्री क्षेत्र गाणगापुर उसका प्रमुख तीर्थ माना जाता है। महाराष्ट्र की सीमा के निकट कर्नाटक के कलबुर्गी जिले में स्थित यह पवित्र स्थान हर वर्ष देशभर से लाखों श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करता है। पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि अत्रि और उनकी पत्नी माता अनसूया अत्यंत तपस्वी और पतिव्रता थीं। माता अनसूया की पतिव्रता की परीक्षा लेने के लिए ब्रह्मा, विष्णु और महेश भिक्षुक के रूप में उनके आश्रम पहुंचे।
उन्होंने अनसूया के सामने निर्वस्त्र होकर भिक्षा देने की शर्त रखी। अपनी तपशक्ति से माता अनसूया ने तीनों देवों को शिशु बना दिया और उन्हें स्नेहपूर्वक भोजन कराया। उनकी अद्भुत पतिव्रता से प्रसन्न होकर त्रिमूर्ति ने संयुक्त रूप से पुत्र रूप में अवतार लिया। यही दिव्य पुत्र भगवान दत्तात्रेय कहलाए। इसलिए भगवान दत्तात्रेय को ब्रह्मा, विष्णु और महेश का संयुक्त स्वरूप माना जाता है। भगवान दत्तात्रेय ने संपूर्ण भारत में भ्रमण कर योग, ज्ञान, वैराग्य और धर्म का संदेश दिया। दत्त संप्रदाय की मान्यता के अनुसार कलियुग में धर्म की पुनर्स्थापना के लिए उन्होंने अनेक अवतार धारण किए। इनमें श्रीपाद श्रीवल्लभ प्रथम तथा श्री नृसिंह सरस्वती द्वितीय अवतार माने जाते हैं।
परंपरा के अनुसार श्री नृसिंह सरस्वती का जन्म विदर्भ के करंजा (लाड) में हुआ था। बचपन से ही उनमें विलक्षण आध्यात्मिक तेज दिखाई देता था। संन्यास ग्रहण करने के बाद उन्होंने काशी, श्रीशैलम, कुरवपुर, नरसोबाची वाड़ी तथा भारत के अनेक तीर्थस्थलों की यात्रा की। उन्होंने वेदों का प्रचार किया, समाज में धर्म, सदाचार, सेवा और भक्ति का संदेश फैलाया तथा लोगों को आध्यात्मिक जीवन का मार्ग दिखाया। अपनी यात्राओं के दौरान श्री नृसिंह सरस्वती गाणगापुर पहुंचे। भीमा और अमरजा नदियों का पवित्र संगम, शांत वातावरण और साधना के लिए अनुकूल स्थान देखकर उन्होंने यहीं लगभग 23 वर्षों तक निवास किया। इस अवधि में उन्होंने हजारों भक्तों का मार्गदर्शन किया, समाज में धार्मिक जागृति लाई तथा जाति, वर्ग और धन-दौलत से ऊपर उठकर मानवता, करुणा, सेवा और सत्य का संदेश दिया।
दत्त संप्रदाय के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथों में से एक श्री गुरुचरित्र में गाणगापुर का अत्यंत विस्तृत वर्णन मिलता है। इस ग्रंथ में श्री नृसिंह सरस्वती के जीवन, उनके उपदेश, भक्तों पर हुई कृपा, धर्म की स्थापना और अनेक चमत्कारों का उल्लेख है। आज भी हजारों श्रद्धालु गाणगापुर पहुंचकर सात दिवसीय अथवा अखंड श्री गुरुचरित्र पारायण करते हैं। गाणगापुर से जुड़ी अनेक धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। एक कथा के अनुसार श्रीगुरु ने कुष्ठ रोग से पीड़ित एक भक्त को भीमा-अमरजा संगम में स्नान करने और श्रद्धापूर्वक सेवा करने का निर्देश दिया। कुछ समय बाद वह रोगमुक्त हो गया। दूसरी कथा में एक निःसंतान दंपत्ति को संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलने का वर्णन मिलता है। एक अन्य कथा के अनुसार श्रीगुरु ने एक निर्धन ब्राह्मण के घर अन्न की कभी कमी न रहने का वरदान दिया। ये कथाएं दत्त संप्रदाय की धार्मिक परंपरा और श्री गुरुचरित्र में वर्णित प्रसंगों पर आधारित हैं तथा श्रद्धा का विषय मानी जाती हैं।
गाणगापुर का सबसे प्रमुख आकर्षण निर्गुण पादुका मंदिर है। मान्यता है कि श्री नृसिंह सरस्वती ने श्रीशैलम प्रस्थान करने से पहले अपने भक्तों से कहा था कि वे इन पादुकाओं में सदैव सूक्ष्म रूप से निवास करेंगे। इसी कारण श्रद्धालु निर्गुण पादुकाओं के दर्शन को स्वयं श्रीगुरु के दर्शन के समान मानते हैं। मंदिर से कुछ दूरी पर स्थित भीमा और अमरजा नदियों का संगम अत्यंत पवित्र माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां स्नान करने से पापों का नाश होता है और मन को आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। प्रतिदिन प्रातःकाल हजारों भक्त पहले संगम में स्नान करते हैं और उसके बाद निर्गुण पादुकाओं के दर्शन करते हैं।
गाणगापुर की सबसे विशिष्ट धार्मिक परंपराओं में से एक है 'माधुकरी'। श्री नृसिंह सरस्वती स्वयं प्रतिदिन कुछ घरों से भिक्षा ग्रहण करते थे। उसी परंपरा की स्मृति में आज भी श्रद्धालु पांच घरों से भिक्षा मांगते हैं। यह परंपरा विनम्रता, समानता, अहंकार त्याग और समाज में परस्पर सहयोग का संदेश देती है। गाणगापुर में अष्टतीर्थ यात्रा का भी विशेष महत्व है। भीमा-अमरजा संगम, पापविनाशी तीर्थ, कोटितीर्थ, रुद्रपाद, चक्रतीर्थ, मन्मथतीर्थ तथा कल्लेश्वर मंदिर सहित अनेक पवित्र स्थलों की परिक्रमा कर श्रद्धालु अपनी तीर्थयात्रा पूर्ण मानते हैं।
दत्त जयंती, गुरु पूर्णिमा, गुरु द्वादशी, माघ और चैत्र मास के उत्सवों के दौरान यहां लाखों श्रद्धालु एकत्रित होते हैं। काकड़ आरती, महापूजा, पालखी उत्सव, भजन, कीर्तन, नामस्मरण और श्री गुरुचरित्र पारायण से पूरा क्षेत्र भक्तिमय वातावरण में डूब जाता है। आज श्री क्षेत्र गाणगापुर केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा, अध्यात्म, गुरु भक्ति और भारतीय संस्कृति का जीवंत प्रतीक है। श्री नृसिंह सरस्वती के दिव्य निवास, श्री गुरुचरित्र में वर्णित महिमा तथा सदियों से चली आ रही धार्मिक परंपराओं के कारण यह स्थान दत्त संप्रदाय के सर्वोच्च तीर्थों में गिना जाता है। दत्त भक्त इसे "भूलोक का दत्तधाम" मानते हैं और जीवन में कम से कम एक बार यहां दर्शन करने की कामना रखते हैं।
