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स्कूली शिक्षा में बड़ा गैप, प्राथमिक से उच्च माध्यमिक तक छात्रों की संख्या में भारी गिरावट

प्राथमिक से उच्च माध्यमिक स्तर तक छात्रों के नामांकन में करीब 73% की गिरावट को लेकर संसद की प्राक्कलन समिति ने गंभीर चिंता जताई है। UDISE+ 2024-25 के आंकड़ों के मुताबिक प्राथमिक स्तर पर जहां करोड़ों छात्र नामांकित हैं, वहीं उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते संख्या काफी कम हो जाती है। समिति ने इसे स्कूली शिक्षा में बड़ा “ट्रांजिशन गैप” बताते हुए माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों की संख्या बढ़ाने तथा मौजूदा स्कूलों को अपग्रेड करने की सिफारिश की है।

Anshuman Mishra13 अग. 2026, 09:38 PM IST
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स्कूली शिक्षा में बड़ा गैप, प्राथमिक से उच्च माध्यमिक तक छात्रों की संख्या में भारी गिरावट
नई दिल्ली: देश में बच्चों के स्कूल में प्रवेश लेने और उनके उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचने के बीच बड़ा अंतर सामने आया है। संसद की प्राक्कलन समिति ने स्कूली शिक्षा में छात्रों और स्कूलों की संख्या में लगातार हो रही “भारी गिरावट” पर चिंता जताई है। समिति के अनुसार, प्राथमिक स्तर से उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचते-पहुंचते छात्रों की संख्या में करीब 73 प्रतिशत की कमी दिखाई देती है। समिति ने इसे शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता बताते हुए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्कूलों की संख्या बढ़ाने की सिफारिश की है।

UDISE+ के आंकड़ों में सामने आई बड़ी तस्वीर
लोकसभा में पेश की गई समिति की 18वीं लोकसभा की 2026-27 की दसवीं रिपोर्ट में UDISE+ 2024-25 के आंकड़ों का हवाला दिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक देश में सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त कुल 10,92,671 स्कूल हैं। इनमें:
  • 9,11,032 स्कूल प्राथमिक स्तर के हैं
  • 4,12,805 स्कूल उच्च प्राथमिक स्तर के हैं
  • 1,61,808 स्कूल माध्यमिक स्तर के हैं
  • केवल 90,866 स्कूल उच्च माध्यमिक स्तर के हैं
यानी जैसे-जैसे शिक्षा का स्तर बढ़ता है, स्कूलों की उपलब्धता में भी तेज गिरावट दिखाई देती है।

छात्रों की संख्या भी लगातार घट रही
छात्र नामांकन के आंकड़े इस तस्वीर को और गंभीर बनाते हैं। प्राथमिक कक्षाओं में करीब 6.18 करोड़ छात्र नामांकित हैं। कक्षा 6 से 8 के स्तर पर यह संख्या घटकर करीब 4.09 करोड़ रह जाती है।  माध्यमिक स्तर पर छात्रों की संख्या करीब 2.37 करोड़ और उच्च माध्यमिक स्तर पर लगभग 1.64 करोड़ रह जाती है। प्राथमिक स्तर के 6.18 करोड़ छात्रों की तुलना में उच्च माध्यमिक स्तर के 1.64 करोड़ छात्रों तक पहुंचने का अर्थ है कि नामांकन में लगभग 73 प्रतिशत की गिरावट दिखाई देती है। हालांकि, इसे केवल औपचारिक ड्रॉपआउट दर मानना सावधानी की मांग करता है, क्योंकि अलग-अलग स्तरों के ये आंकड़े एक ही छात्र समूह का ट्रैकिंग डेटा नहीं हैं।

आखिर छात्र कहां जा रहे हैं?
समिति ने मुख्य चिंता स्कूलों की उपलब्धता और भौतिक पहुंच को लेकर जताई है। प्राथमिक स्तर पर बड़ी संख्या में स्कूल मौजूद हैं, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर पर इनकी संख्या तेजी से कम हो जाती है। इसका सीधा असर उन छात्रों पर पड़ सकता है जिन्हें कक्षा 8 के बाद आगे की पढ़ाई के लिए दूसरे या दूर स्थित स्कूल में जाना पड़ता है। दूरी, परिवहन की समस्या, आर्थिक दबाव और परिवार की परिस्थितियां ऐसे कारण हो सकते हैं जो किशोरों की पढ़ाई जारी रखने की क्षमता को प्रभावित करें। हालांकि, उपलब्ध आंकड़े इन सभी कारणों में से प्रत्येक का अलग-अलग हिस्सा निर्धारित नहीं करते। इसलिए 73 प्रतिशत की गिरावट को केवल एक कारण से जोड़ना उचित नहीं होगा।

समिति ने क्या सुझाव दिया?
संसदीय समिति ने शिक्षा मंत्रालय से मौजूदा प्राथमिक और माध्यमिक स्कूलों को पूर्ण उच्च माध्यमिक स्कूलों में अपग्रेड करने को प्राथमिकता देने की सिफारिश की है। समिति का कहना है कि छात्रों के लिए माध्यमिक और उच्च माध्यमिक शिक्षा तक पहुंच आसान बनाने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में अधिक स्कूल स्थापित किए जाने चाहिए। चूंकि शिक्षा संविधान की समवर्ती सूची में आती है और बड़ी संख्या में स्कूल राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों के अधिकार क्षेत्र में आते हैं, इसलिए समिति ने केंद्र से राज्यों और UT प्रशासन के साथ मिलकर इस दिशा में काम करने को कहा है।

दिव्यांग छात्रों के लिए भी बड़ी कमी
रिपोर्ट में केवल स्कूलों और छात्रों की संख्या ही नहीं, बल्कि दिव्यांग छात्रों के लिए सुविधाओं की कमी पर भी चिंता जताई गई है। समिति के मुताबिक UDISE+ 2024-25 के अनुसार देश के 14,71,437 स्कूलों में केवल 5,23,143 स्कूलों में विशेष जरूरत वाले बच्चों के लिए अनुकूल शौचालय उपलब्ध हैं। वहीं 8,08,466 स्कूलों में रैंप के साथ हैंडरेल की सुविधा है। इसका मतलब है कि बड़ी संख्या में स्कूल अभी भी दिव्यांग छात्रों के लिए पूरी तरह सुलभ नहीं हैं।

बजट खर्च पर भी सवाल
समिति ने विशेष जरूरत वाले बच्चों से जुड़े बुनियादी ढांचे और विशेष शिक्षकों के लिए आवंटित बजट के कम इस्तेमाल पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2024-25 में 186 CwSN शौचालयों के निर्माण के लिए 482 लाख रुपये का बजट निर्धारित किया गया था, लेकिन केवल 2.60 लाख रुपये खर्च हुए और निर्धारित भौतिक लक्ष्य पर कोई प्रगति नहीं हुई। इसी तरह प्राथमिक स्तर के लिए नए विशेष शिक्षकों की वित्तीय सहायता के मद में 962 लाख रुपये के बजट के मुकाबले सिर्फ 80.50 लाख रुपये का इस्तेमाल हुआ। समिति ने बजट के इस्तेमाल और परियोजनाओं को समयबद्ध तरीके से पूरा करने की जरूरत बताई है।

शिक्षा व्यवस्था के लिए क्या संदेश?
संसदीय समिति की रिपोर्ट का सबसे बड़ा संदेश यह है कि केवल बच्चों को स्कूल में दाखिला दिलाना पर्याप्त नहीं है। यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि छात्र प्राथमिक शिक्षा के बाद माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। अगर आसपास उच्च कक्षाओं के लिए स्कूल उपलब्ध नहीं हैं, सुविधाएं कमजोर हैं या दिव्यांग छात्रों के लिए स्कूल सुलभ नहीं हैं, तो स्कूली शिक्षा की निरंतरता प्रभावित हो सकती है।

ऐसे में सरकार के सामने चुनौती केवल नए स्कूल खोलने की नहीं, बल्कि मौजूदा स्कूलों को उच्च कक्षाओं तक अपग्रेड करने, परिवहन और बुनियादी सुविधाएं मजबूत करने तथा समावेशी शिक्षा के लिए पर्याप्त शिक्षक और संसाधन उपलब्ध कराने की भी है। संसद की समिति द्वारा सामने रखे गए आंकड़े भारत की स्कूली शिक्षा में एक महत्वपूर्ण “ट्रांजिशन गैप” की ओर इशारा करते हैं। प्राथमिक स्तर पर करोड़ों बच्चों का नामांकन होने के बावजूद उच्च माध्यमिक स्तर तक पहुंचने वालों की संख्या काफी कम हो जाती है। अब चुनौती यह है कि इस गिरावट के वास्तविक कारणों की पहचान की जाए और हर बच्चे को कम से कम उच्च माध्यमिक शिक्षा तक पहुंचाने के लिए स्कूलों, सुविधाओं और शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए।