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अकबरुद्दीन ओवैसी की मुश्किलें बढ़ीं, भगवान राम पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी का केस रद्द करने से बॉम्बे हाईकोर्ट का इनकार

अकबरुद्दीन ओवैसी के पुराने भाषण पर विवाद फिर गरमा गया है। भगवान राम और उनकी माता को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने केस रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि ‘संवैधानिक सहिष्णुता’ किसी की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर ठेस पहुंचाने की आजादी नहीं देती।

Sonali01 सित. 2026, 02:08 PM IST
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अकबरुद्दीन ओवैसी की मुश्किलें बढ़ीं, भगवान राम पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी का केस रद्द करने से बॉम्बे हाईकोर्ट का इनकार

AIMIM नेता और तेलंगाना के विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी को बॉम्बे हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। नांदेड में वर्ष 2011 में दिए गए एक चुनावी भाषण से जुड़े कथित आपत्तिजनक बयानों के मामले में हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने प्रथम दृष्टया माना कि भाषण के कुछ हिस्से भगवान राम और उनकी माता का मजाक उड़ाने और उनके श्रद्धालुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने की मंशा दर्शाते हैं। जस्टिस आर. एम. जोशी ने 6 अगस्त 2026 को यह आदेश पारित किया। अदालत ने स्पष्ट किया कि संविधान सहिष्णुता, स्वतंत्रता और भाईचारे जैसे मूल्यों को बढ़ावा देता है, लेकिन ‘संवैधानिक सहिष्णुता’ को किसी समुदाय की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर आहत करने की छूट नहीं माना जा सकता।


क्या है पूरा मामला?

यह मामला 8 दिसंबर 2011 को महाराष्ट्र के नांदेड में अकबरुद्दीन ओवैसी द्वारा दिए गए एक चुनावी भाषण से जुड़ा है। आरोप है कि भाषण के दौरान उन्होंने भगवान राम और उनकी माता को लेकर ऐसी टिप्पणियां कीं, जिन्हें शिकायतकर्ता ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया।

इस मामले में जनवरी 2013 में तत्कालीन BJP विधायक टी. राजा सिंह ने हैदराबाद के चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट के समक्ष शिकायत दर्ज कराई थी। बाद में शिकायत को FIR में बदला गया और IPC की धारा 295A और 298 के तहत मामला दर्ज हुआ। जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की और नवंबर 2021 में अर्धापुर के न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी ने ओवैसी के खिलाफ प्रक्रिया जारी करने का आदेश दिया।


ओवैसी ने हाईकोर्ट का रुख क्यों किया?

ओवैसी ने FIR, चार्जशीट और मजिस्ट्रेट द्वारा जारी प्रक्रिया को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की। उनकी ओर से यह दलील भी दी गई कि भाषण 2011 का है, शिकायत 2013 में हुई और मजिस्ट्रेट ने 2021 में संज्ञान लिया, इसलिए कार्यवाही समय-सीमा के कारण टिकाऊ नहीं है। हालांकि हाईकोर्ट ने इस स्तर पर पूरी कार्यवाही खत्म करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि limitation यानी समय-सीमा से जुड़ा मुद्दा उचित चरण पर तय किया जा सकता है और केवल इस आधार पर आपराधिक कार्यवाही को रद्द नहीं किया जा सकता।


‘बयान योजनाबद्ध और सोच-समझकर दिया गया प्रतीत होता है’

जस्टिस जोशी ने भाषण के संदर्भ और उसके कथित शब्दों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया बयान कोई जल्दबाजी या लापरवाही में दिया गया वक्तव्य नहीं लगता। अदालत के अनुसार उसका स्वर और तरीका ‘planned’, ‘measured’ और ‘predetermined’ यानी योजनाबद्ध, नपा-तुला और पूर्व निर्धारित प्रतीत होता है।

कोर्ट ने कथित आपत्तिजनक शब्दों को अपने आदेश में दोहराने से भी परहेज किया, ताकि उन्हें दोबारा अनावश्यक प्रचार न मिले।


अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार है, लेकिन यह असीमित अधिकार नहीं है। इस पर संविधान के तहत उचित प्रतिबंध लागू होते हैं।

अदालत ने IPC की धारा 295A से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के सिद्धांतों का भी उल्लेख किया। कोर्ट ने कहा कि केवल अनजाने, लापरवाही या बिना दुर्भावनापूर्ण इरादे के किए गए बयान को धारा 295A के तहत अपराध मानना पर्याप्त नहीं होगा। लेकिन यदि प्रथम दृष्टया जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण तरीके से धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का मामला बनता है, तो आपराधिक कार्यवाही को आगे बढ़ने दिया जा सकता है।


YouTube पर भाषण उपलब्ध होने पर कोर्ट चिंतित

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि कथित आपत्तिजनक भाषण अभी भी YouTube पर उपलब्ध है, जबकि सक्षम अदालत मामले का संज्ञान लेकर ओवैसी के खिलाफ प्रक्रिया जारी कर चुकी है। अदालत ने कहा कि यदि भाषण अभी भी सार्वजनिक प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध है, तो इससे उन धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली सामग्री का प्रसार जारी रह सकता है। हालांकि आवश्यक पक्षकारों की अनुपस्थिति के कारण हाईकोर्ट ने इस संबंध में सीधे कोई आदेश जारी नहीं किया और सरकार से कानून के अनुसार उचित कदम उठाने की उम्मीद जताई।


क्या ओवैसी दोषी ठहराए गए हैं?

नहीं। यह बात समझना बेहद जरूरी है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने केवल आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया है। अदालत ने अभी ओवैसी को दोषी नहीं ठहराया है। मामले की सुनवाई ट्रायल कोर्ट में जारी रहेगी और अंतिम फैसला वहां पेश किए जाने वाले सबूतों और कानूनी दलीलों के आधार पर होगा। हाईकोर्ट की टिप्पणियां प्रथम दृष्टया स्तर की हैं और ट्रायल के अंतिम परिणाम को तय नहीं करतीं।