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अनुकंपा नियुक्ति पर पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: परिवार में एक सदस्य सरकारी नौकरी में है तो दूसरे आश्रित को नहीं मिलेगी नौकरी
पटना हाईकोर्ट ने सरकारी कर्मचारियों की मृत्यु के बाद मिलने वाली अनुकंपा नियुक्ति को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि मृत सरकारी कर्मचारी के परिवार का कोई एक सदस्य पहले से सरकारी सेवा में कार्यरत है, तो परिवार के दूसरे आश्रित को अनुकंपा के आधार पर नौकरी देने का दावा स्वीकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि अनुकंपा नियुक्ति किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार या परिवार में बांटी जाने वाली संपत्ति की तरह नहीं है। इसका उद्देश्य केवल ऐसे परिवारों को तत्काल आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है, जो कमाने वाले सदस्य की मृत्यु के बाद अचानक आर्थिक संकट में आ जाते हैं। अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि परिवार का सरकारी नौकरी करने वाला सदस्य अलग रहता है या परिवार को आर्थिक सहायता नहीं देता, तब भी दूसरे सदस्य को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ नहीं दिया जा सकता।
दरभंगा के अजीत कुमार मंडल की याचिका पर फैसला
यह मामला बिहार के दरभंगा जिले से जुड़ा हुआ है। याचिकाकर्ता अजीत कुमार मंडल ने पटना हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर अनुकंपा नियुक्ति की मांग की थी। मामले के अनुसार, अजीत कुमार मंडल के बड़े भाई की वर्ष 2012 में सरकारी सेवा के दौरान मृत्यु हो गई थी। सरकारी कर्मचारी की मृत्यु के बाद उनके परिवार को आर्थिक सहारा देने के उद्देश्य से अनुकंपा नियुक्ति का प्रावधान लागू होता है। इसी आधार पर अजीत कुमार मंडल ने सरकारी नौकरी के लिए आवेदन किया था। लेकिन जिला अनुकंपा समिति ने वर्ष 2016 में उनके आवेदन को खारिज कर दिया। समिति का कहना था कि मृत कर्मचारी के परिवार में पहले से ही एक सदस्य सरकारी सेवा में कार्यरत है। ऐसे में परिवार को पूरी तरह आर्थिक संकट में नहीं माना जा सकता और दूसरे आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति का लाभ नहीं दिया जा सकता। इसके बाद अजीत कुमार मंडल ने समिति के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट ने आवेदन खारिज करने के फैसले को सही माना
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति कुमार मनीष की एकलपीठ ने की। अदालत ने जिला अनुकंपा समिति के निर्णय को सही ठहराते हुए याचिका को खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को अचानक आई आर्थिक परेशानी से उबारना है। यह नौकरी पाने का सामान्य माध्यम नहीं है। अदालत ने कहा कि यदि परिवार का कोई सदस्य पहले से सरकारी सेवा में है, तो यह माना जाता है कि परिवार के पास आय का एक स्थायी साधन मौजूद है। ऐसी स्थिति में दूसरे सदस्य को केवल आश्रित होने के आधार पर सरकारी नौकरी देने का दावा नहीं किया जा सकता।
अलग रहने और मदद नहीं करने की दलील नहीं मानी गई
याचिकाकर्ता की ओर से यह दलील दी गई थी कि परिवार का जो सदस्य पहले से सरकारी नौकरी में है, वह अलग रहता है और परिवार की आर्थिक सहायता नहीं करता। इसलिए दूसरे आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति दी जानी चाहिए। लेकिन अदालत ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सदस्य का परिवार से अलग रहना या आर्थिक सहयोग नहीं करना, अनुकंपा नियुक्ति के नियमों को बदल नहीं सकता। सरकारी सेवा में होना ही यह दर्शाता है कि परिवार के पास एक कमाने वाला सदस्य मौजूद है। अदालत ने यह भी माना कि अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में परिवार की समग्र स्थिति देखी जाती है, न कि केवल यह कि कोई सदस्य व्यक्तिगत रूप से परिवार को पैसे दे रहा है या नहीं।
अनुकंपा नियुक्ति उत्तराधिकार में मिलने वाली नौकरी नहीं
न्यायमूर्ति कुमार मनीष ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अनुकंपा नियुक्ति को विरासत या उत्तराधिकार के रूप में मिलने वाली नौकरी नहीं माना जा सकता। सरकारी नौकरी सामान्य प्रक्रिया के तहत योग्यता, परीक्षा और चयन के आधार पर दी जाती है। वहीं अनुकंपा नियुक्ति एक विशेष परिस्थिति में दी जाने वाली राहत है, जिसका उद्देश्य मृत कर्मचारी के परिवार को तत्काल आर्थिक संकट से बचाना होता है। अदालतों ने समय-समय पर कहा है कि अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य बेरोजगार व्यक्ति को रोजगार उपलब्ध कराना नहीं, बल्कि उस परिवार को सहारा देना है जो कमाने वाले सदस्य की अचानक मृत्यु के कारण कठिन परिस्थिति में पहुंच गया है।
फैसले का असर
पटना हाईकोर्ट के इस फैसले से सरकारी विभागों में लंबित अनुकंपा नियुक्ति मामलों पर असर पड़ सकता है। इस निर्णय से यह स्थिति और स्पष्ट हो गई है कि परिवार में पहले से सरकारी नौकरी कर रहे सदस्य की मौजूदगी अनुकंपा नियुक्ति के दावे को कमजोर कर सकती है। सरकारी कर्मचारियों के परिवारों को अब यह ध्यान रखना होगा कि अनुकंपा नियुक्ति का लाभ केवल आश्रित होने के आधार पर नहीं मिलता, बल्कि इसके लिए परिवार की आर्थिक निर्भरता और नियमों में तय शर्तों को पूरा करना जरूरी होता है। यह फैसला उन मामलों में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां परिवार के किसी सदस्य के सरकारी नौकरी में होने के बावजूद दूसरे सदस्य अनुकंपा नियुक्ति की मांग करते हैं।
