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आरटीआई में देरी पर आयोग सख्त, 20 हजार क्षतिपूर्ति l
उत्तर प्रदेश सूचना आयोग ने आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना देने में लगभग दो वर्ष की देरी और शुरुआत में गलत आधार पर सूचना से इनकार करने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने अपीलकर्ता सीमा सिंह को 20 हजार रुपये क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है। यह मामला कानपुर देहात के तत्कालीन जन सूचना अधिकारी एवं अपर पुलिस अधीक्षक से संबंधित है। आयोग ने कहा कि विभाग के पास संबंधित अभिलेख उपलब्ध होने के बावजूद सूचना देने से इनकार किया गया। बाद की कार्यवाही में वही सूचना उपलब्ध कराई गई, जिससे स्पष्ट हुआ कि प्रारंभिक स्तर पर आरटीआई कानून के प्रावधानों का सही परीक्षण नहीं किया गया था।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश सूचना आयोग ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई सूचना उपलब्ध कराने में करीब दो वर्ष की देरी और प्रारंभिक स्तर पर गलत आधार पर सूचना देने से इनकार किए जाने को गंभीरता से लिया है। राज्य सूचना आयुक्त स्वतंत्र प्रकाश गुप्ता ने सीमा सिंह बनाम जन सूचना अधिकारी, कार्यालय अपर पुलिस अधीक्षक, कानपुर देहात मामले की सुनवाई करते हुए अपीलकर्ता को 20 हजार रुपये क्षतिपूर्ति देने का आदेश दिया है।
आयोग ने तत्कालीन जन सूचना अधिकारी एवं अपर पुलिस अधीक्षक, कानपुर देहात को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता सीमा सिंह को 20 हजार रुपये की क्षतिपूर्ति अदा करें। आदेश की अनुपालना सुनिश्चित कराने के लिए इसकी प्रति जिलाधिकारी, कानपुर देहात को भेजने के साथ ही आवश्यक कार्रवाई के लिए उत्तर प्रदेश सूचना आयोग के रजिस्ट्रार को भी भेजी गई है।
प्रकरण के अनुसार, सीमा सिंह ने 4 अक्टूबर 2023 को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत आवेदन प्रस्तुत कर थाना रूरा, जनपद कानपुर देहात से जुड़े एक आपराधिक मामले में चार बिंदुओं पर जानकारी मांगी थी। उन्होंने लेखपाल अशोक कुमार की गिरफ्तारी, गिरफ्तारी से जुड़े अभिलेखों और एक वाहन से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराने का अनुरोध किया था।
जन सूचना अधिकारी ने 1 नवंबर 2023 को जवाब देते हुए कहा था कि मांगी गई सूचना आरटीआई अधिनियम की धारा 8(1) और धारा 11 के तहत उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। इस जवाब से असंतुष्ट होकर सीमा सिंह ने पहले विभागीय स्तर पर प्रथम अपील दायर की। अपेक्षित सूचना नहीं मिलने पर उन्होंने बाद में उत्तर प्रदेश सूचना आयोग में द्वितीय अपील प्रस्तुत की।
सुनवाई के दौरान सूचना आयोग ने संबंधित अभिलेखों और विभागीय रिकॉर्ड का परीक्षण किया। जांच में सामने आया कि अपीलकर्ता की ओर से मांगी गई सूचनाओं से संबंधित दस्तावेज विभाग के पास उपलब्ध थे। इनमें गिरफ्तारी मेमो, प्रथम सूचना रिपोर्ट, केस डायरी, चिकित्सकीय परीक्षण से जुड़े अभिलेख और अन्य दस्तावेज शामिल थे।
आयोग ने माना कि इन उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर सूचना को कानून के अनुरूप अपीलकर्ता को उपलब्ध कराया जा सकता था।
आयोग के अनुसार, प्रारंभिक स्तर पर सूचना देने से इनकार करने के लिए आरटीआई अधिनियम की जिन धाराओं का हवाला दिया गया, उनका इस मामले में सही तरीके से परीक्षण नहीं किया गया था। राज्य सूचना आयुक्त ने अपने आदेश में कहा कि किसी लोक सेवक द्वारा सरकारी दायित्वों के निर्वहन के दौरान तैयार किए गए अभिलेखों के संबंध में आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों की सावधानीपूर्वक जांच की जानी चाहिए। केवल सामान्य आधार पर सूचना से इनकार करना उचित नहीं है, खासकर तब जब संबंधित रिकॉर्ड सरकारी विभाग के पास उपलब्ध हों।
आयोग ने कहा कि सूचना उपलब्ध कराने की प्रक्रिया में हुई त्रुटियों के कारण अपीलकर्ता को करीब दो वर्ष तक वांछित जानकारी नहीं मिल सकी। इस देरी के चलते उन्हें अनावश्यक परेशानी का सामना करना पड़ा और सूचना प्राप्त करने के लिए बार-बार अपील की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। आयोग ने यह भी पाया कि प्रारंभिक जवाब से यह धारणा बनी कि मांगी गई जानकारी आरटीआई अधिनियम के तहत उपलब्ध नहीं कराई जा सकती। हालांकि, बाद की कार्यवाही में वही सूचना उपलब्ध करा दी गई। आयोग ने इस स्थिति को अपीलकर्ता के हितों के प्रतिकूल माना और मानसिक परेशानी तथा अनावश्यक विलंब को देखते हुए क्षतिपूर्ति देना आवश्यक बताया।
हालांकि आयोग ने स्पष्ट किया कि जिस आपराधिक मामले से संबंधित जानकारी मांगी गई थी, वह न्यायालय में विचाराधीन है। इसलिए आयोग ने मामले के तथ्यात्मक या कानूनी गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की। आयोग ने केवल आरटीआई अधिनियम के तहत सूचना देने में पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्धता से जुड़े दायित्वों पर विचार किया।
आयोग ने संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि 20 हजार रुपये की क्षतिपूर्ति अपीलकर्ता को उपलब्ध कराई जाए। साथ ही जिलाधिकारी, कानपुर देहात को आदेश का अनुपालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए गए हैं।
क्षतिपूर्ति राशि की वसूली और आगे की आवश्यक कार्रवाई के लिए आदेश की प्रति आयोग के रजिस्ट्रार को भी भेजी गई है। सूचना आयोग ने कहा कि आरटीआई कानून का उद्देश्य नागरिकों को सरकारी कामकाज और अभिलेखों से जुड़ी जानकारी समय पर उपलब्ध कराना है। यदि उपलब्ध रिकॉर्ड के बावजूद गलत कानूनी प्रावधानों का हवाला देकर सूचना रोकी जाती है या अनावश्यक देरी की जाती है, तो इससे पारदर्शिता और नागरिकों के सूचना अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। आयोग ने निर्देशों के साथ मामले का निस्तारण कर दिया।
