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कच्चा तेल सस्ता, कमजोर मांग का बाजार पर दबाव
वैश्विक बाजार में 13 अगस्त 2026 को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। कमजोर वैश्विक मांग के अनुमान और अमेरिका में कच्चे तेल के भंडार में 17.4 मिलियन बैरल की बड़ी बढ़ोतरी ने कीमतों पर दबाव बनाया। Reuters के अनुसार Brent करीब 2.47% गिरकर $86.78 प्रति बैरल और WTI 2.81% गिरकर $80.93 पर पहुंचा। हालांकि, मध्य-पूर्व में आपूर्ति संबंधी जोखिमों के कारण बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है।

नई दिल्ली: वैश्विक बाजार में गुरुवार, 13 अगस्त 2026 को कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट दर्ज की गई। कमजोर वैश्विक मांग के अनुमान और अमेरिका में कच्चे तेल के भंडार में उम्मीद से बड़ी बढ़ोतरी ने तेल बाजार पर दबाव बनाया। हालांकि, मध्य-पूर्व में जारी आपूर्ति संबंधी जोखिमों ने कीमतों में और बड़ी गिरावट को सीमित किया।
ब्रेंट और WTI दोनों में गिरावट
बाजार में शुरुआती कारोबार के दौरान Brent crude करीब 2.47% गिरकर 86.78 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया, जबकि अमेरिकी WTI crude में करीब 2.81% की गिरावट आई और यह 80.93 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहा। इससे संकेत मिलता है कि निवेशक फिलहाल तेल की भविष्य की मांग को लेकर पहले की तुलना में अधिक सतर्क हैं।
अमेरिकी तेल भंडार में बड़ी बढ़ोतरी
कीमतों पर सबसे बड़ा दबाव अमेरिका से आए इन्वेंट्री आंकड़ों से पड़ा। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, अमेरिकी कच्चे तेल के भंडार में 17.4 मिलियन बैरल की बढ़ोतरी हुई। यह वृद्धि बाजार के अनुमान के विपरीत थी और 5 जून के बाद सबसे बड़ी बढ़ोतरी बताई गई है। बढ़ते भंडार का अर्थ यह है कि बाजार में उपलब्ध कच्चे तेल की मात्रा उम्मीद से अधिक रही, जिससे कीमतों पर दबाव बढ़ा।
वैश्विक तेल मांग के अनुमान में कटौती
तेल बाजार के लिए दूसरा महत्वपूर्ण संकेत वैश्विक मांग के पूर्वानुमानों से आया है। OPEC ने 2026 में तेल मांग वृद्धि का अनुमान घटाकर 5.8 लाख बैरल प्रतिदिन कर दिया है। इसके अलावा, International Energy Agency (IEA) ने 2026 में वैश्विक तेल मांग में करीब 16 लाख बैरल प्रतिदिन की कमी का अनुमान लगाया है। रिपोर्ट के अनुसार, ऊंची कीमतों और ईरान से जुड़े संघर्ष के कारण हुई आपूर्ति बाधाओं का असर ईंधन की खपत पर पड़ रहा है।
मध्य-पूर्व का तनाव अभी भी बड़ा जोखिम
हालांकि तेल की कीमतों में गिरावट आई है, लेकिन बाजार पूरी तरह शांत नहीं है। Strait of Hormuz में जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने और अमेरिका-ईरान के बीच तनाव के कारण आपूर्ति को लेकर चिंता बनी हुई है। अगर इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से तेल की आपूर्ति लंबे समय तक प्रभावित होती है, तो वैश्विक बाजार में कीमतों पर दोबारा तेजी का दबाव बन सकता है। यही कारण है कि मांग कमजोर होने के बावजूद तेल की कीमतों में बड़ी गिरावट नहीं देखी जा रही है।
रूस से जुड़ा आपूर्ति जोखिम भी महत्वपूर्ण
रूस से होने वाले समुद्री तेल उत्पाद निर्यात में भी गिरावट दर्ज की गई है। रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेनी ड्रोन हमलों के कारण रूस के समुद्री तेल उत्पाद निर्यात में 33.3% की कमी आई है। इस तरह बाजार में एक तरफ मांग कमजोर होने का दबाव है, तो दूसरी तरफ कुछ क्षेत्रों में आपूर्ति बाधित होने का जोखिम बना हुआ है। यही विरोधाभासी परिस्थितियां कच्चे तेल के बाजार को अस्थिर बनाए हुए हैं।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है तेल की कीमत?
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बदलाव का असर देश की आयात लागत, व्यापार घाटे और ऊर्जा क्षेत्र पर पड़ सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमत में गिरावट का घरेलू पेट्रोल-डीजल कीमतों पर असर तुरंत और उसी अनुपात में दिखाई दे, यह जरूरी नहीं है। घरेलू ईंधन कीमतों पर अंतरराष्ट्रीय क्रूड के अलावा टैक्स, रुपये की विनिमय दर और अन्य लागत भी प्रभाव डालती हैं।
आगे क्या रहेगा बाजार का रुख?
आने वाले दिनों में तेल बाजार मुख्य रूप से तीन चीजों पर नजर रखेगा—वैश्विक मांग, अमेरिकी इन्वेंट्री और मध्य-पूर्व में आपूर्ति की स्थिति।
अगर मांग के अनुमान लगातार कमजोर होते हैं और अमेरिकी भंडार बढ़ता रहता है, तो तेल कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। दूसरी ओर, अगर होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण मार्गों पर आपूर्ति बाधित होती है या भू-राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो कीमतों में फिर तेजी आ सकती है।
