government

क्या बिना इंश्योरेंस वाले वाहनों को पेट्रोल-डीजल देने से रोका जाए? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और IRDAI से मांगा रोडमैप

देश में बिना वैध मोटर बीमा के सड़कों पर दौड़ रहे करोड़ों वाहनों पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) को निर्देश दिया है कि वे "नो इंश्योरेंस, नो फ्यूल" व्यवस्था की व्यवहार्यता पर एक पायलट परियोजना तैयार करें। इस प्रस्ताव के तहत भविष्य में वैध थर्ड पार्टी बीमा नहीं होने पर वाहनों को पेट्रोल या डीजल देने पर रोक लगाने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। हालांकि अदालत ने अभी इस नियम को लागू करने का आदेश नहीं दिया है, बल्कि पहले इसकी तकनीकी और प्रशासनिक व्यवहार्यता का अध्ययन करने को कहा है।

Vindhya Dubey07 अग. 2026, 05:10 PM IST
खबर शेयर करें:
क्या बिना इंश्योरेंस वाले वाहनों को पेट्रोल-डीजल देने से रोका जाए? सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और IRDAI से मांगा रोडमैप

सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश आंकड़ों ने देश में मोटर वाहन बीमा व्यवस्था की गंभीर स्थिति उजागर कर दी। अदालत को बताया गया कि भारत में पंजीकृत लगभग 30 करोड़ वाहनों में से करीब 16.54 करोड़ वाहन बिना वैध थर्ड पार्टी बीमा के सड़कों पर चल रहे हैं। यानी 56 प्रतिशत से अधिक वाहन मोटर वाहन अधिनियम के अनिवार्य बीमा प्रावधान का पालन नहीं कर रहे हैं। अदालत ने इसे केवल कानून के उल्लंघन का मामला नहीं, बल्कि सड़क दुर्घटना पीड़ितों के अधिकारों और उनकी आर्थिक सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 146 के तहत प्रत्येक वाहन के लिए थर्ड पार्टी बीमा अनिवार्य है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में वाहन मालिक बीमा समाप्त होने के बाद उसका नवीनीकरण नहीं कराते और बिना वैध बीमा के वाहन चलाते रहते हैं। अदालत ने कहा कि इससे सड़क दुर्घटनाओं के पीड़ितों को समय पर मुआवजा मिलने में कठिनाई होती है और लंबे कानूनी विवाद उत्पन्न होते हैं। न्यायालय ने माना कि केवल जुर्माने की व्यवस्था इस समस्या को रोकने में पर्याप्त साबित नहीं हुई है, इसलिए तकनीक आधारित निगरानी और प्रभावी प्रवर्तन प्रणाली विकसित करना समय की आवश्यकता है।

"नो इंश्योरेंस-नो फ्यूल" मॉडल पर विचार

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सुझाव दिया कि पेट्रोल पंपों को वाहन पंजीकरण और बीमा डेटाबेस से जोड़ा जा सकता है। यदि किसी वाहन का थर्ड पार्टी बीमा समाप्त हो चुका हो तो डिजिटल प्रणाली उसकी पहचान कर सके और उसे ईंधन उपलब्ध न कराया जाए। अदालत का मानना है कि ऐसी व्यवस्था लागू होने पर वाहन मालिक समय रहते अपना बीमा नवीनीकृत कराएंगे और बिना बीमा वाले वाहनों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आएगी। हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि फिलहाल देश में "नो इंश्योरेंस-नो फ्यूल" नियम लागू नहीं किया गया है। केंद्र सरकार, सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय (MoRTH) और भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण (IRDAI) को इसकी व्यवहार्यता पर पायलट परियोजना तैयार कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। आगे का निर्णय उस रिपोर्ट और सरकार की कार्रवाई के आधार पर लिया जाएगा।

ANPR कैमरों और ई-चालान प्रणाली को मजबूत करने के निर्देश

अदालत ने ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) कैमरों को VAHAN पोर्टल और बीमा डेटाबेस से जोड़ने पर भी जोर दिया। इससे सड़क पर चलते वाहनों का बीमा स्टेटस तत्काल जांचा जा सकेगा और बिना वैध बीमा वाले वाहनों के खिलाफ स्वतः ई-चालान जारी किए जा सकेंगे। इसके अलावा राज्य पुलिस को ऐसे मोबाइल उपकरण और डिजिटल ऐप उपलब्ध कराने की भी आवश्यकता बताई गई, जिनकी मदद से मौके पर ही वाहन के बीमा की जांच की जा सके।

नए वाहनों के लिए बढ़ाई गई अनिवार्य बीमा अवधि

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मोटर वाहन बीमा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए एक और महत्वपूर्ण निर्देश जारी किया। अदालत ने नए निजी चार पहिया वाहनों के लिए अनिवार्य थर्ड पार्टी बीमा की अवधि तीन वर्ष से बढ़ाकर चार वर्ष तथा नए दोपहिया वाहनों के लिए पांच वर्ष से बढ़ाकर छह वर्ष करने का आदेश दिया है। न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने कहा कि वर्ष 2018 में नए कारों के लिए तीन वर्ष और नए दोपहिया वाहनों के लिए पांच वर्ष का अनिवार्य थर्ड पार्टी बीमा लागू किया गया था। इसके बावजूद बड़ी संख्या में वाहन मालिक प्रारंभिक अवधि समाप्त होने के बाद बीमा का नवीनीकरण नहीं करा रहे हैं। अदालत ने कहा कि आठ वर्ष बाद भी करोड़ों वाहन बिना वैध बीमा के सड़कों पर चल रहे हैं, जिससे मोटर वाहन अधिनियम का उद्देश्य प्रभावित हो रहा है।

दुर्घटना पीड़ितों की सुरक्षा पर अदालत की चिंता

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि करीब 16.54 करोड़ वाहन बिना वैध थर्ड पार्टी बीमा के संचालित हो रहे हैं। न्यायालय ने कहा कि अनिवार्य बीमा व्यवस्था का मूल उद्देश्य सड़क दुर्घटना पीड़ितों को वित्तीय सुरक्षा और समय पर मुआवजा सुनिश्चित करना है। यदि बड़ी संख्या में वाहन बिना बीमा के चलते रहेंगे तो यह व्यवस्था प्रभावी नहीं रह पाएगी और पीड़ितों को न्याय मिलने में बाधाएं उत्पन्न होंगी।

किस मामले की सुनवाई के दौरान दिए गए निर्देश?

ये महत्वपूर्ण टिप्पणियां और निर्देश एक मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले की सुनवाई के दौरान दिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना हाईकोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा, जिसमें सड़क दुर्घटना में मृत व्यक्ति के परिजनों को 10.005 लाख रुपये का मुआवजा तथा 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया गया था। इसी मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने देश में मोटर वाहन बीमा व्यवस्था की कमियों पर विस्तार से चर्चा करते हुए व्यापक सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया।

आगे क्या होगा?

यदि पायलट परियोजना सफल रहती है और सरकार इसे लागू करने का निर्णय लेती है, तो भारत में वाहन बीमा अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए तकनीक आधारित नई व्यवस्था विकसित की जा सकती है। लंबी अवधि के अनिवार्य थर्ड पार्टी बीमा, डिजिटल निगरानी, ANPR कैमरों, ई-चालान प्रणाली और संभावित "नो इंश्योरेंस-नो फ्यूल" मॉडल के संयुक्त प्रभाव से बिना बीमा वाहन चलाने की प्रवृत्ति पर रोक लग सकती है। साथ ही सड़क दुर्घटना पीड़ितों को समय पर मुआवजा मिलने की व्यवस्था भी अधिक प्रभावी बन सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी किसी भी व्यवस्था को लागू करने से पहले तकनीकी अवसंरचना, डेटा सुरक्षा, पेट्रोल पंपों की तैयारी, डिजिटल एकीकरण और आम नागरिकों पर पड़ने वाले प्रभाव का व्यापक अध्ययन किया जाना आवश्यक होगा, ताकि नई व्यवस्था प्रभावी होने के साथ-साथ व्यावहारिक और पारदर्शी भी रहे।