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डिक्री को ‘शून्य’ बताकर अलग मुकदमा? बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ किया रास्ता, Execution Court में ही उठानी होगी आपत्ति

किसी सिविल डिक्री को सिर्फ यह कहकर कि मूल मुकदमा Abatement के कारण खत्म हो चुका था, अलग से नया मुकदमा दाखिल कर चुनौती नहीं दी जा सकती। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में साफ कर दिया है कि अगर विवाद सीधे डिक्री के Execution से जुड़ा है, तो उसकी सुनवाई Execution Court में ही होगी। कोर्ट ने Section 47 CPC और Order XXI Rules 97 व 101 की अहमियत बताते हुए कहा कि डिक्री को “Nullity” बताने से CPC में तय Execution प्रक्रिया को दरकिनार नहीं किया जा सकता। फैसला सिविल मुकदमों में बार-बार होने वाली समानांतर मुकदमेबाजी पर रोक लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Sonali13 अग. 2026, 07:49 PM IST
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डिक्री को ‘शून्य’ बताकर अलग मुकदमा? बॉम्बे हाईकोर्ट ने साफ किया रास्ता, Execution Court में ही उठानी होगी आपत्ति

13 अगस्त 2026: 

बॉम्बे हाईकोर्ट ने डिक्री के निष्पादन यानी Execution से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी पक्ष का दावा है कि मूल मुकदमे के abatement के कारण उससे पारित डिक्री ही कानूनी रूप से शून्य (nullity) हो गई है, तो इस आधार पर अलग से नया सिविल मुकदमा दाखिल नहीं किया जा सकता। ऐसी आपत्ति उसी अदालत के सामने उठानी होगी जो डिक्री के execution की कार्यवाही देख रही है। हाईकोर्ट ने कहा कि Code of Civil Procedure, 1908 की Section 47 तथा Order XXI के Rules 97 और 101 के तहत Execution Court के पास ऐसे विवादों को तय करने का अधिकार है। इसलिए डिक्री के निष्पादन से जुड़े सवालों को अलग suit के जरिए उठाकर समानांतर मुकदमेबाजी शुरू करना CPC की व्यवस्था के अनुरूप नहीं है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला Maijabeen Abdul Quaiyum Khan v. M/s. Ajit Developer Pvt. Ltd. से संबंधित है। मामला Appeal From Order (St.) No. 14178 of 2026 के रूप में बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने आया। मामले की सुनवाई जस्टिस शर्मिला यू. देशमुख ने की। विवाद एक ऐसी डिक्री के execution से जुड़ा था जिसके खिलाफ यह दावा किया गया कि मूल suit abate हो चुका था। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि चूंकि मूल मुकदमे में abatement हो चुका था, इसलिए उससे पारित डिक्री को nullity माना जाना चाहिए और वह उनके अधिकारों पर बाध्यकारी नहीं हो सकती। याचिकाकर्ताओं ने इस आधार पर अलग civil proceedings के जरिए डिक्री को चुनौती देने और उसके execution पर रोक लगाने की मांग की थी।

याचिकाकर्ताओं की क्या दलील थी?

याचिकाकर्ताओं की ओर से मुख्य रूप से यह दलील दी गई कि उनका संपत्ति में स्वतंत्र अधिकार है और वे Muslim Law of Inheritance के तहत संबंधित संपत्ति में undivided share का दावा करते हैं। उनका तर्क था कि जिस पुराने मुकदमे से डिक्री आई, उसमें abatement हो चुका था। इसलिए वह डिक्री उनके अधिकारों के खिलाफ लागू नहीं की जा सकती। यह भी दलील दी गई कि वे मूल मुकदमे के ऐसे पक्षकार नहीं थे जिनके खिलाफ execution proceedings को Section 47 CPC के तहत सीमित किया जा सके। एक अन्य तर्क यह था कि उन्होंने execution proceedings में कोई resistance या obstruction नहीं किया था, इसलिए Order XXI Rule 97 CPC का सहारा नहीं लिया जा सकता।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने CPC की execution scheme पर जोर देते हुए कहा कि यदि विवाद का वास्तविक उद्देश्य decree-holder को decree execute करने से रोकना है, तो ऐसे विवाद को execution proceedings के भीतर ही तय किया जाना चाहिए। अदालत ने माना कि Section 47 CPC और Order XXI Rules 97 तथा 101 इस तरह के विवादों के adjudication के लिए पर्याप्त mechanism प्रदान करते हैं। इसलिए केवल इस आधार पर कि डिक्री को “nullity” कहा जा रहा है, पक्षकार को अलग civil suit दाखिल करने का अधिकार नहीं मिल जाता।

Section 47 CPC क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

Section 47 CPC का उद्देश्य execution, discharge या satisfaction of decree से संबंधित प्रश्नों को उसी अदालत द्वारा तय कराना है जो डिक्री का निष्पादन कर रही है।

इस व्यवस्था के पीछे महत्वपूर्ण उद्देश्य यह है कि डिक्री के execution से संबंधित विवादों के लिए बार-बार अलग मुकदमे शुरू न हों। यानी यदि किसी व्यक्ति का कहना है कि डिक्री execute नहीं हो सकती, तो उसे पहले Execution Court के सामने अपनी आपत्ति रखनी होगी। Execution Court ही यह निर्धारित करेगी कि डिक्री कानूनन enforceable है या नहीं और उसे किस सीमा तक execute किया जा सकता है।

Order XXI Rule 97 और 101 का भी बड़ा रोल

इस फैसले में Order XXI के Rules 97 और 101 भी महत्वपूर्ण हैं। Rule 97 ऐसी स्थिति से संबंधित है जहां decree-holder या auction purchaser को डिक्री execute करने के दौरान resistance या obstruction का सामना करना पड़ता है। वहीं Rule 101 Execution Court को right, title और interest से जुड़े प्रश्नों का निर्धारण करने का अधिकार देता है, जब ऐसे प्रश्न execution proceedings में सामने आते हैं। इसका मतलब यह है कि execution के दौरान संपत्ति पर किसी व्यक्ति के अधिकार को लेकर विवाद खड़ा होने पर उसे हर बार अलग civil suit में भेजना जरूरी नहीं है।

“हमने obstruction नहीं किया” वाली दलील क्यों नहीं चली?

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि उन्होंने execution proceedings में कोई obstruction नहीं किया, इसलिए Order XXI Rule 97 उनके खिलाफ लागू नहीं हो सकता। लेकिन हाईकोर्ट ने विवाद की वास्तविक प्रकृति पर ध्यान दिया। कोर्ट ने माना कि यदि किसी मुकदमे का वास्तविक उद्देश्य decree-holder को संपत्ति का possession लेने से रोकना और execution को बाधित करना है, तो केवल शब्दों के आधार पर उसे execution proceedings से अलग नहीं किया जा सकता। यानी अदालत यह देखेगी कि विवाद वास्तव में किस उद्देश्य से उठाया गया है, न कि केवल यह कि उसे किस नाम से प्रस्तुत किया गया है।

Supreme Court के पुराने और हालिया सिद्धांतों से भी जुड़ा फैसला

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह निर्णय execution law के उस व्यापक सिद्धांत से भी जुड़ता है जिसे Supreme Court ने अलग-अलग मामलों में विकसित किया है।

Supreme Court ने Order XXI Rules 97 से 101 के संबंध में माना है कि execution proceedings में resistance, obstruction तथा property में right, title या interest से जुड़े प्रश्नों को executing court द्वारा तय किया जाना चाहिए। Shriram Housing Finance and Investment India Ltd. v. Omesh Mishra Memorial Charitable Trust मामले में भी यह सिद्धांत सामने आया कि Rule 101 के तहत execution proceedings में सामने आने वाले ऐसे विवादों के लिए अलग suit की आवश्यकता नहीं रहती। इसी तरह Silverline Forum Pvt. Ltd. v. Rajiv Trust के सिद्धांतों में भी execution के दौरान third-party resistance और उससे जुड़े अधिकारों के निर्धारण की भूमिका पर जोर दिया गया है। इस पृष्ठभूमि में बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला कोई अलग-थलग कानूनी दृष्टिकोण नहीं है, बल्कि CPC की execution scheme के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप दिखाई देता है।

Supreme Court का 2025 का execution law approach भी महत्वपूर्ण

हाल के Supreme Court के फैसलों में भी Order XXI Rules 97–101 को execution disputes के लिए comprehensive mechanism के रूप में देखा गया है। इस framework का उद्देश्य यह है कि decree के execution के दौरान सामने आने वाले अधिकारों और objections का फैसला उसी executing court में हो, ताकि पक्षकारों को एक ही विवाद के लिए अलग-अलग proceedings शुरू न करनी पड़ें। यही principle वर्तमान मामले में भी महत्वपूर्ण है।

क्या हर “Nullity” challenge में अलग suit पर रोक है?

यहां कानूनी रूप से एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है। इस फैसले का अर्थ यह नहीं है कि हर परिस्थिति में किसी भी alleged nullity के खिलाफ अलग civil suit हमेशा barred होगा। बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने सवाल विशेष रूप से ऐसी आपत्ति का था जिसमें decree के execution को इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि मूल suit के abatement के कारण decree ही nullity है। ऐसी execution-related objection को Section 47 CPC तथा Order XXI के relevant provisions के तहत Execution Court के सामने उठाया जाना चाहिए। इसलिए इस फैसले को यह कहकर पेश करना सही नहीं होगा कि “अब किसी भी nullity challenge के लिए कभी अलग suit नहीं हो सकता।”

इस फैसले का आम लोगों और मुकदमेबाजों पर क्या असर?

फैसले का व्यावहारिक असर खास तौर पर property और civil litigation से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण हो सकता है। यदि किसी व्यक्ति को लगता है कि उसके खिलाफ किसी decree का execution गलत तरीके से किया जा रहा है, तो केवल एक नया civil suit दाखिल करके execution को चुनौती देना पर्याप्त नहीं होगा। उसे यह देखना होगा कि उसकी आपत्ति Section 47 CPC या Order XXI के applicable provisions के तहत Execution Court में उठाई जा सकती है या नहीं। इससे execution proceedings में देरी कम करने और एक ही विवाद पर अलग-अलग अदालतों में समानांतर मुकदमेबाजी को रोकने में मदद मिल सकती है।

फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

इस फैसले का सबसे बड़ा संदेश यह है कि decree मिलने के बाद शुरू होने वाली execution proceedings को केवल इसलिए अलग मुकदमे में नहीं बदला जा सकता क्योंकि कोई पक्ष decree को “null and void” या “nullity” बताता है। यदि objection का मूल संबंध decree के execution से है, तो CPC में उपलब्ध execution mechanism का इस्तेमाल करना होगा। यह approach न्यायिक प्रक्रिया में दोहराव कम करने, execution proceedings को प्रभावी बनाने और decree-holder तथा judgment-debtor के बीच विवाद को उसी मंच पर सुलझाने की दिशा में महत्वपूर्ण है।

बॉम्बे हाईकोर्ट का यह फैसला civil litigation में एक महत्वपूर्ण procedural message देता है—यदि विवाद का वास्तविक विषय decree का execution है, तो उसे CPC में निर्धारित execution proceedings के जरिए ही उठाया जाना चाहिए। अब केवल डिक्री को “शून्य” या “अमान्य” बताकर अलग civil suit दाखिल कर execution को चुनौती देने का रास्ता नहीं अपनाया जा सकता, जब संबंधित objection को Section 47 CPC और Order XXI के तहत Execution Court प्रभावी रूप से तय कर सकती है।

इस फैसले से एक बार फिर यह स्पष्ट होता है कि CPC केवल अधिकारों को तय करने की प्रक्रिया नहीं देता, बल्कि decree के प्रभावी और अंतिम execution के लिए भी एक विस्तृत कानूनी framework उपलब्ध कराता है।