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पिता को विरासत में मिली संपत्ति में बेटे का जन्मसिद्ध हिस्सा नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, HUF साबित किए बिना Coparcenary Claim खारिज

दादा की जमीन का वारिस होना और HUF संपत्ति का मालिक होना एक बात नहीं! राजस्थान हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद में बड़ा कानूनी फर्क साफ करते हुए कहा है कि सिर्फ पिता का बेटा होने से किसी व्यक्ति को पिता को विरासत में मिली संपत्ति में जन्मसिद्ध Coparcenary हिस्सा नहीं मिल जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि Section 8 के तहत मिली संपत्ति को HUF साबित किए बिना बेटे का दावा कायम नहीं रह सकता। फैसला Supreme Court के Chander Sen और Yudhishter जैसे महत्वपूर्ण फैसलों में तय कानूनी सिद्धांत को भी मजबूत करता है।

Sonali25 अग. 2026, 02:22 PM IST
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पिता को विरासत में मिली संपत्ति में बेटे का जन्मसिद्ध हिस्सा नहीं: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, HUF साबित किए बिना Coparcenary Claim खारिज

जयपुर: 

क्या पिता को विरासत में मिली संपत्ति में बेटे का जन्म से ही हिस्सा बन जाता है? राजस्थान हाईकोर्ट ने इस अहम संपत्ति विवाद में स्पष्ट किया है कि केवल पिता का पुत्र होना किसी व्यक्ति को पिता को विरासत में मिली संपत्ति में स्वतः Coparcenary अधिकार नहीं देता। यदि संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की Section 8 के तहत पिता को मिली है और यह साबित करने के लिए पर्याप्त pleadings व evidence नहीं हैं कि संपत्ति HUF या subsisting coparcenary का हिस्सा बनी रही, तो बेटा उसमें जन्मसिद्ध हिस्से का दावा नहीं कर सकता। यह फैसला Supreme Court के पुराने लेकिन महत्वपूर्ण CWT v. Chander Sen और Yudhishter v. Ashok Kumar फैसलों में स्थापित कानूनी सिद्धांत से भी जुड़ता है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 2024 में इन दोनों फैसलों को दोहराते हुए साफ किया था कि 1956 के बाद Section 8 के तहत पिता को मिली संपत्ति उसके हाथ में separate property रहती है और उसके बच्चों को उसमें जन्म से Coparcenary Right नहीं मिलता।

किसने दिया फैसला?

राजस्थान हाईकोर्ट की जस्टिस फरजंद अली की बेंच ने 20 अगस्त 2026 को Devaram v. Khetaram & Ors. मामले में फैसला सुनाया। कोर्ट ने अपील खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। विवाद में बेटे ने अपने पिता के पास मौजूद संपत्ति में Coparcenary Share का दावा किया था, लेकिन अदालत ने पाया कि संपत्ति के HUF/Coparcenary character को स्थापित करने के लिए आवश्यक pleadings और material रिकॉर्ड पर नहीं थे।

क्या था पूरा विवाद?

विवाद कृषि भूमि से जुड़ा था। जमीन मूल रूप से याचिकाकर्ता के दादा छुतरा राम को आवंटित हुई थी। बाद में उनके तीन बेटों को संपत्ति मिली, जिनमें याचिकाकर्ता के पिता भी शामिल थे। बेटे का दावा था कि वह अपने पिता का वैध पुत्र होने के कारण इस संपत्ति में जन्म से Coparcenary Interest रखता है। उसने आरोप लगाया कि उसकी सहमति के बिना संपत्ति से संबंधित Sale Deeds की गईं और इसलिए उसने अपने हिस्से की घोषणा तथा बिक्री विलेखों को चुनौती देने की मांग की। लेकिन हाईकोर्ट ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया। अदालत के सामने सबसे अहम सवाल यह था कि क्या पिता को मिली संपत्ति सिर्फ inheritance के कारण HUF/Coparcenary Property बन गई थी।

हाईकोर्ट: “सिर्फ पिता का बेटा होना काफी नहीं”

अदालत ने स्पष्ट किया कि “मैं पिता का बेटा हूं” कहना अपने आप में Coparcenary Right स्थापित नहीं करता। यदि संपत्ति Section 8 के तहत succession के जरिए पिता को मिली है, तो सामान्य स्थिति में वह पिता की individual/separate property होती है। बेटे को उसमें जन्म से हिस्सा तभी मिल सकता है जब वह कानूनी रूप से यह स्थापित करे कि संबंधित संपत्ति HUF या subsisting coparcenary का हिस्सा थी। इस मामले में ऐसी स्थिति साबित नहीं हुई।

Supreme Court का Chander Sen सिद्धांत क्यों अहम?

इस फैसले को समझने के लिए Supreme Court का 1986 का Commissioner of Wealth Tax v. Chander Sen फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। Supreme Court ने Section 8 के प्रभाव पर विचार करते हुए माना था कि जब संपत्ति Hindu Succession Act, 1956 की Section 8 के तहत उत्तराधिकारी को मिलती है, तो वह उत्तराधिकारी उसे अपने individual capacity में प्राप्त करता है; वह अपने संयुक्त परिवार के Karta के रूप में संपत्ति हासिल नहीं करता। बाद में Supreme Court ने Yudhishter v. Ashok Kumar में इसी सिद्धांत को दोहराया। दिल्ली हाईकोर्ट के हालिया फैसलों ने भी इन दोनों Supreme Court precedents को इसी संदर्भ में लागू किया है।

1956 के बाद बदला संपत्ति का कानूनी चरित्र

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। 1956 से पहले के Hindu law में यदि कोई व्यक्ति अपने पिता से संपत्ति inherit करता था, तो कुछ परिस्थितियों में उसके बेटे उस संपत्ति में जन्म से coparcenary interest प्राप्त कर सकते थे। लेकिन Hindu Succession Act, 1956 की Section 8 लागू होने के बाद स्थिति बदल गई। Supreme Court के अनुसार, Section 8 के तहत पिता को मिली संपत्ति उसके हाथ में separate property रहती है और उसके बेटे या पोते केवल रिश्ते के आधार पर उसमें जन्मसिद्ध Coparcenary Right नहीं प्राप्त करते। दिल्ली हाईकोर्ट की Division Bench ने 2024 में इसी distinction को विस्तार से समझाया था।

दिल्ली हाईकोर्ट का 2024 फैसला भी इसी लाइन में

Neeraj Bhatia v. Ravindra Kumar Bhatia में दिल्ली हाईकोर्ट की Division Bench ने Supreme Court के Chander Sen और Yudhishter फैसलों का विश्लेषण करते हुए कहा कि 1956 के बाद पिता द्वारा inherited self-acquired property को बेटे के हाथ में आने मात्र से Coparcenary Property नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसी inherited property separate property के रूप में रहती है और grandson या great-grandson को उसमें जन्म से अधिकार नहीं मिलता।

HUF का दावा करना है तो सिर्फ आरोप काफी नहीं

मामले का एक महत्वपूर्ण procedural पहलू भी है। यदि कोई व्यक्ति कहता है कि संपत्ति HUF की है, तो केवल plaint में “यह HUF property है” लिख देना पर्याप्त नहीं है। उसे HUF के अस्तित्व और संपत्ति के उस character को support करने वाले specific pleadings और evidence देने होते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट के Neeraj Bhatia मामले में भी अदालत ने पाया था कि HUF और common hotchpotch में property डालने संबंधी दावे के समर्थन में पर्याप्त factual foundation नहीं था।

क्या पिता अपनी अलग संपत्ति HUF में डाल सकता है?

यहां एक और महत्वपूर्ण distinction है। किसी व्यक्ति की self-acquired property को कुछ परिस्थितियों में common hotchpotch में डालकर joint family property के रूप में treat करने का सिद्धांत मौजूद है। लेकिन इसके लिए भी कानूनी परिस्थितियां और आवश्यक तथ्य साबित करने होते हैं। दिल्ली हाईकोर्ट की Division Bench ने 2024 में कहा था कि “blending” के doctrine के लिए यह जरूरी है कि संबंधित व्यक्ति स्वयं existing coparcenary में interest रखने वाला coparcener हो और संपत्ति को common stock में डालने का वास्तविक आधार मौजूद हो। केवल मौखिक घोषणा के आधार पर किसी property को HUF property घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है।

इसका मतलब यह नहीं कि हर inherited property हमेशा पिता की ही रहेगी

यह फैसला समझते समय एक सावधानी बेहद जरूरी है। इसका अर्थ यह नहीं है कि “पिता को विरासत में मिली हर संपत्ति में बेटे का कभी कोई अधिकार नहीं हो  सकता।” असल कानूनी स्थिति यह है कि Section 8 के तहत inheritance अपने आप HUF/Coparcenary पैदा नहीं करता। यदि कोई पक्ष यह साबित करता है कि संपत्ति पहले से किसी existing HUF/coparcenary का हिस्सा थी या उसे वैध रूप से joint family property के रूप में रखा गया था, तो मामला अलग हो सकता है। इसलिए हर property dispute में यह देखना जरूरी है कि संपत्ति का source क्या था, succession किस provision के तहत हुई, HUF का अस्तित्व था या नहीं और उसे साबित करने के लिए क्या evidence मौजूद है।

दादा की संपत्ति → Section 8 के तहत पिता को मिली → पिता को individual capacity में संपत्ति मिली → केवल बेटा होने से बेटे का जन्मसिद्ध Coparcenary Share नहीं बनता। लेकिन—यदि HUF/Coparcenary का अस्तित्व और संपत्ति का joint-family character कानूनी रूप से साबित हो जाए → परिणाम अलग हो सकता है।

फैसले का बड़ा कानूनी संदेश

राजस्थान हाईकोर्ट का यह फैसला उन संपत्ति विवादों के लिए महत्वपूर्ण है जहां “पैतृक संपत्ति” और “HUF Property” को एक ही मानकर बेटे या पोते द्वारा जन्मसिद्ध हिस्से का दावा किया जाता है। अदालत का संदेश साफ है: किसी संपत्ति का पुराने पूर्वज से आना अपने आप उसे Coparcenary Property नहीं बना देता। पहले यह देखना होगा कि वह संपत्ति पिता के पास किस कानूनी तरीके से आई और क्या उसके HUF/Coparcenary character को स्थापित करने के लिए पर्याप्त तथ्य और साक्ष्य मौजूद हैं।

इस दृष्टिकोण को Supreme Court के Chander Sen और Yudhishter फैसलों तथा दिल्ली हाईकोर्ट के Neeraj Bhatia निर्णय से भी मजबूत समर्थन मिलता है। “पिता की विरासत में मिली संपत्ति में बेटे का जन्मसिद्ध हिस्सा सिर्फ पिता-पुत्र के रिश्ते से नहीं बनता; HUF/Coparcenary का अस्तित्व और संपत्ति का joint-family character साबित करना जरूरी है।”