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मराठवाड़ में मानसून की देरी और अनियमित बारिश: टैंकरों पर निर्भरता बढ़ी, खरीफ फसलें संकट में
2026 के मानसून में मराठवाड़ को सामान्य से कम और अनियमित बारिश मिली; जून–अगस्त में कई जिलों में 18–23% तक की कमी दर्ज हुई और अगस्त में कुछ जिलों में 68% तक का भारी घाटा रहा। नतीजतन बांधों का स्टॉक गिरा, सैकड़ों गाँव टैंकर पर निर्भर हुए और सोयाबीन–कपास जैसी खरीफ फसलें सूखे के तनाव में आ गईं।

मराठवाड़ के आठ जिलों में इस साल मानसून की शुरुआत देर से हुई और जून में ही क्षेत्र को सामान्य का केवल 79.6% वर्षा मिली, जिससे 11 बड़ी सिंचाई परियोजनाओं में पानी का भंडारण 33.59% तक गिर गया और दो जलाशय पूरी तरह सूख गए। सीजन के कुल आंकड़े भी चिंताजनक हैं: 1 जून से मराठवाड़ में औसतन 381 मिमी बारिश हुई, जो अपेक्षित 498.8 मिमी का करीब 77% है; लतूर और परभणी जैसे जिलों में घाटा सबसे अधिक रहा।
अगस्त में स्थिति और बिगड़ी, जब कई जिलों में भारी शुष्क अंतराल रहा; बीड (84%), जालना (78%) और परभणी (73%) में अगस्त की बारिश में 68% तक का घाटा दर्ज किया गया। इससे न केवल घरेलू पानी की आपूर्ति प्रभावित हुई, बल्कि खड़ी खरीफ फसलों पर भी तनाव बढ़ा; कृषि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सोयाबीन और कपास संवेदनशील विकास चरण में हैं और अतिरिक्त तनाव सहन नहीं कर सकते।
प्रशासन के मुताबिक कम बारिश के कारण टैंकरों की मांग तेजी से बढ़ी; एक सप्ताह में ही टैंकरों की संख्या में 100 से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज की गई और कई गाँवों को दैनिक पानी के लिए टैंकर पर निर्भर रहना पड़ा। कुछ रिपोर्टों में सैकड़ों गाँवों/वस्तियों को टैंकर सप्लाई और सौों विहिरी अधिग्रहित करने की बात कही गई है, जो पेयजल संकट की गंभीरता को रेखांकित करती है।
किसानों और स्थानीय नेताओं ने फसल नुकसान के सर्वेक्षण और वित्तीय सहायता की मांग की है, क्योंकि मानसून की सुस्त चाल और बार-बार के शुष्क अंतराल ने खरीफ बुवाई और उपज दोनों पर असर डाला है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार, यदि सितंबर की शुरुआत तक बारिश नहीं सुधरी तो फसल नुकसान और पेयजल किल्लत दोनों गहरा सकते हैं।
(नोट: ऊपर दिए गए आंकड़े विभिन्न सरकारी/मीडिया रिपोर्टों पर आधारित हैं; स्थानीय स्तर पर स्थिति जिले-दर-जिले भिन्न हो सकती है।)
