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राजस्व रिकॉर्ड में जमीन ‘तालाब’ दर्ज होना बेदखली का पक्का आधार नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

जमीन के कागजों में ‘तालाब’ लिखे जाने से किसी पुराने किरायेदार का हक यूं ही खत्म नहीं किया जा सकता। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए कहा कि पहले से न्यायिक रूप से मान्य वंशानुगत किरायेदारी को सिर्फ बाद की राजस्व प्रविष्टि के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।

Sonali01 सित. 2026, 02:06 PM IST
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राजस्व रिकॉर्ड में जमीन ‘तालाब’ दर्ज होना बेदखली का पक्का आधार नहीं, इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

प्रयागराज: 

जमीन और किरायेदारी से जुड़े एक अहम मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भूखंड को बाद के राजस्व रिकॉर्ड में ‘तालाब’ दर्ज कर दिए जाने मात्र से उस जमीन पर पहले से न्यायिक रूप से मान्य वंशानुगत किरायेदार को बेदखल नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 212 लागू करने के लिए संबंधित प्राधिकरण को कानून में निर्धारित मूल तथ्यों को प्रमाणित करना होगा।

जस्टिस अरुण कुमार ने कहा कि राजस्व अभिलेख जमीन की प्रकृति और उसके उपयोग के संबंध में महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकते हैं, लेकिन वे किसी व्यक्ति के कानूनी अधिकार या उस जमीन पर तालाब बनने की परिस्थितियों के निर्णायक प्रमाण नहीं हैं।


क्या है पूरा मामला?

मामला ‘Achhaibar Singh बनाम Board of Revenue And 3 Others’ से जुड़ा है। विवादित जमीन पर याचिकाकर्ता को पहले जमीन आवंटित की गई थी। इसके बाद उन्होंने उत्तर प्रदेश टेनेंसी एक्ट, 1939 की धारा 59/61 के तहत मुकदमा दायर कर खुद को जमीन का वंशानुगत किरायेदार घोषित करने की मांग की।

7 फरवरी 1953 को उनके पक्ष में फैसला हुआ और बाद में 16 मार्च 1956 को बोर्ड ऑफ रेवेन्यू की कार्यवाही में भी यह स्थिति कायम रही। यानी जमीन पर उनकी वंशानुगत किरायेदारी पहले ही न्यायिक रूप से मान्य हो चुकी थी।


फिर क्यों शुरू हुई बेदखली की कार्रवाई?

जमींदारी उन्मूलन के बाद ग्राम सभा की ओर से उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 212 के तहत याचिकाकर्ता को जमीन से बेदखल करने की कार्यवाही शुरू की गई। दावा किया गया कि संबंधित भूखंड ‘तालाब’ है और इसलिए इस पर धारा 212 लागू होती है।

सब-डिविजनल ऑफिसर, वाराणसी (दक्षिण) ने 1966 में बेदखली का आदेश दिया। इसके बाद मामला अपील और आगे की राजस्व कार्यवाही में पहुंचा। अंततः बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने एसडीओ के आदेश को बहाल कर दिया।


हाईकोर्ट ने क्या कहा?

हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 212 तभी लागू हो सकती है जब कानून में बताए गए आवश्यक तथ्य साबित हों। केवल यह तथ्य कि किसी भूखंड को बाद के राजस्व रिकॉर्ड में ‘तालाब’ लिखा गया है, अपने आप में धारा 212 लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने विशेष रूप से कहा कि जब किसी व्यक्ति की वंशानुगत किरायेदारी पहले ही न्यायिक रूप से घोषित हो चुकी हो, तब धारा 212 लागू करने वाले प्राधिकरण की जिम्मेदारी है कि वह संबंधित साक्ष्यों के आधार पर यह साबित करे कि मामला वास्तव में इस धारा की वैधानिक शर्तों के अंतर्गत आता है।


क्या तालाब बाद में बनाया गया था?

याचिकाकर्ता का कहना था कि जमीन मूल रूप से उसे भूमि के रूप में दी गई थी और बाद में उसने किरायेदार के तौर पर वहां तालाब खुदवाया था। इसलिए केवल बाद के रिकॉर्ड में तालाब की प्रविष्टि के आधार पर उसके पहले से मौजूद अधिकार समाप्त नहीं किए जा सकते।

हाईकोर्ट ने इस दलील पर विचार करते हुए कहा कि जमीन की मूल बंदोबस्ती, पहले की किरायेदारी कार्यवाही और राजस्व रिकॉर्ड—सभी को एक साथ देखा जाना जरूरी है। केवल किसी एक बाद की प्रविष्टि के आधार पर कानूनी अधिकार तय नहीं किए जा सकते।


धारा 212 कब लागू होती है?

कोर्ट ने बताया कि धारा 212 उन परिस्थितियों से संबंधित है जहां 8 अगस्त 1946 या उसके बाद किसी व्यक्ति को ऐसी जमीन पर tenure-holder या grove-holder के रूप में स्वीकार किया गया हो, जो उस समय customary common pasture land, श्मशान/कब्रिस्तान, तालाब, पोखर, रास्ता या खलिहान जैसी सार्वजनिक उपयोग की भूमि के रूप में दर्ज या वास्तव में मौजूद थी। इसलिए इस प्रावधान को लागू करने से पहले यह साबित करना आवश्यक है कि जमीन संबंधित वैधानिक श्रेणी में आती थी और मामले के आवश्यक तथ्य मौजूद थे।


हाईकोर्ट ने पुराना आदेश किया रद्द

अदालत ने पाया कि बोर्ड ऑफ रेवेन्यू ने मुख्य रूप से राजस्व प्रविष्टियों पर भरोसा किया और पहले की न्यायिक घोषणा तथा मूल बंदोबस्ती की प्रकृति के कानूनी प्रभाव की पर्याप्त जांच नहीं की। इसके बाद हाईकोर्ट ने 1 अक्टूबर 1980 के बोर्ड ऑफ रेवेन्यू के आदेश को रद्द कर दिया, अतिरिक्त आयुक्त के आदेश को बहाल किया और एसडीओ के बेदखली आदेश को भी समाप्त कर दिया। ग्राम सभा द्वारा दायर बेदखली का मुकदमा खारिज कर दिया गया और याचिका स्वीकार कर ली गई।


मुआवजे के मुद्दे पर भी कोर्ट की टिप्पणी

कोर्ट ने यह भी नोट किया कि एसडीओ के आदेश में धारा 212 के तहत बेदखली के साथ दिए जाने वाले मुआवजे को लेकर कोई स्पष्ट निर्धारण या निर्देश नहीं था। हालांकि हाईकोर्ट ने अपने फैसले को मुख्य रूप से इस आधार पर तय करना जरूरी नहीं समझा, क्योंकि ग्राम सभा धारा 212 की मूल वैधानिक शर्तें ही साबित नहीं कर सकी थी।


फैसले का सीधा मतलब

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि राजस्व रिकॉर्ड में जमीन की बाद की प्रविष्टि अपने आप में किसी व्यक्ति के पहले से स्थापित कानूनी अधिकार को खत्म नहीं करती। खासकर तब, जब उसकी किरायेदारी पहले ही सक्षम अदालत द्वारा न्यायिक रूप से मान्य की जा चुकी हो। हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पहले की किरायेदारी की घोषणा का मतलब यह नहीं है कि धारा 212 की अलग वैधानिक जांच की जरूरत ही नहीं होगी। यदि संबंधित प्राधिकरण कानून की सभी आवश्यक शर्तें और तथ्य प्रमाणित कर दे, तो धारा 212 की कार्रवाई पर अलग से विचार किया जा सकता है।