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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अनजाने में छिपे आपराधिक मामले पर नहीं जा सकती नौकरी, बर्खास्तगी से पहले जांच जरूरी

नौकरी के सत्यापन फॉर्म में आपराधिक मामले की जानकारी छिपाने के आरोप में बर्खास्त किए गए कर्मचारी को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ पुलिस रिकॉर्ड में किसी पुराने आपराधिक मामले का नाम सामने आ जाना नौकरी खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। पहले यह साबित करना होगा कि कर्मचारी को उस मामले की जानकारी थी और उसने जानबूझकर उसे छिपाया। शत्रुघ्न यादव के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बर्खास्तगी को अवैध मानते हुए उन्हें नौकरी पर वापस लेने का आदेश दिया और 50 प्रतिशत back wages देने का निर्देश दिया।

Sonali12 अग. 2026, 07:07 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: अनजाने में छिपे आपराधिक मामले पर नहीं जा सकती नौकरी, बर्खास्तगी से पहले जांच जरूरी

नई दिल्ली,

 12 अगस्त 2026। नौकरी के दौरान या नियुक्ति के समय किसी कर्मचारी के खिलाफ पुराने आपराधिक मामले का पता चलने मात्र से उसकी नौकरी खत्म नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि कर्मचारी को उस आपराधिक मामले की जानकारी ही नहीं थी, तो उसे जानबूझकर तथ्य छिपाने या गलत जानकारी देने का दोषी नहीं माना जा सकता। हालांकि, कर्मचारी को अपनी अनभिज्ञता विश्वसनीय दस्तावेजों और परिस्थितियों से साबित करनी होगी। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 11 अगस्त 2026 को Shatrughn Yadav बनाम The Fertilizers and Chemicals Travancore Ltd. (F.A.C.T.) मामले में यह फैसला सुनाया। फैसला 2026 INSC 829 के रूप में दर्ज है। सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड के अनुसार मामला Civil Appeal से संबंधित था, जो SLP (Civil) No. 7197 of 2026 से उत्पन्न हुआ था।

क्या था पूरा मामला?

शत्रुघ्न यादव को Fertilizers and Chemicals Travancore Ltd. में Technician (Process) के पद पर 5 मई 2021 को दो वर्ष की प्रारंभिक अवधि के लिए consolidated pay पर नियुक्त किया गया था। नियुक्ति के समय उन्होंने attestation form में घोषणा की थी कि उनके खिलाफ कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है। नियुक्ति के लगभग छह महीने बाद कंपनी ने उनके criminal antecedents की पुलिस से जांच कराई। जिला मजिस्ट्रेट की रिपोर्ट में सामने आया कि 3 अप्रैल 2019 को उनके खिलाफ IPC की धारा 323 और 504 के तहत एक Non-Cognizable Report यानी NCR दर्ज हुई थी। इसके बाद 30 अप्रैल 2022 को उन्हें show-cause notice जारी किया गया और पूछा गया कि गलत जानकारी देने के आधार पर उनकी सेवाएं समाप्त क्यों न की जाएं।

कर्मचारी ने कहा- मुझे NCR की जानकारी ही नहीं थी

शत्रुघ्न यादव ने अपने जवाब में कहा कि उन्होंने जानबूझकर कोई जानकारी नहीं छिपाई थी। उनका दावा था कि उन्हें NCR दर्ज होने की जानकारी ही नहीं थी। उन्हें न कोई summons मिला था, न गिरफ्तार किया गया और न ही पुलिस ने उन्हें इस मामले में पूछताछ के लिए बुलाया था। अपने पक्ष में उन्होंने 9 जुलाई 2020 का पुलिस प्रमाणपत्र भी पेश किया, जिसमें संबंधित पुलिस रिकॉर्ड के आधार पर उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल प्रविष्टि नहीं बताई गई थी। बाद में उन्होंने 2023 में एक और पुलिस प्रमाणपत्र तथा final report रिकॉर्ड पर रखी। इसमें बताया गया कि जांच के बाद उनके खिलाफ कोई साक्ष्य नहीं मिला और उनका नाम आरोपियों की सूची से हटा दिया गया था। रिकॉर्ड के अनुसार उन्हें संबंधित अवधि में न पुलिस स्टेशन बुलाया गया था और न गिरफ्तार किया गया था। इसके बावजूद कंपनी ने 5 अगस्त 2023 को उनकी नियुक्ति समाप्त कर दी।

केरल हाईकोर्ट से भी नहीं मिली थी राहत

बर्खास्तगी को चुनौती देते हुए यादव ने केरल हाईकोर्ट में याचिका दायर की। Single Judge ने हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और माना कि उन्हें NCR की जानकारी थी या नहीं, यह disputed question of fact है। इसके बाद Division Bench ने भी Single Judge के फैसले को बरकरार रखते हुए उनकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा- केवल Non-Disclosure से Termination नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि criminal antecedents से जुड़े मामलों में termination को mechanical तरीके से नहीं किया जा सकता। Employer को मामले के सभी relevant facts और circumstances पर विचार करना होगा। कोर्ट ने दो चरणों वाली जांच को महत्वपूर्ण बताया। पहला चरण यह है कि क्या कर्मचारी ने वास्तव में कोई जानकारी छिपाई या गलत जानकारी दी और क्या उसे संबंधित आपराधिक मामले की जानकारी थी। दूसरे चरण में employer को अपराध की प्रकृति, कथित suppression की स्थिति, कर्मचारी की भूमिका, अपराध की गंभीरता, कर्मचारी के पद और उसकी जिम्मेदारियों तथा आपराधिक मामले के अंतिम परिणाम पर विचार करना होगा।

'जिस बात की जानकारी ही नहीं, उसे छिपाया कैसे जा सकता है?'

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण बात यह कही कि suppression के लिए knowledge जरूरी है। कोर्ट ने पाया कि यादव को NCR के बारे में जानकारी होने का कोई ठोस प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं था। उन्हें न summons मिला था, न पुलिस स्टेशन बुलाया गया, न गिरफ्तार किया गया और न पूछताछ की गई। कोर्ट ने यह भी माना कि बाद के दस्तावेजों से उनका यह दावा मजबूत होता है कि उन्हें NCR की जानकारी नहीं थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि जिस तथ्य के बारे में व्यक्ति को जानकारी ही नहीं थी, उसे छिपाने का आरोप लगाना तार्किक रूप से संभव नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण सावधानी भी जोड़ी—सिर्फ "मुझे पता नहीं था" कहना पर्याप्त नहीं है। कर्मचारी को विश्वसनीय और ठोस सामग्री से अपनी अनभिज्ञता साबित करनी होगी।

माता-पिता भी आरोपी थे, फिर भी कोर्ट ने क्यों नहीं माना कि कर्मचारी को जानकारी थी?

Employer की ओर से यह दलील दी गई थी कि यादव के माता-पिता भी NCR में आरोपी थे, इसलिए यह मानना मुश्किल है कि यादव को मामले की जानकारी नहीं थी।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को केवल अनुमान माना। रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्रमाण नहीं था जिससे यह साबित हो कि माता-पिता ने यादव को NCR के बारे में बताया था या उन्हें किसी अन्य तरीके से मामले की जानकारी मिली थी। कोर्ट ने कहा कि बिना ठोस सामग्री के केवल अनुमान के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि कर्मचारी को आपराधिक मामले की जानकारी थी।

सुप्रीम कोर्ट ने Avtar Singh के पुराने सिद्धांत को फिर दोहराया

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में Avtar Singh v. Union of India के तीन-जजों की पीठ के फैसले में तय किए गए सिद्धांतों को दोहराया।

इसके अनुसार उम्मीदवार या कर्मचारी द्वारा criminal conviction, acquittal, arrest या pending criminal case से संबंधित मांगी गई जानकारी सही होनी चाहिए। लेकिन termination या candidature cancellation का फैसला करते समय employer को मामले की विशेष परिस्थितियों और लागू नियमों को भी ध्यान में रखना होगा।

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि यदि कर्मचारी service में confirmed है, तो verification form में suppression या false information के आधार पर termination, removal या dismissal से पहले departmental enquiry आवश्यक होगी।

सिर्फ आपराधिक रिकॉर्ड मिलना नौकरी खत्म करने का आधार नहीं

फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि criminal antecedent सामने आने के बाद employer को यह नहीं मान लेना चाहिए कि कर्मचारी स्वतः नौकरी के लिए अयोग्य हो गया है।

Termination से पहले यह देखना जरूरी है कि:

  • कर्मचारी को मामले की जानकारी थी या नहीं।

  • उसने जानबूझकर कोई जानकारी छिपाई या नहीं।

  • कथित suppression कितना गंभीर है।

  • अपराध किस प्रकृति का था।

  • कर्मचारी किस पद पर कार्यरत था।

  • अपराध का उस पद की suitability पर क्या प्रभाव पड़ता है।

  • आपराधिक मामले का अंतिम परिणाम क्या रहा।

  • मामले की कोई विशेष परिस्थिति कर्मचारी के पक्ष में है या नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन पहलुओं पर विचार किए बिना termination order टिकाऊ नहीं हो सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने बर्खास्तगी को अवैध माना

मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि employer ने आवश्यक दो-स्तरीय जांच नहीं की। अधिकारियों ने यह मान लिया था कि criminal antecedent का अस्तित्व अपने आप कर्मचारी को नौकरी के लिए अयोग्य बना देता है। कोर्ट के अनुसार अपराध की प्रकृति, पद पर उसके प्रभाव और बाद में यादव के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही के परिणाम को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने termination order को illegal और बिना proper application of mind के माना।

कर्मचारी को वापस नौकरी पर लेने का आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने termination order रद्द करते हुए शत्रुघ्न यादव को तत्काल service में reinstate करने का आदेश दिया। कोर्ट ने consequential benefits देने का निर्देश दिया, लेकिन back wages को 50 प्रतिशत तक सीमित कर दिया। यह राशि आठ सप्ताह के भीतर भुगतान करनी होगी। यदि भुगतान में देरी होती है तो देय राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज लागू होगा।

फैसले का मतलब क्या है?

इस फैसले का यह मतलब नहीं है कि कर्मचारी criminal case छिपा दें और employer उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सकता। सही कानूनी स्थिति यह है कि यदि कर्मचारी को मामले की जानकारी थी और उसने जानबूझकर उसे छिपाया, तो employer कार्रवाई कर सकता है। खासकर गंभीर अपराध, महत्वपूर्ण पद या multiple criminal cases जैसी परिस्थितियों में suppression का महत्व और बढ़ सकता है। लेकिन यदि कर्मचारी यह विश्वसनीय रूप से साबित कर देता है कि उसे संबंधित criminal case की जानकारी ही नहीं थी, तो उसे जानबूझकर suppression का दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।

अन्य न्यायिक रिकॉर्ड से भी मामले की पुष्टि

मामले की procedural history और कानूनी स्थिति उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड से भी पुष्ट होती है। सुप्रीम कोर्ट के judgment में स्पष्ट रूप से दर्ज है कि मामला Kerala High Court के Writ Appeal No. 414 of 2025 के 4 जुलाई 2025 के आदेश से उत्पन्न हुआ था और High Court ने Single Judge के termination में हस्तक्षेप से इनकार करने वाले निर्णय को बरकरार रखा था। मामले में सुप्रीम कोर्ट ने Ravindra Kumar v. State of U.P. और Umesh Chandra Yadav v. Inspector General and Chief Security Commissioner, Railway Protection Force जैसे पहले के फैसलों के सिद्धांतों को भी ध्यान में रखा। कोर्ट ने दोहराया कि candidate की suitability और suppression के प्रभाव को वास्तविक परिस्थितियों के आधार पर देखना होगा, न कि किसी कठोर automatic formula के तहत।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नौकरी में criminal antecedents के verification को कमजोर नहीं करता, बल्कि employer के decision-making process को अधिक objective बनाता है। कर्मचारी से सही जानकारी देने की अपेक्षा बनी रहती है, लेकिन किसी ऐसे आपराधिक मामले को जानबूझकर छिपाने का दोष नहीं लगाया जा सकता जिसके अस्तित्व की जानकारी कर्मचारी को थी ही नहीं।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर termination को रद्द कर कर्मचारी को बहाल किया और 50 प्रतिशत back wages देने का निर्देश दिया।