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स्कूल यूनिफॉर्म में हिजाब पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: “इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित नहीं हुई”, मुस्लिम छात्रा की याचिका खारिज

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले ने हिजाब, धार्मिक स्वतंत्रता और स्कूल यूनिफॉर्म को लेकर देश की पुरानी बहस फिर गर्म कर दी है। कोर्ट ने मुस्लिम छात्रा की याचिका खारिज करते हुए कहा कि हिजाब को इस्लाम की “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” साबित करने के लिए पर्याप्त सामग्री पेश नहीं की गई। साथ ही अदालत ने स्पष्ट किया कि समान, गैर-भेदभावपूर्ण और अनुशासन बनाए रखने वाली स्कूल यूनिफॉर्म में धार्मिक आधार पर बदलाव की मांग नहीं की जा सकती। फैसले ने 2022 के कर्नाटक हिजाब विवाद और सुप्रीम कोर्ट के विभाजित फैसले को भी एक बार फिर चर्चा में ला दिया है।

Sonali25 अग. 2026, 02:22 PM IST
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स्कूल यूनिफॉर्म में हिजाब पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: “इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा साबित नहीं हुई”, मुस्लिम छात्रा की याचिका खारिज

प्रयागराज:

 स्कूल की यूनिफॉर्म में हिजाब पहनने को लेकर चल रही कानूनी बहस के बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। कोर्ट ने एक नाबालिग मुस्लिम छात्रा की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सिर पर हिजाब पहनने की अनुमति मांगी थी। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता ऐसा पर्याप्त आधार या सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं रख सकी, जिससे यह साबित हो कि सिर पर स्कार्फ पहनना इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है। जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की डिवीजन बेंच ने 21 अगस्त 2026 को फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी स्कूल की यूनिफॉर्म नीति समान रूप से लागू होती है, वास्तविक और सद्भावनापूर्ण है तथा भेदभावपूर्ण नहीं है, तो कोई छात्र अपनी व्यक्तिगत या धार्मिक पसंद के आधार पर निर्धारित ड्रेस कोड में बदलाव की मांग नहीं कर सकता। फैसले की तारीख और पीठ की जानकारी स्वतंत्र कानूनी रिपोर्ट में भी दर्ज है।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता सुकैना रिजवी प्रयागराज के अतरसुइया स्थित टैगोर पब्लिक स्कूल की छात्रा हैं। वह कक्षा VI से X तक इसी स्कूल में पढ़ चुकी थीं और कक्षा XI में दोबारा प्रवेश लेना चाहती थीं। उनका कहना था कि उन्होंने स्कूल में पहले की पढ़ाई के दौरान हिजाब/हेडस्कार्फ पहना था और उस समय स्कूल की ओर से कोई आपत्ति नहीं की गई। लेकिन कक्षा XI में प्रवेश के समय स्कूल प्रशासन ने निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने की उनकी मांग स्वीकार नहीं की। इसके बाद छात्रा ने अपनी मां के माध्यम से इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया और स्कूल को निर्देश देने की मांग की कि उसे निर्धारित यूनिफॉर्म के अतिरिक्त हेडस्कार्फ पहनने की अनुमति दी जाए।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने माना कि स्कूल यूनिफॉर्म केवल कपड़ों का नियम नहीं है। इसका उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच समानता, अनुशासन और संस्थागत पहचान बनाए रखना भी है। अदालत के अनुसार, यदि यूनिफॉर्म का नियम सभी विद्यार्थियों पर समान रूप से लागू होता है और किसी विशेष धर्म या समुदाय को निशाना नहीं बनाता, तो केवल धार्मिक या व्यक्तिगत पसंद के आधार पर उसमें अपवाद की मांग नहीं की जा सकती। कोर्ट ने यह भी कहा कि स्कूल चाहे तो भविष्य में अपनी यूनिफॉर्म नीति में बदलाव कर सकता है, लेकिन जब तक निर्धारित ड्रेस कोड लागू है, छात्र उससे अलग अतिरिक्त वस्त्र पहनने का अधिकार मांगकर उसे बदलने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

“हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा है”- साबित नहीं कर पाई छात्रा

फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा Essential Religious Practice यानी “अनिवार्य धार्मिक प्रथा” से जुड़ा है। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की ओर से ऐसा पर्याप्त सामग्री या प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं रखा गया जिससे यह स्थापित हो कि मुस्लिम महिला के लिए सिर पर हेडस्कार्फ पहनना इस्लाम की ऐसी अनिवार्य धार्मिक प्रथा है, जिसके बिना धार्मिक आस्था प्रभावित होती है। कोर्ट ने इस मुद्दे पर कर्नाटक हाईकोर्ट के 2022 के फुल बेंच फैसले को “persuasive authority of great value” माना।

कर्नाटक का 2022 फैसला क्यों महत्वपूर्ण है?

हिजाब विवाद की शुरुआत में कर्नाटक हाईकोर्ट की फुल बेंच ने 15 मार्च 2022 को माना था कि शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पहनना इस्लाम की Essential Religious Practice के रूप में स्थापित नहीं हुआ है। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और 13 अक्टूबर 2022 को जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस सुधांशु धूलिया की दो सदस्यीय पीठ ने अलग-अलग राय दी। जस्टिस हेमंत गुप्ता ने अपीलें खारिज करते हुए कर्नाटक की कार्रवाई को बरकरार रखा, जबकि जस्टिस सुधांशु धूलिया ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फैसला और संबंधित सरकारी आदेश रद्द करते हुए स्कूल-कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध न लगाने की बात कही। मतभेद के कारण मामला उचित बड़ी पीठ के गठन के लिए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के समक्ष भेजा गया था। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का 2022 का फैसला अंतिम बहुमत वाला निर्णय नहीं बना।

सुप्रीम कोर्ट के विभाजित फैसले का इलाहाबाद HC पर क्या असर?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस महत्वपूर्ण पहलू को नजरअंदाज नहीं किया। उसने माना कि सुप्रीम कोर्ट में Aishat Shifa मामले में दो न्यायाधीशों की अलग-अलग राय आई थी और इस मुद्दे पर अभी कोई अंतिम authoritative Supreme Court pronouncement नहीं है। इसके बावजूद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि उसके सामने ऐसा कोई पर्याप्त कारण या नया आधार नहीं है जिसके चलते वह कर्नाटक हाईकोर्ट की फुल बेंच द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण से अलग राय बनाए।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ था?

13 अक्टूबर 2022 को सुप्रीम कोर्ट के सामने हिजाब विवाद पर दो बिल्कुल अलग संवैधानिक दृष्टिकोण सामने आए थे। जस्टिस हेमंत गुप्ता ने यूनिफॉर्म, समानता, संस्थागत अनुशासन और धर्मनिरपेक्ष शैक्षणिक वातावरण पर जोर दिया था। दूसरी ओर जस्टिस सुधांशु धूलिया ने छात्राओं की निजता, गरिमा, धार्मिक स्वतंत्रता और शिक्षा के अधिकार के पहलू पर जोर दिया था। यही विभाजित फैसला आज भी हिजाब विवाद की कानूनी पृष्ठभूमि का अहम हिस्सा है।

यूनिफॉर्म को लेकर हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने माना कि स्कूल यूनिफॉर्म का उद्देश्य केवल विद्यार्थियों को एक जैसे कपड़े पहनाना नहीं है। इससे कक्षा में सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक अंतर को कम करने तथा स्कूल की संस्थागत पहचान बनाए रखने में मदद मिलती है। कोर्ट ने यह भी माना कि धर्मनिरपेक्ष वातावरण वाले संस्थान में समान ड्रेस कोड सभी विद्यार्थियों पर एक समान लागू किया जाना चाहिए।

क्या इस फैसले का मतलब पूरे देश में हिजाब पर प्रतिबंध है?

नहीं। यह फैसला इस विशेष मामले और स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म नीति से जुड़ा है। इसे पूरे देश में हिजाब पर सामान्य प्रतिबंध के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट का Aishat Shifa मामला विभाजित फैसले के कारण अंतिम बहुमत वाले निर्णय तक नहीं पहुंचा था। इसलिए हिजाब को लेकर व्यापक संवैधानिक प्रश्न अभी भी अलग कानूनी संदर्भों में महत्वपूर्ण बने हुए हैं।

फैसले का सीधा असर

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले से फिलहाल संबंधित छात्रा को टैगोर पब्लिक स्कूल की निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने के लिए अदालत से राहत नहीं मिली है।

फैसले का व्यापक कानूनी संदेश यह है कि किसी छात्र द्वारा धार्मिक आधार पर यूनिफॉर्म में अतिरिक्त वस्त्र जोड़ने की मांग तभी स्वीकार्य हो सकती है जब उसके पक्ष में मजबूत संवैधानिक और कानूनी आधार स्थापित हो। इस मामले में कोर्ट ने माना कि हिजाब को इस्लाम की Essential Religious Practice साबित करने के लिए आवश्यक सामग्री प्रस्तुत नहीं की गई। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के 2022 के विभाजित हिजाब फैसले के बाद किसी हाईकोर्ट द्वारा कर्नाटक हाईकोर्ट के 2022 के दृष्टिकोण को “persuasive authority of great value” मानते हुए उसी दिशा में आगे बढ़ना इस विवाद को एक बार फिर राष्ट्रीय संवैधानिक बहस के केंद्र में ला सकता है।