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हिरासत में मौत पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला, छत्तीसगढ़ पुलिस से छीनी जांच CBI को सौंपी; परिवार को ₹25 लाख मुआवजा
छत्तीसगढ़ में कथित तौर पर महज ₹1,200 की शराब के मामले में गिरफ्तार 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी की हिरासत में मौत ने अब पूरे पुलिस तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। गिरफ्तारी के बाद अस्पताल में मौत, न्यायिक जांच में सिर की चोट का खुलासा और फिर FIR दर्ज करने में दो साल से अधिक की देरी—इन परिस्थितियों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राज्य पुलिस से जांच लेकर CBI को सौंप दी है। Justice Vikram Nath और Justice Sandeep Mehta की पीठ ने मृतक के परिवार को ₹25 लाख का अंतरिम मुआवजा देने के साथ यह भी निर्देश दिया है कि जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानून के मुताबिक कार्रवाई की जाए।

नई दिल्ली।
छत्तीसगढ़ में 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी की हिरासत में मौत के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 12 अगस्त 2026 को बड़ा आदेश देते हुए जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को सौंप दी। सुप्रीम कोर्ट ने FIR दर्ज करने में हुई दो साल से अधिक की देरी और न्यायिक जांच में सिर की चोट सामने आने के बावजूद प्रभावी आपराधिक जांच नहीं होने को गंभीरता से लिया। कोर्ट ने CBI को नियमित आपराधिक मामला दर्ज कर जांच किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपने का निर्देश दिया है। साथ ही मृतक के परिवार को अंतरिम राहत के तौर पर ₹25 लाख देने का आदेश दिया गया है। Justice Vikram Nath और Justice Sandeep Mehta की पीठ ने कहा कि जांच के दौरान यदि कोई अधिकारी हिरासत में हुई हिंसा के लिए जिम्मेदार पाया जाता है तो उसके खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई और अभियोजन किया जाए। राज्य के उन अधिकारियों का आचरण भी CBI की जांच में शामिल होगा, जिन्होंने न्यायिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद उचित कदम नहीं उठाए।
₹1,200 की कथित शराब के मामले में हुई थी गिरफ्तारी
मामले की शुरुआत 18 जनवरी 2024 से हुई थी। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के मुताबिक, सीपत थाना पुलिस को ग्राम मोहड़ा में श्रवण सूर्यवंशी उर्फ सरवन तामरे द्वारा कच्ची महुआ शराब बिक्री के लिए रखने की सूचना मिली थी। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए श्रवण को गिरफ्तार किया। रिकॉर्ड के अनुसार उसके पास से कुल 6 लीटर कच्ची महुआ शराब मिली थी, जिसकी कीमत लगभग ₹1,200 बताई गई। इसके बाद Crime No. 47/2024 दर्ज किया गया और आबकारी अधिनियम की धारा 34(2) के तहत कार्रवाई की गई। उसे Central Jail, Bilaspur भेज दिया गया। यानी जिस मामले में गिरफ्तारी हुई, उसमें कथित शराब की कीमत केवल ₹1,200 थी। लेकिन इसके कुछ ही दिनों बाद उसकी हिरासत में मौत और फिर सामने आई सिर की चोट ने पूरे मामले को गंभीर बना दिया।
गिरफ्तारी के समय मेडिकल जांच में नहीं मिली थी बाहरी चोट
मामले का एक अहम पहलू मेडिकल रिकॉर्ड से जुड़ा है। राज्य की ओर से हाईकोर्ट में कहा गया था कि 18 जनवरी को गिरफ्तारी के बाद श्रवण का मेडिकल परीक्षण कराया गया था और उस समय कोई बाहरी चोट नहीं मिली थी। मेडिकल रिकॉर्ड में सामान्य सूजन और नियमित शराब सेवन का उल्लेख किया गया था तथा उसे उस समय फिट बताया गया था। इसके बाद 21 जनवरी 2024 को श्रवण को CIMS Hospital, Bilaspur रेफर किया गया। उपलब्ध हाईकोर्ट रिकॉर्ड के अनुसार 22 जनवरी 2024 को सुबह करीब 6 बजे इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। यही घटनाक्रम बाद की न्यायिक जांच में सामने आए head injury के निष्कर्ष के कारण बेहद महत्वपूर्ण हो गया।
न्यायिक जांच में Head Injury से मौत की बात
श्रवण की मौत के बाद 22 जनवरी 2024 को जेल अधीक्षक ने जिला एवं सत्र न्यायाधीश, बिलासपुर को न्यायिक जांच के लिए पत्र लिखा। इसके बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 176 के तहत जांच शुरू कराई। Judicial Magistrate First Class, Bilaspur ने 22 जुलाई 2024 की रिपोर्ट में राय दी कि श्रवण की मौत सिर में लगी चोट से उत्पन्न complications के कारण हुई प्रतीत होती है। न्यायिक जांच की यह रिपोर्ट बाद में सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही में महत्वपूर्ण बनी। सुप्रीम कोर्ट ने अब CBI को यह भी जांचने का निर्देश दिया है कि न्यायिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद राज्य के अधिकारियों ने क्या कदम उठाए और यदि उचित कार्रवाई नहीं की गई तो उसके पीछे क्या कारण था।
हाईकोर्ट पहुंचा परिवार, मांगे थे ₹50 लाख
श्रवण की पत्नी लाहरा बाई तामरे और उनकी दो बेटियों ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। परिवार ने मामले की निष्पक्ष जांच और ₹50 लाख मुआवजे की मांग की थी। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 3 अक्टूबर 2024 को फैसला सुनाते हुए राज्य को ₹1 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया था। हाईकोर्ट ने माना था कि हिरासत में हुई मौत के मामले में परिवार को संवैधानिक राहत दी जा सकती है। रिकॉर्ड में मृतक की पत्नी के साथ उनकी दो नाबालिग बेटियां भी याचिकाकर्ता के रूप में दर्ज हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने ₹1 लाख मुआवजे को माना अपर्याप्त
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट द्वारा दिए गए ₹1 लाख मुआवजे पर गंभीर आपत्ति जताई। कोर्ट ने माना कि यह राशि परिवार को हुए नुकसान और मामले की गंभीरता के अनुरूप नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के Home Secretary और DGP को वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए पेश होने का निर्देश दिया था।
बाद की सुनवाई में DGP की ओर से कहा गया कि जांच का आदेश दिया गया है और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। FIR में देरी को लेकर यह दलील भी दी गई कि न्यायिक जांच रिपोर्ट पुलिस विभाग को प्राप्त नहीं हुई थी। कोर्ट ने इस दलील पर सवाल उठाते हुए कहा कि न्यायिक जांच रिपोर्ट राज्य की ओर से हाईकोर्ट में दाखिल हलफनामे के साथ पहले से संलग्न थी।
DGP की भूमिका पर सुप्रीम कोर्ट की तीखी टिप्पणी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाया कि न्यायिक जांच में सिर की चोट की बात सामने आने के बावजूद FIR दर्ज करने में इतनी देरी क्यों हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने DGP की कार्यप्रणाली पर कड़ी मौखिक टिप्पणी करते हुए उनकी क्षमता पर भी सवाल उठाए। हालांकि यह स्पष्ट है कि ऐसी मौखिक टिप्पणी किसी अधिकारी की आपराधिक दोषसिद्धि नहीं है। अंतिम जिम्मेदारी CBI जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही तय होगी।
दो साल से ज्यादा देर से FIR, 30 जुलाई 2026 को दर्ज हुई
मामले में सबसे गंभीर सवाल FIR दर्ज करने में हुई देरी का है। जनवरी 2024 में श्रवण की मौत के बावजूद संबंधित अधिकारियों के खिलाफ FIR कथित तौर पर 30 जुलाई 2026 को दर्ज की गई। यानी न्यायिक जांच में सिर की चोट का निष्कर्ष सामने आने के बाद भी आपराधिक कार्रवाई शुरू होने में लगभग दो साल का लंबा समय लगा।
इसी देरी और राज्य स्तर पर जांच की प्रभावशीलता को लेकर उठे सवालों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने अब पूरी जांच CBI को सौंप दी है।
Supreme Court केस रिकॉर्ड से भी हुई पुष्टि
यह मामला सुप्रीम कोर्ट में “Lahra Bai Tamre and Others v. State of Chhattisgarh and Others” के नाम से दर्ज है। आधिकारिक रिकॉर्ड के अनुसार इसका Diary No. 48963/2025 है और बाद में यह SLP (Crl.) No. 728/2026 के रूप में सूचीबद्ध हुआ। मामला 2026 में कई बार सुप्रीम कोर्ट के समक्ष सूचीबद्ध हुआ। इससे यह स्पष्ट है कि मामला 12 अगस्त 2026 को पहली बार अदालत के सामने नहीं आया था, बल्कि कई महीनों से शीर्ष अदालत में लंबित था।
CBI अब किन सवालों की करेगी जांच?
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद CBI की जांच कई महत्वपूर्ण सवालों पर केंद्रित होगी—
श्रवण को हिरासत में सिर पर चोट कैसे लगी?
चोट कब और किन परिस्थितियों में लगी?
क्या हिरासत के दौरान उसके साथ मारपीट या हिंसा हुई?
उसकी मौत के लिए कौन-कौन से अधिकारी जिम्मेदार हैं?
न्यायिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद FIR और आपराधिक जांच में देरी क्यों हुई?
राज्य के किन अधिकारियों ने उचित कार्रवाई नहीं की?
क्या किसी अधिकारी की लापरवाही या जानबूझकर निष्क्रियता ने जांच को प्रभावित किया?
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जांच में जिम्मेदार पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ कानून के अनुसार कार्रवाई और अभियोजन किया जाए।
CBI को वरिष्ठ अधिकारी के नेतृत्व में करनी होगी जांच
सुप्रीम कोर्ट ने CBI को निर्देश दिया है कि वह हिरासत में हुई मौत को लेकर नियमित criminal case दर्ज करे और जांच किसी वरिष्ठ अधिकारी को सौंपे। साथ ही छत्तीसगढ़ के DGP को निर्देश दिया गया है कि मामले से जुड़े सभी रिकॉर्ड एक विशेष दूत के माध्यम से एक सप्ताह के भीतर CBI Director को सौंपे जाएं। CBI को जांच तेजी से पूरी करनी होगी और investigating officer की रिपोर्ट अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट के सामने रखनी होगी। मामले की अगली सुनवाई 13 अक्टूबर 2026 को निर्धारित की गई है।
परिवार को ₹25 लाख अंतरिम मुआवजा
सुप्रीम कोर्ट ने मृतक के परिवार को ₹25 लाख का अंतरिम मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने इस तथ्य को महत्वपूर्ण माना कि मृतक परिवार का एकमात्र कमाने वाला व्यक्ति था और राज्य ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को चुनौती नहीं दी थी कि उसकी मौत custody के दौरान हुई अप्राकृतिक मृत्यु थी। हालांकि ₹25 लाख अंतिम मुआवजा नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अंतिम मुआवजे की राशि वर्तमान याचिका पर अंतिम फैसला सुनाते समय निर्धारित की जाएगी। राज्य को ₹25 लाख की अंतरिम राशि चार सप्ताह के भीतर याचिकाकर्ताओं के बैंक खाते में जमा करनी होगी।
Article 21 के तहत भी महत्वपूर्ण है मामला
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अपने 3 अक्टूबर 2024 के फैसले में custodial death को Article 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार से जोड़ते हुए राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी पर जोर दिया था। हाईकोर्ट ने Saheli v. Commissioner of Police, Nilabati Behera v. State of Orissa और D.K. Basu v. State of West Bengal जैसे महत्वपूर्ण सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी उल्लेख किया था। इन फैसलों में हिरासत में हिंसा, मौलिक अधिकारों की सुरक्षा और संवैधानिक मुआवजे के सिद्धांतों को स्पष्ट किया गया है।
एक जरूरी तथ्य-सुधार: मौत 21 या 22 जनवरी?
इस मामले की रिपोर्टिंग में एक महत्वपूर्ण तारीख को लेकर अंतर सामने आता है। शुरुआती रिपोर्टिंग में श्रवण की मृत्यु 21 जनवरी 2024 बताई गई है। लेकिन उपलब्ध छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के विस्तृत रिकॉर्ड के अनुसार 21 जनवरी को श्रवण को CIMS Hospital रेफर किया गया था और 22 जनवरी 2024 को सुबह करीब 6 बजे इलाज के दौरान उसकी मृत्यु हुई। इसलिए विस्तृत समाचार में 22 जनवरी 2024 को मृत्यु की तारीख लिखना अधिक सुरक्षित और न्यायिक रिकॉर्ड के अनुरूप है।
क्यों महत्वपूर्ण है Supreme Court का यह आदेश?
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ राज्य पुलिस को दोबारा जांच करने का निर्देश नहीं दिया, बल्कि पूरी जांच CBI को सौंप दी है। इसके साथ ही कोर्ट ने उन राज्य अधिकारियों के conduct को भी जांच का हिस्सा बनाया है जिन्होंने न्यायिक जांच रिपोर्ट के बाद कथित तौर पर उचित कदम नहीं उठाए। एक तरफ न्यायिक जांच में सिर की चोट से मौत की बात सामने आई, दूसरी तरफ FIR दर्ज करने में दो साल से अधिक की देरी हुई। अब CBI को इन दोनों घटनाओं के बीच की पूरी कड़ी की जांच करनी होगी। यह आदेश custodial death मामलों में राज्य की जवाबदेही, Article 21 के संरक्षण और निष्पक्ष जांच के महत्व को भी रेखांकित करता है।
₹1,200 की कथित शराब के मामले में 18 जनवरी 2024 को गिरफ्तार किए गए 34 वर्षीय श्रवण सूर्यवंशी की कुछ दिनों बाद custody में मौत हो गई। न्यायिक जांच में सिर की चोट से जुड़ी complications की बात सामने आई, लेकिन FIR और प्रभावी आपराधिक जांच को लेकर लंबे समय तक सवाल बने रहे। पहले छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने परिवार को ₹1 लाख मुआवजा दिया था। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां शीर्ष अदालत ने राज्य की कार्रवाई पर गंभीर सवाल उठाते हुए जांच CBI को सौंप दी और अंतरिम मुआवजा बढ़ाकर ₹25 लाख कर दिया। अब CBI को यह पता लगाना होगा कि श्रवण को सिर में चोट कैसे लगी, custody में उसके साथ क्या हुआ और न्यायिक जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद भी FIR तथा कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई। सुप्रीम कोर्ट ने जांच को तेजी से पूरा करने और 13 अक्टूबर 2026 को जांच अधिकारी की रिपोर्ट अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया है।
