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अब मनमानी पर उतरा अमेरिका: रूस से तेल खरीदने वाले भारत समेत 5 देशों पर थोपेगा 100% 'जबरन' टैक्स

सीनेट में बिल पास, धमकी दी— 'या तो अमेरिका का साथ दो, या भुगतो आर्थिक सजा'; अपनी तेल कंपनियों को दी खुली छूट

Vinod Tiwari08 अग. 2026, 12:35 PM IST
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अब मनमानी पर उतरा अमेरिका: रूस से तेल खरीदने वाले भारत समेत 5 देशों पर थोपेगा 100% 'जबरन' टैक्स
अपनी वैश्विक दादागिरी दिखाते हुए, अमेरिकी सीनेट ने एक विवादास्पद बिल पास किया है, जो सीधे तौर पर उन संप्रभु देशों के आंतरिक निर्णयों में हस्तक्षेप करता है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए रूस से तेल खरीद रहे हैं। 'जस्टिस फॉर यूक्रेन' बिल नाम से लाए गए इस कानून के तहत, भारत, चीन, तुर्की, संयुक्त अरब अमीरात और कतर को रूस से तेल आयात करने पर 100% भारी टैरिफ (जुर्माना) चुकाना होगा। ​सीनेटर लिंडसे ग्राहम जैसे युद्ध-समर्थक सांसदों द्वारा धकेले गए इस बिल के समर्थन में 86 सांसदों ने वोट दिया, जो दिखाता है कि अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में दूसरे देशों पर अपनी मर्जी थोपने को लेकर कितनी सहमति है। 100 सदस्यीय सीनेट में महज 11 सांसदों ने इस खुले आर्थिक दबाव का विरोध किया।

दादागिरी का सबूत: दोहरे मापदंड
इस बिल की सबसे बड़ी विडंबना और अमेरिका का दोहरा चरित्र इसके उन प्रावधानों में दिखता है, जहाँ यूरोपीय देशों को रूस से तेल खरीदने की खुली छूट दी गई है, जबकि भारत जैसे स्वतंत्र देश को निशाना बनाया जा रहा है। बिल में सफाई दी गई है कि जिन देशों की रूस से तेल पर निर्भरता 15% से कम है, वे इस दंडात्मक टैरिफ से मुक्त रहेंगे। यह स्पष्ट रूप से दिखाता है कि यह नियम 'रूस को रोकने' के लिए नहीं, बल्कि अमेरिका की विदेश नीति का पालन न करने वाले विकासशील देशों को दंडित करने के लिए बनाया गया एक हथियार है।

​आगे की राह: क्या बाकी दुनिया अमेरिका के आगे झुकेगी?
यह बिल अब निचले सदन, प्रतिनिधि सभा में जाएगा, जहाँ रिपब्लिकन पार्टी के बहुमत को देखते हुए इसके पास होने की पूरी संभावना है। इसके बाद, राष्ट्रपति जो बाइडन के हस्ताक्षर के साथ ही यह कानून बन जाएगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या भारत और अन्य देश अमेरिका की इस दादागिरी को स्वीकार करते हैं, या वे अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखते हुए इस अनुचित दबाव का कड़ा कूटनीतिक जवाब देते हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम वैश्विक व्यापार संबंधों में और खटास पैदा करेगा और अमेरिकी डॉलर की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाएगा।