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बीमा कंपनियों द्वारा पॉलिसी धारकों को क्लेम न देने की मनमानी: उपभोक्ताओं के पक्ष में अदालतों के सख्त फैसले
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देशभर में बीमा कंपनियों (Insurance Companies) द्वारा पॉलिसी धारकों के वैध दावों (Claims) को मनमाने ढंग से खारिज करने या उनमें बेवजह देरी करने के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। हालांकि, हाल ही में कंज्यूमर कोर्ट और आयोगों ने ऐसे मामलों में कड़ा रुख अपनाते हुए बीमा कंपनियों और अस्पतालों की मनमानी पर रोक लगानी शुरू कर दी है। कोर्ट के स्पष्ट निर्देश हैं कि कंपनियां बिना पुख्ता सबूत या तकनीकी बहानों के आधार पर आम जनता के अधिकारों का हनन नहीं कर सकतीं।
पिछले कुछ हफ्तों में ऐसे कई चर्चित मामले सामने आए हैं, जहां अदालतों ने बीमा दावों को खारिज करने या अनुचित व्यवहार पर कंपनियों व अस्पतालों को फटकार लगाई है:
1. नेशनल इंश्योरेंस कंपनी का मामला (त्रिस्सूर):
केरल की उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी को निर्देश दिया कि वह एक पॉलिसी धारक को 2,25,000 रुपये का भुगतान करे। कंपनी ने यह कहते हुए एंगियोप्लास्टी का मेडिक्लेम खारिज कर दिया था कि मरीज को पहले से हाइपरटेंशन (ब्लड प्रेशर) था। अदालत ने स्पष्ट किया कि बीमा कंपनियां केवल दावों के बहानों या मौखिक बयानों के आधार पर वैध क्लेम को खारिज नहीं कर सकतीं, जब तक कि इसके पुख्ता मेडिकल सबूत न हों।
2. भाटिया अस्पताल और कैशलेस क्लेम विवाद (मुंबई):
महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता आयोग ने मुंबई के भाटिया अस्पताल पर 37,000 रुपये का जुर्माना लगाया। कैशलेस बीमा दावा खारिज होने के बाद अस्पताल ने बिल के भुगतान से अधिक डिपाजिट मिलने के बावजूद एक नवजात शिशु को उसकी मां से 9 घंटे से अधिक समय तक अलग रखा और डिस्चार्ज देने में देरी की। आयोग ने इसे अस्पताल के कर्मचारियों का असंवेदनशील और लापरवाह रवैया करार दिया।
3. टाटा एआईजी और वाहन चोरी का क्लेम (विशाखापत्तनम):
विशाखापत्तनम जिला उपभोक्ता आयोग ने टाटा एआईजी जनरल इंश्योरेंस को निर्देश दिया कि वह एक दो महीने पुरानी चोरी हुई बाइक का क्लेम भुगतान करे। कंपनी ने पुलिस एफआईआर (FIR) में हुई देरी का हवाला देकर क्लेम रद्द कर दिया था। अदालत ने फैसला सुनाया कि पुलिस प्रक्रिया में हुई देरी की सजा किसी आम पॉलिसी धारक को नहीं दी जा सकती, यदि चोरी की घटना और दस्तावेज genuine हैं।
पॉलिसीधारकों के लिए जरूरी जानकारी
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बीमा कंपनियां बिना किसी ठोस कारण के क्लेम देने से मना करती हैं, तो पॉलिसीधारक बीमा लोकपाल या जिला उपभोक्ता फोरम में इसकी शिकायत दर्ज करा सकते हैं। हालिया न्यायिक फैसलों से यह उम्मीद बंधी है कि बीमा क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ेगी और ग्राहकों का हक मारा नहीं जाएगा।
