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आस्था का सम्मान और पर्यावरण की सुरक्षा: हैदराबाद में शुरू हुआ 'प्रोजेक्ट उद्वासना', अब नदियों-झीलों में नहीं फेंकी जाएगी पूजित सामग्री

अक्सर देखा जाता है कि पूजा-अर्चना के बाद देवी-देवताओं के चित्र, खंडित मूर्तियां, धार्मिक पुस्तकें और हवन-फूल जैसी सामग्रियां जल स्रोतों या खुले स्थानों पर विसर्जित कर दी जाती हैं, जिससे नदियां और झीलें गंभीर रूप से प्रदूषित होती हैं। इस समस्या से निपटने के लिए ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम (GHMC) ने 'प्रोजेक्ट उद्वासना' (Project Udvasana) नाम से एक अनूठी व वैज्ञानिक पहल शुरू की है।

Vinod Tiwari25 अग. 2026, 02:45 PM IST
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आस्था का सम्मान और पर्यावरण की सुरक्षा: हैदराबाद में शुरू हुआ 'प्रोजेक्ट उद्वासना', अब नदियों-झीलों में नहीं फेंकी जाएगी पूजित सामग्री

इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य 'रिचुअल से रिन्यूअल' (Ritual to Renewal) की भावना के साथ पूजित व धार्मिक निर्माल्य का सम्मानजनक, वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल निस्तारण व पुनर्चक्रण सुनिश्चित करना है।

तीन चरणों में 1260 किलो से अधिक निर्माल्य का वैज्ञानिक निस्तारण

ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (SWM) नियमों और स्वच्छ भारत मिशन (शहरी) के अंतर्गत संचालित इस अभियान को तीन अलग-अलग चरणों में 8 प्रमुख मंदिरों में आयोजित किया गया। इस दौरान 194 प्रतिभागियों ने स्वेच्छा से आगे आकर कुल 1,262.59 किलोग्राम पूजित सामग्री संग्रह केंद्रों पर जमा कराई।

  • पहला चरण (पायलट प्रोजेक्ट): इसकी शुरुआत जुबली हिल्स स्थित इस्कॉन (ISKCON) मंदिर से की गई। इसमें 7 श्रद्धालुओं ने 66 किलोग्राम धार्मिक सामग्री जमा कराकर परियोजना की नींव रखी।
  • दूसरा चरण: यूसुफगुड़ा में आयोजित दूसरे चरण में जनभागीदारी तेजी से बढ़ी और 443 किलोग्राम सामग्री एकत्र हुई।
  • तीसरा चरण (शहरव्यापी विस्तार): तीसरे चरण में हैदराबाद के सभी 6 जोनों के 6 प्रमुख मंदिरों में एक साथ अभियान चला। इसमें 124 श्रद्धालुओं ने 753.59 किलोग्राम सामग्री सौंपी।

जोनवार आंकड़ों के अनुसार, तीसरे चरण में सर्वाधिक 217 किलोग्राम सामग्री खैरताबाद जोन से मिली, जबकि सिकंदराबाद जोन से 187.10 किलोग्राम और चारमीनार जोन से 169.40 किलोग्राम सामग्री प्राप्त हुई।

जागरूकता से लेकर रीसाइक्लिंग तक: कैसे काम करती है पूरी प्रक्रिया?

'प्रोजेक्ट उद्वासना' के तहत आस्था की मर्यादा बनाए रखते हुए एक सुव्यवस्थित वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई गई है:

  1. पंजीकरण व तौल: मंदिर परिसरों में स्थापित केंद्रों पर श्रद्धालुओं द्वारा लाई गई सामग्री का पंजीकरण व वजन किया जाता है।
  2. पृथक्करण (Segregation): फोटो फ्रेम, मूर्तियां, कागज और फूल-मालाओं को अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है।
  3. उद्वासन पूजा: परंपरा और धार्मिक मर्यादा का पालन करते हुए विधि-विधान से 'उद्वासन पूजा' संपन्न की जाती है।
  4. डिसमेंटलिंग व पुनर्चक्रण: इसके बाद अधिकृत एजेंसी वेस्ट वेंचर्स लिमिटेड (Waste Ventures Ltd.) को सामग्री भेजी जाती है, जहां निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत कांच, लकड़ी, धातु व अन्य घटकों का पर्यावरण-अनुकूल रीसाइक्लिंग व निस्तारण किया जाता है।

मंदिरों में नियमित अभियान चलाने की तैयारी

GHMC के अनुसार, यह पहल नागरिकों में कचरा पृथक्करण और जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा देने में अत्यंत प्रभावी साबित हो रही है। नगर निगम अब इसे शहर के अन्य प्रमुख मंदिरों में नियमित रूप से संचालित करने के लिए एक मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) तैयार कर रहा है, ताकि सामाजिक संगठनों व अधिकृत रीसाइक्लर्स के साथ मिलकर इसे स्थायी रूप दिया जा सके।