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अंबेडकर के जीवन पर बनेगा भव्य म्यूरल, जमीन अधिग्रहण पर हाईकोर्ट की मुहर; कहा- यह सिर्फ सुंदरता नहीं, ‘पब्लिक पर्पज’ है
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की विरासत को सार्वजनिक स्थल पर जीवंत करने की पहल को बॉम्बे हाईकोर्ट ने संवैधानिक कसौटी पर भी सही माना है। कोर्ट ने साफ कहा कि अंबेडकर के जीवन और विचारों को दर्शाने वाले म्यूरल के लिए जमीन अधिग्रहण महज सौंदर्यीकरण नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, प्रेरणा और संवैधानिक मूल्यों को संरक्षित करने वाला ‘सार्वजनिक उद्देश्य’ है

मुंबई/नागपुर:
डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के जीवन, विचारों और योगदान को दर्शाने वाले म्यूरल के निर्माण के लिए जमीन अधिग्रहण को लेकर बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने माना कि अंबेडकर के जीवन और विचारों को प्रदर्शित करने वाला म्यूरल केवल सौंदर्यीकरण का हिस्सा नहीं है, बल्कि यह समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए ज्ञान, प्रेरणा और संवैधानिक मूल्यों को आगे बढ़ाने वाला कार्य है। इसलिए इसके लिए जमीन अधिग्रहण ‘पब्लिक पर्पज’ यानी सार्वजनिक उद्देश्य के दायरे में आता है।
क्या है पूरा मामला?
मामला अमरावती के इरविन स्क्वायर में स्थित डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर की प्रतिमा के आसपास के क्षेत्र के विकास और सौंदर्यीकरण से जुड़ा है। इसी उद्देश्य से याचिकाकर्ता डॉ. चंद्रशेखर मदनलाल गट्टानी की जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की गई थी। याचिकाकर्ता ने बॉम्बे हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर इस अधिग्रहण को चुनौती दी थी।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि जमीन अधिग्रहण संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 300A के साथ-साथ Right to Fair Compensation and Transparency in Land Acquisition, Rehabilitation and Resettlement Act, 2013 के प्रावधानों का उल्लंघन करता है।
कोर्ट ने क्यों माना ‘पब्लिक पर्पज’?
राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि प्रस्तावित म्यूरल केवल सजावटी निर्माण नहीं है। इसमें डॉ. अंबेडकर के जीवन और उनके विचारों को प्रदर्शित किया जाएगा, जिससे वर्तमान और आने वाली पीढ़ियों को उनके योगदान और विचारधारा को समझने का अवसर मिलेगा। जस्टिस अनिल एस. किलोर और जस्टिस राज डी. वाकोडे की डिवीजन बेंच ने इस तर्क को स्वीकार करते हुए कहा कि महान नेताओं, विचारकों, सुधारकों और दार्शनिकों के विचार समाज को लंबे समय तक दिशा दे सकते हैं। ऐसे विचारों को संरक्षित करना और लोगों तक पहुंचाना सामाजिक हित से जुड़ा कार्य है। कोर्ट ने माना कि डॉ. अंबेडकर का म्यूरल केवल मौजूदा प्रतिमा में सौंदर्यात्मक मूल्य जोड़ने वाला निर्माण नहीं होगा। यह सार्वजनिक स्थान पर उनके विचारों को स्थायी रूप से प्रसारित करने और वर्तमान तथा भविष्य की पीढ़ियों को प्रेरणा देने का माध्यम बनेगा। इसी आधार पर कोर्ट ने इसे ‘पब्लिक पर्पज’ की आवश्यक शर्त पूरी करने वाला माना।
अधिग्रहण कानून के विवाद पर भी फैसला
मामले में 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून में अध्यादेश के जरिए जोड़े गए Section 10A के प्रभाव और उसके बाद अध्यादेश के समाप्त होने से जुड़े सवाल भी उठे। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में जमीन सार्वजनिक उद्देश्य के लिए अधिग्रहित की जा रही थी और अधिकार, दायित्व या देनदारियां केवल अध्यादेश के समाप्त होने के कारण खत्म नहीं होंगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि 2013 के कानून में ऐसी कोई स्थिति मौजूद नहीं थी जिसके आधार पर अधिग्रहण की कार्यवाही अपने आप समाप्त मानी जाए। याचिका हुई खारिज बेंच ने अंततः डॉ. चंद्रशेखर एस. मदनलाल गट्टानी बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में याचिका खारिज कर दी। मामला Writ Petition No. 3488 of 2016 था। उपलब्ध न्यायिक रिकॉर्ड के अनुसार मामले में सुनवाई पूरी होने के बाद निर्णय 13 जुलाई 2026 को सुनाया गया।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
इस फैसले में हाईकोर्ट ने ‘पब्लिक पर्पज’ की अवधारणा को केवल सड़क, इमारत या पारंपरिक सार्वजनिक ढांचे तक सीमित नहीं माना। कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक संदेश यह है कि किसी महान राष्ट्रीय नेता के विचारों, इतिहास और सामाजिक योगदान को सार्वजनिक रूप से संरक्षित और प्रदर्शित करने वाला प्रोजेक्ट भी व्यापक जनहित से जुड़ा हो सकता है।
