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अदालत की रोक के बावजूद ‘खादी महोत्सव’, बॉम्बे हाईकोर्ट ने माना आदेश का उल्लंघन; ₹2.5 लाख की litigation costs
‘KHADI’ नाम और KVIC के ट्रेडमार्क/चरखा लोगो के इस्तेमाल से जुड़े विवाद में बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला ट्रेडमार्क के साथ-साथ अदालत के अंतरिम आदेशों के पालन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने ‘Khadi Mahotsav 2.0’ से जुड़े मामले में 2022 के injunction के उल्लंघन को स्वीकार करते हुए ₹2.5 लाख की litigation costs का आदेश दिया। साथ ही अदालत ने Order XXXIX Rule 2A CPC के तहत उपलब्ध कठोर उपायों—जैसे संपत्ति कुर्की या सिविल जेल—को इस मामले में आवश्यक नहीं माना।

मुंबई:
‘खादी’ नाम और खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) से जुड़े ट्रेडमार्क और चरखे के लोगो के इस्तेमाल को लेकर चल रहे विवाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण आदेश दिया है। अदालत ने मुंबई खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (MKVIA) के खिलाफ अदालत के पहले के अंतरिम आदेश के उल्लंघन से जुड़े मामले में ₹2.5 लाख की मुकदमेबाजी लागत (litigation costs) लगाने का निर्देश दिया है। विवाद मई 2023 में आयोजित ‘Khadi Mahotsav 2.0’ से जुड़ा है। महत्वपूर्ण बात यह है कि राशि को सामान्य अर्थ में ‘जुर्माना’ कहना पूरी तरह सटीक नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार यह litigation costs हैं। साथ ही, इस मामले में अदालत ने ट्रस्टियों को सिविल जेल भेजने या संपत्ति कुर्क करने जैसी कठोर कार्रवाई नहीं की।
क्या है पूरा मामला?
मामला खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) और मुंबई खादी एंड विलेज इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (MKVIA) के बीच ‘KHADI’ नाम, KVIC के पंजीकृत ट्रेडमार्क और चरखे वाले लोगो के इस्तेमाल से जुड़े विवाद का है। KVIC का आरोप था कि MKVIA द्वारा ऐसे नाम और चिन्हों का इस्तेमाल किया जा रहा था, जिनके इस्तेमाल को लेकर अदालत पहले ही अंतरिम रोक लगा चुकी थी। इसी विवाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने दिसंबर 2022 में MKVIA के खिलाफ अंतरिम निषेधाज्ञा (injunction) जारी की थी। इसके बाद KVIC ने आरोप लगाया कि अदालत की रोक के बावजूद उससे संबंधित गतिविधियां जारी रहीं।
‘Khadi Mahotsav 2.0’ बना विवाद की वजह
मामले में मई 2023 में आयोजित ‘Khadi Mahotsav 2.0’ का विशेष महत्व है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह आयोजन 5 से 7 मई 2023 के बीच मुंबई में हुआ था और इससे Atharva Foundation तथा Atharva School of Fashion and Arts का नाम जुड़ा था। KVIC ने अदालत में इस आयोजन को 2022 में जारी अंतरिम आदेश के उल्लंघन से जोड़ते हुए कार्रवाई की मांग की। अदालत के सामने यह सवाल था कि क्या आयोजन और MKVIA के बीच इतना संबंध था कि इसे पहले के injunction का उल्लंघन माना जा सके।
कोर्ट ने MKVIA की दलील को क्यों नहीं माना?
MKVIA की ओर से आयोजन से अपनी भूमिका को लेकर बचाव किया गया। लेकिन अदालत ने उपलब्ध सामग्री को देखते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि आयोजन और MKVIA के बीच पर्याप्त संबंध था। अदालत ने इसी आधार पर पहले जारी अंतरिम आदेश के उल्लंघन को स्वीकार किया और लागत लगाने का आदेश दिया।
कोर्ट ने ट्रस्टियों को जेल क्यों नहीं भेजा?
यह आदेश का महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है।
अदालत के सामने Order XXXIX Rule 2A, CPC के तहत अंतरिम आदेश के कथित उल्लंघन पर कार्रवाई का सवाल था। इस प्रावधान के तहत अदालत के पास injunction के उल्लंघन की स्थिति में संपत्ति की attachment और civil prison जैसे कदम उठाने की शक्ति होती है। लेकिन इन शक्तियों का इस्तेमाल हर मामले में स्वतः नहीं होता। इस मामले में अदालत ने उपलब्ध परिस्थितियों को देखते हुए ₹2.5 लाख की litigation costs लगाना पर्याप्त माना और ट्रस्टियों को सिविल जेल भेजने अथवा संपत्ति कुर्क करने की मांग को स्वीकार नहीं किया।
Order XXXIX Rule 2A का महत्व
इस मामले का कानूनी महत्व केवल ‘खादी’ ट्रेडमार्क विवाद तक सीमित नहीं है। Order XXXIX Rule 2A CPC अदालत के injunction के उल्लंघन से संबंधित है। ऐसे मामलों में अदालत यह देखती है कि पहले कोई स्पष्ट निषेधाज्ञा थी या नहीं और संबंधित पक्ष ने उस आदेश का उल्लंघन किया या नहीं। इस मामले में हाईकोर्ट ने उल्लंघन को गंभीरता से लिया, लेकिन उपलब्ध परिस्थितियों में सबसे कठोर कार्रवाई को जरूरी नहीं माना।
Contempt और injunction violation में अंतर
यहां एक और महत्वपूर्ण कानूनी बात समझना जरूरी है। Order XXXIX Rule 2A CPC के तहत injunction violation की कार्यवाही और Contempt of Courts Act, 1971 के तहत contempt proceedings को पूरी तरह एक जैसा नहीं माना जा सकता। इसलिए अदालत के अंतरिम आदेश के उल्लंघन से जुड़ी हर कार्रवाई को स्वतः आपराधिक contempt की तरह पेश करना सही नहीं होगा।
2025 के दस्तावेजों का मुद्दा भी उठा
मामले की कार्यवाही में बाद के दस्तावेजों और गतिविधियों को लेकर भी KVIC की ओर से आपत्तियां उठाई गईं। इनमें MKVIA के नाम के इस्तेमाल से जुड़ा एक property sale agreement भी शामिल था। लेकिन किसी संस्था के अपने कानूनी नाम का इस्तेमाल और ‘KHADI’ ट्रेडमार्क का व्यावसायिक प्रचार के लिए इस्तेमाल—दोनों को एक ही अर्थ में नहीं देखा जा सकता। इसलिए अदालत ने injunction की सीमा को उसके मूल दायरे से आगे बढ़ाने से परहेज किया।
ऑनलाइन listings को लेकर भी विवाद
मामले में कुछ third-party वेबसाइटों और online business listings का मुद्दा भी सामने आया। लेकिन किसी पुराने online listing के मौजूद होने मात्र से यह निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है कि संबंधित संस्था ने अदालत की रोक के बाद स्वयं उसका इस्तेमाल या प्रकाशन कराया। ऐसे मामलों में यह देखना जरूरी होता है कि listing कब बनाई गई, किसने बनाई और क्या वह injunction के बाद की गतिविधि थी।
ट्रस्टियों की व्यक्तिगत जिम्मेदारी भी सवालों में
मामले में trustees और office-bearers की भूमिका को लेकर भी सवाल उठा। किसी संस्था का trustee या पदाधिकारी होना अपने आप में हर व्यक्ति को अदालत के आदेश के उल्लंघन के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं बना देता। किसी व्यक्ति के खिलाफ व्यक्तिगत कार्रवाई के लिए उसकी भूमिका और कथित उल्लंघन से उसका सीधा संबंध देखना जरूरी होता है।
2022 का अंतरिम आदेश क्यों था अहम?
इस पूरे विवाद की जड़ दिसंबर 2022 के अंतरिम आदेश में है। उसी आदेश के कारण बाद की गतिविधियों को लेकर यह सवाल उठा कि क्या MKVIA या उससे जुड़ी गतिविधियों ने अदालत की रोक की सीमा का उल्लंघन किया। इसलिए 2023 के ‘Khadi Mahotsav 2.0’ को समझने के लिए 2022 के injunction को समझना जरूरी है।
KVIC क्या है?
खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग यानी KVIC, Khadi and Village Industries Commission Act, 1956 के तहत गठित एक वैधानिक संस्था है और यह सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्रालय (MSME) के अधीन काम करती है। इसका प्रमुख उद्देश्य खादी और ग्रामोद्योग को बढ़ावा देना तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करना है। इसी वजह से ‘KHADI’ नाम और उससे जुड़े ट्रेडमार्क का इस्तेमाल KVIC के लिए केवल ब्रांडिंग का मामला नहीं बल्कि खादी उत्पादों की पहचान और प्रमाणिकता से भी जुड़ा विषय है।
फैसले का व्यापक असर
बॉम्बे हाईकोर्ट का यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक ओर अदालत के अंतरिम आदेश की अनदेखी को गंभीरता से लिया गया, वहीं दूसरी ओर injunction violation के मामलों में attachment या civil imprisonment को स्वतः लागू होने वाली कार्रवाई नहीं माना गया। इस मामले में अदालत ने ₹2.5 लाख की litigation costs लगाकर आदेश के उल्लंघन को लेकर जवाबदेही तय की, लेकिन उससे आगे की कठोर कार्रवाई को परिस्थितियों के आधार पर आवश्यक नहीं माना। यानी इस मामले का संदेश साफ है—अदालत के injunction का पालन करना जरूरी है, लेकिन उसके उल्लंघन पर कार्रवाई का स्वरूप मामले की परिस्थितियों और compliance की स्थिति को देखकर तय किया जाएगा।
‘खादी’ नाम और चरखे के लोगो से जुड़ा यह विवाद अब सिर्फ ट्रेडमार्क के इस्तेमाल का मामला नहीं रह गया है। बॉम्बे हाईकोर्ट के सामने यह सवाल भी आया कि अदालत द्वारा लगाए गए अंतरिम प्रतिबंध का उल्लंघन होने पर किस तरह की कार्रवाई की जानी चाहिए।
‘Khadi Mahotsav 2.0’ से जुड़े विवाद में अदालत ने उल्लंघन को स्वीकार करते हुए ₹2.5 लाख की litigation costs का आदेश दिया, लेकिन ट्रस्टियों को सिविल जेल भेजने और संपत्ति कुर्क करने जैसी कठोर कार्रवाई नहीं की। यही इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण कानूनी पहलू है। वहीं, उपलब्ध केस रिकॉर्ड यह भी दिखाता है कि इस मुकदमे में 2026 के दौरान अलग-अलग तारीखों पर अलग-अलग आदेश पारित हुए हैं। इसलिए प्रकाशित खबर में किसी पुराने आदेश की Bench को हालिया लागत वाले आदेश की Bench के रूप में पेश करने से बचना चाहिए।
