एनर्जी ड्रिंक्स पर बैन की मांग: सेहत के लिए बड़ा खतरा!
पुणे के शशिकांत हरिसंगम द्वारा उठाए गए गंभीर मुद्दे के अनुसार, स्कूलों के आसपास हानिकारक एनर्जी ड्रिंक्स की धड़ल्ले से हो रही बिक्री चिंता का बड़ा कारण बन चुकी है। बच्चे बिना किसी ज़रूरत के सिर्फ 'फैशन' और 'दिखावे' के लिए इनका सेवन कर रहे हैं। हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) द्वारा देश के प्रमुख एनर्जी ड्रिंक ब्रांड्स (जैसे रेड बुल, मॉन्स्टर, स्टिंग आदि) को भ्रामक विज्ञापनों और गलत ब्रांडिंग के लिए नोटिस जारी किया गया है। इन पेय पदार्थों में कैफीन और चीनी की अत्यधिक मात्रा होती है, जो बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास के लिए बेहद घातक है। डॉक्टरों और विशेषज्ञों का मानना है कि केवल स्कूलों में ही नहीं, बल्कि इनके भ्रामक प्रचार और खुलेआम बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगना चाहिए।
पुणे/मुंबई: हाल ही में पुणे के एक जागरूक नागरिक, शशिकांत हरिसंगम ने समाचार पत्र के माध्यम से एक बेहद गंभीर और संवेदनशील विषय पर प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि स्कूलों के आसपास धड़ल्ले से बिकने वाले एनर्जी ड्रिंक्स बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। बच्चे इसे किसी जरूरत के तहत नहीं, बल्कि केवल 'ट्रेंड' या 'फैशन' के रूप में अपना रहे हैं। भले ही इन बोतलों पर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होने की वैधानिक चेतावनी लिखी होती है, लेकिन केवल स्कूल परिसरों में प्रतिबंध लगाना काफी नहीं है; सरकार को इनके हानिकारक अवयवों और विपणन (marketing) के तरीकों को देखते हुए सख्त से सख्त कदम उठाने की जरूरत है।
यह मुद्दा इसलिए भी गंभीर हो गया है क्योंकि हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने देश के 6 बड़े एनर्जी ड्रिंक ब्रांड्स—जिनमें रेड बुल, मॉन्स्टर, स्टिंग, कैंपा एनर्जी गोल्ड बूस्ट, एड्रेनालाईन रश और हेल एनर्जी शामिल हैं—को नियमों के उल्लंघन और भ्रामक दावों के लिए कारण बताओ नोटिस जारी किया है। FSSAI का स्पष्ट कहना है कि भारतीय खाद्य मानकों में आधिकारिक तौर पर 'एनर्जी ड्रिंक' जैसी कोई श्रेणी नहीं है और कंपनियां अपने मनमाने दावों से युवाओं को गुमराह कर रही हैं। इसके साथ ही, राजस्थान जैसे राज्यों में खाद्य सुरक्षा विभाग ने कार्रवाई करते हुए 5 लाख से अधिक भ्रामक एनर्जी ड्रिंक्स के केन को जब्त भी किया है।
क्या हैं एनर्जी ड्रिंक्स और यह चलन क्यों बढ़ रहा है?
एनर्जी ड्रिंक्स असल में ऐसे गैर-अल्कोहलिक पेय पदार्थ हैं जिनमें भारी मात्रा में कैफीन, रिफाइंड चीनी, और अन्य उत्तेजक पदार्थ जैसे टॉरिन (Taurine), गुआराना (Guarana) और एल-कार्निटाइन शामिल होते हैं।
यह चलन क्यों बढ़ रहा है?
आक्रामक और भ्रामक विज्ञापन: कंपनियां इन ड्रिंक्स को "दिमाग और शरीर को ऊर्जा देने वाला", "एकाग्रता बढ़ाने वाला" और "थकान मिटाने वाला" बताकर प्रमोट करती हैं।
फैशन और सोशल स्टेटस: युवाओं और स्कूली बच्चों में इसे पीना एक कूल या ट्रेंडी लाइफस्टाइल का हिस्सा मान लिया गया है।
आसान उपलब्धता: स्कूलों, कॉलेजों और स्पोर्ट्स क्लबों के ठीक बाहर दुकानों पर ये ड्रिंक्स बहुत कम दामों और आकर्षक पैकिंग में आसानी से मिल जाते हैं।
यह बच्चों के लिए क्यों हानिकारक हैं? क्यों न करें सेवन?
चिकित्सकों और वैज्ञानिकों के अनुसार, विकसित हो रहे बच्चों और किशोरों के शरीर के लिए ये पेय एक "धीमे जहर" की तरह काम करते हैं। इसके हानिकारक प्रभावों को नीचे दिए गए बिंदुओं से समझा जा सकता है:
कैफीन का ओवरडोज (Caffeine Overload): अकादमी ऑफ पीडियाट्रिक्स (AAP) के अनुसार, 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को कैफीन से पूरी तरह बचना चाहिए। एक सामान्य कॉफी में जहाँ 80-100 मिलीग्राम कैफीन होता है, वहीं कुछ एनर्जी ड्रिंक्स में यह मात्रा 160 से 300 मिलीग्राम तक होती है। इतनी भारी मात्रा बच्चों में घबराहट, अनिद्रा (insomnia), चिड़चिड़ापन, और उच्च रक्तचाप (high blood pressure) का कारण बनती है। गंभीर मामलों में इससे दिल की धड़कन का अनियमित होना (arrhythmia) और दिल का दौरा पड़ने जैसी घटनाएं भी सामने आई हैं।
अत्यधिक चीनी की मात्रा: एक सामान्य एनर्जी ड्रिंक में लगभग 50 से 60 ग्राम तक चीनी होती है, जो कि एक बच्चे की दैनिक सीमा (अधिकतम 25 ग्राम) से दोगुनी है। यह अचानक से ब्लड शुगर बढ़ाती है, जिससे थोड़ी देर के लिए तो ऊर्जा महसूस होती है लेकिन तुरंत बाद शरीर में भारी थकान (sugar crash) होने लगती है। लंबे समय में यह मोटापा, टाइप-2 मधुमेह और दांतों की सड़न को जन्म देती है।
मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा असर: कैफीन के आदी होने के बाद जब बच्चे इसे नहीं पीते, तो उन्हें सिरदर्द, ध्यान केंद्रित न कर पाना और गंभीर एंग्जायटी का सामना करना पड़ता है। इससे उनके स्वभाव में आक्रामकता और मूड स्विंग्स भी देखे गए हैं।
अंगों पर गहरा प्रभाव: वैज्ञानिक समीक्षाओं से पता चला है कि इन ड्रिंक्स के अत्यधिक सेवन से किडनी की गंभीर क्षति (acute kidney injury), मांसपेशियों का गलना (rhabdomyolysis) और पेट में एसिडिटी/गैस्ट्राइटिस जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
डॉक्टरों और विशेषज्ञों की सलाह
चिकित्सक और बाल रोग विशेषज्ञ माता-पिता और शिक्षकों से अपील करते हैं कि बच्चों को इन कृत्रिम पेय पदार्थों से दूर रखें।
1. स्वस्थ विकल्पों को बढ़ावा दें:बच्चों को एनर्जी ड्रिंक के बजाय नींबू पानी, नारियल पानी, छाछ, ताजे फलों का जूस या साधारण पानी पीने की आदत डालें।
2. सच्चाई से अवगत कराएं: बच्चों को डिब्बों के पीछे लिखे न्यूट्रिशन लेबल पढ़ना सिखाएं ताकि वे जान सकें कि वे असल में क्या पी रहे हैं।
3. पर्याप्त नींद और अच्छा पोषण: असली ऊर्जा डिब्बे से नहीं, बल्कि 8-10 घंटे की गहरी नींद और संतुलित आहार से आती है।
शशिकांत जी की यह मांग शत-प्रतिशत सही है कि केवल चेतावनी छापने से जिम्मेदारी खत्म नहीं होती। जब तक सरकार इन नुकसानदेह पेय पदार्थों के भ्रामक प्रचार और स्कूलों के पास इनकी बिक्री पर कानूनी रूप से कड़ा प्रतिबंध नहीं लगाती, तब तक हमारी युवा पीढ़ी का स्वास्थ्य खतरे में रहेगा।