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ऑनलाइन दुनिया में बच्चों की सुरक्षा पर सरकार का फोकस, साइबरबुलिंग से डेटा प्राइवेसी तक कड़े कदम

डिजिटल तकनीक आज बच्चों की पढ़ाई, जानकारी हासिल करने और विभिन्न ऑनलाइन सेवाओं तक पहुंच का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुकी है। हालांकि, इंटरनेट और डिजिटल उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल के साथ बच्चों के सामने साइबरबुलिंग, ऑनलाइन दुर्व्यवहार, अश्लील या हानिकारक सामग्री, निजता का उल्लंघन, अत्यधिक स्क्रीन टाइम और डिजिटल निर्भरता जैसी गंभीर चुनौतियां भी सामने आ रही हैं। इन जोखिमों को देखते हुए केंद्र सरकार ने कहा है कि वह बच्चों को डिजिटल तकनीकों का लाभ दिलाने के साथ-साथ उन्हें ऑनलाइन नुकसान से बचाने के लिए व्यापक कानूनी और नियामक व्यवस्था लागू कर रही है।

Vindhya Dubey12 अग. 2026, 08:34 PM IST
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ऑनलाइन दुनिया में बच्चों की सुरक्षा पर सरकार का फोकस, साइबरबुलिंग से डेटा प्राइवेसी तक कड़े कदम

सरकार का कहना है कि उसका उद्देश्य बच्चों को डिजिटल दुनिया से दूर करना नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित और जिम्मेदार डिजिटल वातावरण उपलब्ध कराना है। इसके लिए सूचना प्रौद्योगिकी कानून, डेटा संरक्षण कानून, साइबर अपराध से निपटने के लिए संस्थागत व्यवस्था, स्कूलों में साइबर सुरक्षा जागरूकता और बच्चों तथा अभिभावकों के लिए सुरक्षा दिशानिर्देशों पर काम किया जा रहा है।


डिजिटल तकनीक बच्चों के लिए अवसर और चुनौती दोनों

सरकार के अनुसार, उभरती हुई डिजिटल तकनीक बच्चों के लिए शिक्षा और सूचना तक पहुंच को आसान बनाने में परिवर्तनकारी भूमिका निभा सकती है। ऑनलाइन क्लास, डिजिटल शिक्षण सामग्री, ई-लाइब्रेरी, शैक्षणिक प्लेटफॉर्म और विभिन्न सरकारी एवं सार्वजनिक सेवाओं ने बच्चों के सीखने के अवसरों का विस्तार किया है। लेकिन डिजिटल दुनिया में बच्चों की कम उम्र और सीमित डिजिटल समझ उन्हें कई तरह के जोखिमों के प्रति संवेदनशील बना सकती है। इंटरनेट पर मौजूद अनुचित या हानिकारक सामग्री, साइबरबुलिंग, ऑनलाइन उत्पीड़न, धोखाधड़ी, पहचान और निजी जानकारी का दुरुपयोग तथा सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल बच्चों के लिए चुनौती बन सकते हैं। इसी वजह से सरकार ने बच्चों की डिजिटल सुरक्षा को केवल साइबर अपराध के मुद्दे तक सीमित न रखते हुए डेटा प्राइवेसी, ऑनलाइन व्यवहार, स्कूल सुरक्षा और डिजिटल शिक्षा से भी जोड़ा है।


IT Act और इंटरमीडियरी नियमों के तहत सुरक्षा

भारत में ऑनलाइन गतिविधियों को नियंत्रित करने वाले प्रमुख कानूनी ढांचे में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और सूचना प्रौद्योगिकी इंटरमीडियरी गाइडलाइंस तथा डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड नियम, 2021 शामिल हैं। इन नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और अन्य ऑनलाइन इंटरमीडियरी को निर्धारित due diligence का पालन करना होता है। नियमों में ऐसी गैरकानूनी सामग्री को होस्ट या प्रसारित करने से रोकने के प्रावधान हैं, जिसमें अश्लील सामग्री, पोर्नोग्राफिक सामग्री, निजता का उल्लंघन करने वाली सामग्री, बच्चों के लिए हानिकारक सामग्री, हिंसा या घृणा को बढ़ावा देने वाली सामग्री और सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करने वाली सामग्री शामिल है। इस व्यवस्था का उद्देश्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म को अधिक जवाबदेह बनाना और उपयोगकर्ताओं के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करना है।


बच्चों के व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा पर विशेष ध्यान

बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा उनके व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा है। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 में बच्चों के व्यक्तिगत डेटा को लेकर विशेष प्रावधान किए गए हैं। कानून के तहत बच्चे के व्यक्तिगत डेटा को प्रोसेस करने से पहले माता-पिता या कानूनी अभिभावक की सत्यापन योग्य सहमति लेने का प्रावधान है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बच्चों के डेटा का इस्तेमाल उनकी जानकारी और अभिभावकीय निगरानी के बिना न किया जाए। इसके अलावा बच्चों से संबंधित डेटा के इस्तेमाल में कुछ विशेष गतिविधियों पर रोक का प्रावधान है। इनमें बच्चों की ट्रैकिंग, उनके व्यवहार की निगरानी और बच्चों को लक्षित विज्ञापन दिखाने जैसी गतिविधियां शामिल हैं।

DPDP Rules में सहमति की प्रक्रिया को लागू करने के लिए आयु और पहचान सत्यापन तथा वर्चुअल टोकन जैसे उपायों का प्रावधान किया गया है। इसके साथ ही अभिभावक को दी गई सहमति वापस लेने का अधिकार भी उपलब्ध है। सहमति वापस लिए जाने की स्थिति में डेटा फिड्यूशियरी को कानून के प्रावधानों के अनुसार संबंधित व्यक्तिगत डेटा को हटाने की जिम्मेदारी निभानी होती है।


I4C के जरिए साइबर अपराधों पर कार्रवाई

बच्चों को ऑनलाइन अपराधों से बचाने के लिए गृह मंत्रालय ने इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर यानी I4C की स्थापना की है। इसका उद्देश्य देश में साइबर अपराधों से निपटने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय और एक व्यापक तंत्र तैयार करना है। राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल cybercrime.gov.in के माध्यम से नागरिक साइबर अपराधों की शिकायत दर्ज करा सकते हैं। पोर्टल पर बच्चों के खिलाफ होने वाले साइबर अपराधों को भी विशेष महत्व दिया गया है। सरकार ने साइबर अपराधों से निपटने के लिए कई स्तरों पर काम किया है। इसमें आम लोगों के बीच साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाना, समय-समय पर अलर्ट और एडवाइजरी जारी करना, पुलिस और अन्य कानून प्रवर्तन अधिकारियों को प्रशिक्षण देना, अभियोजकों तथा न्यायिक अधिकारियों की क्षमता बढ़ाना और साइबर फोरेंसिक सुविधाओं को मजबूत करना शामिल है।


NCPCR ने तैयार किए ऑनलाइन सुरक्षा संसाधन

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग यानी NCPCR बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर जागरूकता और क्षमता निर्माण की दिशा में भी काम कर रहा है। आयोग ने बच्चों, अभिभावकों, शिक्षकों और आम जनता के लिए ‘Being Safe Online’ नाम से दिशानिर्देश तैयार किए हैं। इनका उद्देश्य बच्चों को इंटरनेट का सुरक्षित और जिम्मेदार तरीके से इस्तेमाल करने के बारे में जानकारी देना है। NCPCR ने स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा को लेकर तैयार किए गए Manual on Safety and Security of Children in Schools में साइबरबुलिंग की रोकथाम से संबंधित दिशा-निर्देश भी शामिल किए हैं। इसके अलावा वर्ष 2024 में स्कूली बच्चों के लिए साइबरबुलिंग रोकने संबंधी दिशानिर्देश जारी किए गए। इनमें ऑनलाइन सुरक्षा, शिकायत दर्ज कराने की व्यवस्था, रोकथाम के उपाय और जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार से संबंधित जानकारी दी गई है।


राज्य और जिला स्तर पर साइबर सुरक्षा जागरूकता

सरकार के अनुसार, NCPCR ने 2025-26 के दौरान देश के विभिन्न राज्यों और जिलों में बाल अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर सम्मेलन आयोजित किए। इन कार्यक्रमों में स्कूल सुरक्षा और साइबर सुरक्षा को भी महत्वपूर्ण विषय के रूप में शामिल किया गया। स्कूल प्रशासकों और शिक्षकों के लिए क्षमता निर्माण कार्यक्रमों के जरिए बाल संरक्षण कानूनों और सुरक्षा उपायों की जानकारी दी गई। इसके साथ ही आयोग की ओर से स्कूल सुरक्षा और बाल सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर वर्चुअल जिला कार्यशालाएं भी आयोजित की जा रही हैं। बच्चों के मोबाइल फोन और इंटरनेट से जुड़े उपकरणों के इस्तेमाल के प्रभावों को समझने के लिए NCPCR ने वर्ष 2021 में राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन कराया था। इस अध्ययन का उद्देश्य मोबाइल फोन और इंटरनेट सुविधा वाले अन्य डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल से बच्चों पर पड़ने वाले शारीरिक, व्यवहारिक और मनोसामाजिक प्रभावों को समझना था। यह अध्ययन देश के विभिन्न क्षेत्रों को शामिल करते हुए किया गया था। इसमें छह राज्यों के 60 स्कूलों से कुल 5,811 प्रतिभागियों की प्रतिक्रियाएं जुटाई गईं। इनमें 3,491 स्कूली बच्चे, 1,534 अभिभावक और 786 शिक्षक शामिल थे। अध्ययन ने बच्चों के डिजिटल उपकरणों के इस्तेमाल को अलग-अलग आयामों से समझने का प्रयास किया।


PRAGYATA Guidelines से सुरक्षित डिजिटल शिक्षा पर जोर

शिक्षा मंत्रालय ने जुलाई 2020 में PRAGYATA Guidelines on Digital Education जारी की थीं। इन दिशानिर्देशों का उद्देश्य ऑनलाइन शिक्षा को सुरक्षित, प्रभावी और विद्यार्थियों के हित में बनाना था। दिशानिर्देशों में डिजिटल शिक्षा के दौरान विद्यार्थियों के कल्याण, डिजिटल उपकरणों के जिम्मेदार इस्तेमाल और सोशल मीडिया के सुरक्षित उपयोग जैसे पहलुओं पर जोर दिया गया है। कोविड-19 महामारी के दौरान ऑनलाइन शिक्षा के विस्तार के बीच डिजिटल उपकरण बच्चों की पढ़ाई का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गए थे। ऐसे में डिजिटल शिक्षा के साथ बच्चों की सुरक्षा और कल्याण को जोड़ना भी जरूरी माना गया। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी CBSE ने भी स्कूलों में डिजिटल सुरक्षा और जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कदम उठाए हैं। इनमें डिजिटल एटिकेट से जुड़े दिशानिर्देश, शिक्षकों के लिए साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण, Cyber Security Handbook और स्कूलों में Cyber Clubs स्थापित करने संबंधी एडवाइजरी शामिल हैं।


Cyber Clubs का उद्देश्य विद्यार्थियों के बीच साइबर सुरक्षा को लेकर जागरूकता बढ़ाना और उन्हें सुरक्षित डिजिटल व्यवहार के बारे में जानकारी देना है। NCERT ने भी साइबर सुरक्षा और डिजिटल सुरक्षा को शिक्षा से जोड़ते हुए पाठ्यक्रम और संसाधन सामग्री विकसित की है। इसका उद्देश्य बच्चों को इंटरनेट का इस्तेमाल करते समय संभावित जोखिमों को समझने और जिम्मेदार ऑनलाइन व्यवहार अपनाने के लिए तैयार करना है।


ऑनलाइन सुरक्षा में अभिभावकों की भूमिका भी अहम

बच्चों की डिजिटल सुरक्षा केवल सरकारी कानूनों और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी नहीं है। इसमें अभिभावकों और शिक्षकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बच्चों को इंटरनेट का इस्तेमाल करते समय निजी जानकारी साझा न करने, अनजान लोगों से ऑनलाइन संपर्क में सावधानी बरतने, संदिग्ध लिंक से बचने, साइबरबुलिंग की स्थिति में शिकायत करने और अनुचित सामग्री सामने आने पर किसी भरोसेमंद वयस्क को जानकारी देने के बारे में जागरूक करना जरूरी है। इसी तरह बच्चों के स्क्रीन टाइम और डिजिटल गतिविधियों पर संतुलित निगरानी भी महत्वपूर्ण है। सरकार की ओर से तैयार दिशानिर्देशों और जागरूकता सामग्री का उद्देश्य बच्चों, अभिभावकों और शिक्षकों को इन चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक जानकारी उपलब्ध कराना है।


केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया है कि डिजिटल तकनीक बच्चों के विकास और शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण अवसर उपलब्ध करा सकती है, लेकिन इसके साथ जुड़े जोखिमों से सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है। कानूनी प्रावधानों, डेटा संरक्षण व्यवस्था, साइबर अपराध नियंत्रण तंत्र, NCPCR की जागरूकता पहल और शिक्षा क्षेत्र में डिजिटल सुरक्षा संबंधी कार्यक्रमों के जरिए सरकार बच्चों के लिए अधिक सुरक्षित डिजिटल वातावरण तैयार करने पर जोर दे रही है। सरकार का व्यापक दृष्टिकोण यह है कि बच्चे डिजिटल तकनीक से मिलने वाले शिक्षा और जानकारी के लाभों से वंचित न रहें, लेकिन इंटरनेट की दुनिया में उन्हें साइबर अपराध, ऑनलाइन शोषण, हानिकारक सामग्री, डेटा के दुरुपयोग और अन्य डिजिटल खतरों से पर्याप्त सुरक्षा भी मिले।