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‘गेरुआ गुंडागर्दी’ पर पत्रकारों को तुरंत राहत नहीं, कलकत्ता हाईकोर्ट ने कहा- FIR रद्द कराने की याचिका नियमित प्रक्रिया से आएगी
जादवपुर यूनिवर्सिटी हिंसा की रिपोर्टिंग में ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ शब्द लिखना Anandabazar Patrika के पत्रकारों के लिए कानूनी मुसीबत बन गया। FIR के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंचे पत्रकारों ने तत्काल राहत मांगी, लेकिन कलकत्ता हाईकोर्ट ने फिलहाल स्पेशल सुनवाई से इनकार कर दिया।

कोलकाता:
जादवपुर यूनिवर्सिटी में हुई हिंसा की रिपोर्टिंग के दौरान ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ यानी ‘Gerua Gundagiri’ शब्द का इस्तेमाल Anandabazar Patrika के पत्रकारों को भारी पड़ गया है। इस शब्द को लेकर दर्ज FIR के खिलाफ पत्रकारों ने कलकत्ता हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन 2 सितंबर 2026 को अदालत ने मामले की तत्काल सुनवाई से इनकार कर दिया। जस्टिस सौगत भट्टाचार्य के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता एस.एन. मुखर्जी ने तत्काल हस्तक्षेप की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि FIR रद्द कराने के लिए याचिका नियमित प्रक्रिया के तहत दाखिल की जाए और मामले को लागू प्रक्रिया के अनुसार सूचीबद्ध किया जाएगा।
क्या है पूरा विवाद?
मामला जादवपुर यूनिवर्सिटी में छात्रों के बीच हुई हिंसा से जुड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय परिसर में ABVP और FETSU से जुड़े छात्रों के बीच कथित झड़प और हिंसा हुई थी। इसी घटना की रिपोर्टिंग करते हुए Anandabazar Patrika में ‘गेरुआ गुंडागर्दी’ शब्द का इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट में इस्तेमाल इस शब्द पर आपत्ति जताते हुए पत्रकारों और अखबार से जुड़े लोगों के खिलाफ पुलिस में शिकायत की गई। इसके बाद FIR दर्ज की गई। आरोप लगाया गया कि इस तरह की भाषा से साम्प्रदायिक भावनाएं भड़क सकती हैं और समाज में तनाव पैदा हो सकता है।
हाईकोर्ट में क्या हुआ?
बुधवार को वरिष्ठ अधिवक्ता एस.एन. मुखर्जी ने जस्टिस सौगत भट्टाचार्य के सामने मामले का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पत्रकारों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए हैं और इस वजह से मामले में तत्काल न्यायिक हस्तक्षेप जरूरी है। वकील ने अदालत को बताया कि पत्रकारों पर साम्प्रदायिक भावनाएं भड़काने का आरोप लगाया गया है और तीन घटनाएं सामने आ चुकी हैं। उन्होंने तत्काल राहत और सुनवाई की मांग की। अदालत ने संकेत दिया कि उचित कानूनी रास्ता FIR को रद्द कराने के लिए याचिका दाखिल करना है। जब वकील ने स्पष्ट किया कि वह FIR quashing की मांग कर रहे हैं, तो अदालत ने कहा कि याचिका नियमित प्रक्रिया के तहत दाखिल की जाए। कोर्ट ने मामले को विशेष रूप से तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया।
क्या पत्रकारों को FIR से राहत मिल गई?
नहीं। यह समझना बेहद जरूरी है कि हाईकोर्ट ने फिलहाल FIR को रद्द नहीं किया है और न ही पत्रकारों को कोई अंतिम राहत दी है। अदालत ने केवल तत्काल विशेष सुनवाई से इनकार करते हुए नियमित प्रक्रिया अपनाने को कहा है। इसलिए अभी यह कहना सही नहीं होगा कि हाईकोर्ट ने FIR को सही ठहरा दिया है। FIR की वैधता और उसमें लगाए गए आरोपों पर अदालत बाद की सुनवाई में विचार कर सकती है।
प्रेस की आजादी पर भी उठे सवाल
मामले के बाद पत्रकार संगठनों ने कार्रवाई पर चिंता जताई है। प्रेस संगठनों का कहना है कि किसी रिपोर्ट की भाषा पर विवाद हो सकता है, लेकिन पत्रकारों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज होना प्रेस की स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर सवाल है। वहीं, शिकायतकर्ताओं का पक्ष यह है कि मीडिया रिपोर्टिंग में इस्तेमाल शब्दों की भी कानूनी और सामाजिक जिम्मेदारी होती है, खासकर तब जब किसी संवेदनशील विश्वविद्यालय विवाद को रिपोर्ट किया जा रहा हो।
अब आगे क्या?
अब पत्रकारों को FIR रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में नियमित प्रक्रिया के तहत याचिका दाखिल करनी होगी। इसके बाद अदालत FIR में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध सामग्री की जांच करेगी। फिलहाल इस मामले में कोई अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं आया है।
