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‘घटिया जांच’ और अप्रमाणित सबूतों पर नहीं चलेगी सजा! किडनैपिंग-मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया बरी

घटिया जांच’ ने खोली पुलिस की पूरी कहानी की पोल! सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण-हत्या मामले में आरोपी को बरी करते हुए कहा—अप्रमाणित कबूलनामे, CCTV और कॉल रिकॉर्ड के भरोसे किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

Sonali05 सित. 2026, 06:37 PM IST
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‘घटिया जांच’ और अप्रमाणित सबूतों पर नहीं चलेगी सजा! किडनैपिंग-मर्डर केस में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को किया बरी


फिरौती के लिए अपहरण और हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अभियोजन की जांच पर गंभीर सवाल उठाते हुए आरोपी को बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के लिए केवल एक कहानी, सह-आरोपी के कथित कबूलनामे या ऐसे इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य पर भरोसा नहीं किया जा सकता, जिन्हें कानून के अनुसार अदालत में साबित ही नहीं किया गया हो। कोर्ट ने अभियोजन की जांच को ‘Shoddy Investigation’ बताते हुए हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई आरोपी की दोषसिद्धि को पलट दिया।

जस्टिस जे.बी. पार्डीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने 3 सितंबर 2026 को इस मामले में फैसला सुनाया। मामला अपीलकर्ता यानी आरोपी नंबर-1 (A1) से जुड़ा था, जो इस मामले में जीवित बचे आरोपियों में अकेला था जिसकी दोषसिद्धि हाईकोर्ट ने बरकरार रखी थी।


क्या था पूरा मामला?

अभियोजन के मुताबिक, पीड़ित अपने घर से हैदराबाद जाने के लिए निकला था, लेकिन इसके बाद उसका कोई पता नहीं चला। कुछ समय बाद पीड़ित के पिता को फिरौती के लिए फोन आया। पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और कथित तौर पर 1.50 लाख रुपये आरोपी से जुड़े एक बैंक खाते में जमा किए गए। जांच के दौरान पुलिस ने कॉल रिकॉर्ड के आधार पर आरोपी नंबर-6 (A6) तक पहुंचने का दावा किया। A6 को गिरफ्तार किया गया और उसके कथित कबूलनामे के आधार पर पुलिस ने पीड़ित का शव बरामद किया। शव एक फ्लैट में रेफ्रिजरेटर के अंदर छिपाकर रखा गया था। इसके बाद A6 के कथित बयान के आधार पर अन्य आरोपियों, जिनमें A1 भी शामिल था, को मामले में जोड़ा गया। ट्रायल कोर्ट ने A1, A2, A3, A5 और A6 को दोषी ठहराया। A4 की मुकदमे के दौरान मृत्यु हो गई। बाद में हाईकोर्ट ने A2, A3, A5 और A6 को बरी कर दिया, लेकिन A1 की सजा को बरकरार रखा।


हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती

A1 ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उसकी दोषसिद्धि मुख्य रूप से एक अपार्टमेंट के चौकीदार PW3 की गवाही और उस फ्लैट से शव मिलने की परिस्थिति पर आधारित थी, जिसे कथित तौर पर A1 ने किराए पर लिया था। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपी द्वारा शव की मौजूदगी का संतोषजनक स्पष्टीकरण नहीं दे पाना अपने आप में दोषसिद्धि का पर्याप्त आधार नहीं हो सकता, खासकर तब जब अभियोजन के प्रमुख साक्ष्य ही कानून के अनुसार साबित नहीं हुए हों।


कबूलनामे पर भी कोर्ट ने जताई आपत्ति

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि आरोपियों की भूमिका से जुड़ी अभियोजन की कहानी मुख्य रूप से आरोपियों के कथित कबूलनामों से सामने आई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे कबूलनामों का इस्तेमाल सह-आरोपी को दोषी ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इन कबूलनामों के अलावा अभियोजन की कहानी को साबित करने वाला पर्याप्त स्वतंत्र और विश्वसनीय साक्ष्य मौजूद नहीं था।


CCTV और कॉल रिकॉर्ड भी नहीं हुए साबित

मामले में अभियोजन ने CCTV फुटेज और कॉल रिकॉर्ड को अहम इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के तौर पर पेश किया था। दावा किया गया था कि CCTV फुटेज में आरोपी को फिरौती की रकम निकालते हुए देखा गया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि फुटेज से आरोपी की पहचान स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होती थी। इसके अलावा, Evidence Act की धारा 65B के तहत आवश्यक प्रमाणपत्र भी पेश नहीं किया गया। कॉल रिकॉर्ड के मामले में भी यही स्थिति सामने आई। टेलीकॉम कंपनी के Nodal Officer को अदालत में गवाही के लिए पेश नहीं किया गया और Section 65B का प्रमाणपत्र भी रिकॉर्ड पर नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब कॉल रिकॉर्ड कानून के मुताबिक साबित ही नहीं हुए तो पुलिस के उस दावे का आधार भी खत्म हो जाता है कि कॉल रिकॉर्ड के विश्लेषण के बाद A6 तक पहुंचा गया था।


शव बरामदगी और रकम के सबूत भी कमजोर

कोर्ट ने यह भी देखा कि A6 के कथित बयान के आधार पर जिस फ्लैट से शव बरामद हुआ, वहां की बरामदगी के संबंध में कोई स्वतंत्र गवाह पेश नहीं किया गया। चूंकि A6 खुद हाईकोर्ट से बरी हो चुका था, इसलिए उसके कथित बयान के आधार पर A1 को दोषी ठहराना उचित नहीं था। इसके अलावा, जिस बैंक खाते में 1.50 लाख रुपये जमा किए गए थे, उसके खाताधारक की भी अदालत में गवाही नहीं कराई गई।


पोस्टमार्टम रिपोर्ट से मौत का कारण स्पष्ट

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट से यह साबित होता है कि मृतक की मौत दम घुटने और गला दबाने से हुई थी। शव को रेफ्रिजरेटर में छिपाया गया था, यह तथ्य भी सामने आया। लेकिन कोर्ट ने कहा कि इन परिस्थितियों के आधार पर अकेले A1 को हत्या और अपहरण के अपराध में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने A1 की दोषसिद्धि और सजा को रद्द करते हुए उसे बरी कर दिया। इस फैसले के जरिए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में अभियोजन को प्रत्येक महत्वपूर्ण साक्ष्य कानून के मुताबिक साबित करना होगा। अप्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड, सह-आरोपी के कथित कबूलनामे और महज परिस्थितिजन्य संदेह के आधार पर किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।