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चांदीपुरा वायरस पर केंद्र का बड़ा एक्शन, गुजरात-राजस्थान भेजी गई राष्ट्रीय संयुक्त विशेषज्ञ टीम
चांदीपुरा वायरस (CHPV) के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए केंद्र सरकार ने गुजरात और राजस्थान में राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया टीम (NJORT) तैनात की है। इस टीम में NCDC, ICMR और पशुपालन विभाग (DAHD) के विशेषज्ञ शामिल हैं, जो वायरस के प्रसार, संभावित वाहकों, जीनोम में बदलाव, पशुओं की भूमिका और संक्रमण के स्वरूप की व्यापक जांच करेंगे। सरकार ने 'वन हेल्थ' दृष्टिकोण अपनाते हुए मानव, पशु और वेक्टर सर्विलांस को एक साथ जोड़ा है। इसका उद्देश्य संक्रमण पर नियंत्रण, समय रहते पहचान और भविष्य में ऐसे प्रकोपों की रोकथाम के लिए वैज्ञानिक रणनीति तैयार करना है।
Vindhya Dubey05 अग. 2026, 07:32 PM IST

नई दिल्ली: देश में चांदीपुरा वायरस (Chandipura Virus Disease-CHPV) के बढ़ते मामलों के बीच केंद्र सरकार ने गुजरात और राजस्थान में राष्ट्रीय संयुक्त प्रकोप प्रतिक्रिया टीम (National Joint Outbreak Response Team-NJORT) तैनात कर दी है। यह टीम न केवल मौजूदा संक्रमण की जांच करेगी, बल्कि वायरस के फैलने के तरीके, बीमारी की गंभीरता, संभावित वाहकों (Vectors), पशुओं की भूमिका और उपचार से जुड़े वैज्ञानिक पहलुओं का भी गहन अध्ययन करेगी।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अनुसार, यह अब तक चांदीपुरा वायरस को लेकर देश में की जा रही सबसे व्यापक वैज्ञानिक जांचों में से एक है। इस अभियान का संचालन राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) के नेतृत्व में किया जा रहा है, जबकि भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), पशुपालन एवं डेयरी विभाग (DAHD), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) तथा गुजरात और राजस्थान के स्वास्थ्य विभाग मिलकर इस जांच में शामिल हैं।
क्या है चांदीपुरा वायरस?
चांदीपुरा वायरस रैब्डोविरिडे (Rhabdoviridae) परिवार का एक वायरस है, जिसकी पहचान पहली बार वर्ष 1965 में महाराष्ट्र के नागपुर जिले के चांदीपुरा गांव में हुई थी। यह वायरस मुख्य रूप से बच्चों को प्रभावित करता है और कई मामलों में तेज बुखार, उल्टी, दौरे (Seizures), मानसिक भ्रम तथा Acute Encephalitis Syndrome (AES) यानी मस्तिष्क में सूजन जैसी गंभीर स्थिति पैदा कर सकता है। गंभीर मामलों में यह संक्रमण बहुत तेजी से बढ़ता है और समय पर उपचार न मिलने पर मृत्यु का कारण भी बन सकता है।
कैसे फैलता है यह वायरस?
अब तक उपलब्ध वैज्ञानिक प्रमाणों के अनुसार चांदीपुरा वायरस का प्रमुख वाहक सैंडफ्लाई (Sandfly) को माना जाता है। हालांकि इस बार वैज्ञानिक यह भी जांच कर रहे हैं कि क्या मच्छर, टिक (Ticks) और माइट्स (Mites) जैसे अन्य आर्थ्रोपोड भी इसके प्रसार में भूमिका निभा रहे हैं। प्रभावित क्षेत्रों से बड़ी संख्या में इन वाहकों के नमूने एकत्र कर प्रयोगशालाओं में परीक्षण किया जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जांच पूरी होने से पहले किसी एक वाहक को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।
किन संस्थानों की क्या भूमिका है?
इस राष्ट्रीय जांच में ICMR के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी (पुणे), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एपिडेमियोलॉजी (चेन्नई), नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वेक्टर कंट्रोल रिसर्च (पुडुचेरी), नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर प्री-क्लीनिकल रिसर्च (हैदराबाद), ICAR-NIVEDI (बेंगलुरु), गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (GBRC) और कई अन्य संस्थान शामिल हैं। इनकी जिम्मेदारी वायरस की आनुवंशिक संरचना (Genome), संक्रमण की श्रृंखला, रोग की गंभीरता और संभावित उपचार विकल्पों पर वैज्ञानिक साक्ष्य तैयार करना है।
मानवों के साथ पशुओं की भी हो रही जांच
सरकार ने "वन हेल्थ" (One Health) रणनीति अपनाई है, जिसमें इंसानों, पशुओं और पर्यावरण तीनों को एक साथ ध्यान में रखकर बीमारी की जांच की जाती है। इसी के तहत गाय, भैंस और बकरियों के रक्त एवं दूध के नमूने लिए जा रहे हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं घरेलू पशु वायरस के संभावित रिजर्वायर (Reservoir Host) तो नहीं हैं। अब तक लगभग 70 पशुओं के रक्त नमूनों की जांच की जा रही है। फिलहाल किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।
जीनोम सीक्वेंसिंग से क्या पता चलेगा?
गुजरात बायोटेक्नोलॉजी रिसर्च सेंटर (GBRC), गांधीनगर में वायरस के पूरे जीनोम की सीक्वेंसिंग की जा रही है। शुरुआती जांच में कुछ छोटे आनुवंशिक बदलाव (Genetic Variations) सामने आए हैं, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि यह तय करने के लिए विस्तृत अध्ययन जरूरी है कि क्या वर्तमान वायरस पहले के स्ट्रेन से अधिक खतरनाक या अधिक संक्रामक बन चुका है।
2024 के अनुभव से मिल रही सीख
वर्ष 2024 में गुजरात में चांदीपुरा वायरस का बड़ा प्रकोप सामने आया था। उस दौरान भी सैंडफ्लाई सहित कई संभावित वाहकों के नमूने लिए गए थे, लेकिन किसी भी नमूने में वायरस की पुष्टि नहीं हुई थी। इसी कारण इस बार जांच का दायरा काफी व्यापक रखा गया है ताकि संक्रमण की वास्तविक श्रृंखला को समझा जा सके।
देशभर में AES निगरानी नेटवर्क सक्रिय
भारत का Hospital-based Acute Encephalitis Syndrome (AES) Surveillance Network भी इस जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। देश के 15 बड़े अस्पतालों में संचालित यह नेटवर्क मरीजों के क्लीनिकल डेटा, रक्त नमूनों और आधुनिक आणविक परीक्षणों के जरिए यह पता लगा रहा है कि AES के पीछे कौन-कौन से वायरस जिम्मेदार हैं और भविष्य में ऐसे प्रकोपों को कैसे रोका जा सकता है।
यह कदम क्यों महत्वपूर्ण है?
चांदीपुरा वायरस का अभी तक कोई विशेष एंटीवायरल उपचार या स्वीकृत वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। ऐसे में समय पर पहचान, निगरानी, मच्छर और सैंडफ्लाई नियंत्रण, बच्चों में शुरुआती लक्षणों की पहचान और अस्पतालों में त्वरित इलाज ही सबसे प्रभावी उपाय हैं। केंद्र सरकार द्वारा विशेषज्ञों की संयुक्त टीम भेजने से वैज्ञानिक जांच तेज होगी, राज्यों को तकनीकी सहायता मिलेगी और भविष्य में ऐसे प्रकोपों की रोकथाम के लिए ठोस रणनीति तैयार की जा सकेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह जांच केवल मौजूदा प्रकोप को नियंत्रित करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि भारत में उभरते संक्रामक रोगों से निपटने की क्षमता को भी मजबूत करेगी। "वन हेल्थ" मॉडल के तहत मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरणीय निगरानी को एक साथ जोड़कर भविष्य के संक्रमणों के लिए अधिक प्रभावी और वैज्ञानिक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली विकसित करने में मदद मिलेगी।
इस अभियान के माध्यम से केंद्र सरकार का उद्देश्य न केवल चांदीपुरा वायरस के प्रसार को रोकना है, बल्कि यह समझना भी है कि वायरस कैसे फैलता है, किन परिस्थितियों में अधिक घातक बनता है और भविष्य में इससे होने वाले प्रकोपों को कैसे रोका जा सकता है। यही कारण है कि इसे भारत में संक्रामक रोगों के खिलाफ सबसे व्यापक वैज्ञानिक जांच अभियानों में से एक माना जा रहा है।
