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जजों की नियुक्ति में 12 साल से ‘अस्पष्ट कार्यपालिका हस्तक्षेप’! पूर्व चीफ जस्टिस एस. मुरलीधर ने Collegium System पर उठाए सवाल

देश की अदालतों में जजों की नियुक्ति से लेकर लंबित मुकदमों के पहाड़ तक, न्यायपालिका की पूरी व्यवस्था पर पूर्व चीफ जस्टिस एस. मुरलीधर ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पिछले 12 वर्षों में जजों की नियुक्ति में कार्यपालिका का ‘अस्पष्ट हस्तक्षेप’ देखने को मिला, जबकि Collegium System खुद पारदर्शिता, स्पष्ट मानदंड और समयबद्ध नियुक्तियों की कमी से जूझ रहा है। खास बात यह है कि मुरलीधर की यह टिप्पणी ऐसे समय आई है, जब उनकी अपनी नियुक्ति और ट्रांसफर भी पहले Collegium बनाम Executive की बहस के केंद्र में रह चुके हैं।

Sonali29 अग. 2026, 01:44 PM IST
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जजों की नियुक्ति में 12 साल से ‘अस्पष्ट कार्यपालिका हस्तक्षेप’! पूर्व चीफ जस्टिस एस. मुरलीधर ने Collegium System पर उठाए सवाल

नई दिल्ली: 

देश में जजों की नियुक्ति को लेकर एक बार फिर Collegium System और Executive के बीच अधिकारों की बहस तेज होती दिख रही है। पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिस और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर ने कहा है कि पिछले 12 वर्षों में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में कार्यपालिका की ओर से ‘अस्पष्ट हस्तक्षेप’ देखने को मिला है। उन्होंने Collegium System की पारदर्शिता, चयन के मानदंड और उसकी कार्यक्षमता पर भी सवाल उठाए। मुरलीधर ने ये टिप्पणियां 24 अगस्त 2026 को नई दिल्ली में आयोजित 28वें डीएस बोर्कर मेमोरियल लेक्चर में ‘My Vision of India: 2047’ विषय पर बोलते हुए कीं। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और प्रभावी न्याय व्यवस्था के लिए नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट, पारदर्शी और समयबद्ध बनाने की जरूरत है।

Collegium System के बावजूद ‘सर्वश्रेष्ठ उम्मीदवार’ चुनने का लक्ष्य पूरा नहीं हुआ?

जस्टिस मुरलीधर के मुताबिक, 1993 में Collegium System अपनाने के बाद सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति में CJI और वरिष्ठ न्यायाधीशों की राय को प्राथमिकता मिली। लेकिन उनके अनुसार अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या यह व्यवस्था सर्वश्रेष्ठ संभावित उम्मीदवारों को न्यायपालिका में लाने के अपने मूल उद्देश्य को पूरी तरह हासिल कर पाई है। उन्होंने कहा कि पिछले 12 वर्षों में appointment process में ‘unexplained interference by the executive’ हुआ है। उन्होंने इसके साथ Collegium के भीतर criteria की अस्पष्टता, transparency की कमी और overall inefficiency को भी बड़ी समस्या बताया।

क्या है Collegium System?

Supreme Court के Second Judges Case के बाद 1993 में Collegium व्यवस्था विकसित हुई, जिसमें न्यायाधीशों की नियुक्ति में न्यायपालिका की प्रधान भूमिका स्थापित हुई। 1998 के Presidential Reference के बाद इसकी प्रक्रिया को और स्पष्ट किया गया। 2014 में केंद्र सरकार ने National Judicial Appointments Commission यानी NJAC के माध्यम से इस व्यवस्था को बदलने की कोशिश की थी। लेकिन अक्टूबर 2015 में Supreme Court ने 99वें संविधान संशोधन और NJAC Act को असंवैधानिक घोषित करते हुए Collegium System को बरकरार रखा। इसके बाद भी Collegium की पारदर्शिता और जवाबदेही लगातार बहस का विषय बनी रही। Supreme Court Collegium ने अक्टूबर 2017 में स्वयं appointment process में transparency बढ़ाने से संबंधित resolution जारी किया था।

‘जब रिटायरमेंट की तारीख पहले से पता है तो replacement में देरी क्यों?’

मुरलीधर ने जजों की नियुक्ति में देरी को लेकर सवाल उठाते हुए कहा कि किसी न्यायाधीश की retirement date पहले से सार्वजनिक होती है। इसके बावजूद कई बार successor की नियुक्ति समय पर नहीं हो पाती। उन्होंने कहा कि यदि sanctioned strength बढ़ा भी दी जाए, लेकिन appointment process को efficient नहीं बनाया गया तो vacancies का संकट और गंभीर हो सकता है। यानी समस्या केवल यह नहीं है कि अदालतों में कितने पद स्वीकृत हैं, बल्कि यह भी है कि उन पदों पर नियुक्तियां कितनी तेजी और प्रभावी तरीके से होती हैं।

मुरलीधर की अपनी नियुक्ति भी रही है Collegium विवाद के केंद्र में

जस्टिस मुरलीधर की वर्तमान टिप्पणी को उनके अपने judicial career के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। सितंबर 2022 में Supreme Court Collegium ने उन्हें Madras High Court का Chief Justice बनाने की recommendation की थी। हालांकि उस recommendation पर तत्काल नियुक्ति नहीं हुई। बाद में अप्रैल 2023 में Collegium ने उस recommendation को वापस लेकर Justice Sanjay V. Gangapurwala को Madras High Court का Chief Justice बनाने की सिफारिश की। इस घटनाक्रम ने judicial appointments में delay और Executive की भूमिका को लेकर सवाल पैदा किए थे।

Supreme Court elevation को लेकर भी उठे थे सवाल

2023 में वरिष्ठ jurist Fali S. Nariman, पूर्व Supreme Court judge Justice Madan B. Lokur और senior advocate Sriram Panchu ने सार्वजनिक रूप से यह सवाल उठाया था कि Justice Muralidhar को Supreme Court में elevate क्यों नहीं किया गया। उन्होंने Collegium से इस संबंध में explanation की मांग की थी। यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज Collegium की कार्यप्रणाली और Executive की भूमिका पर सवाल उठाने वाले मुरलीधर स्वयं पहले judicial appointments और transfers को लेकर चर्चा में रहे हैं। हालांकि यह स्पष्ट करना जरूरी है कि उनके Supreme Court elevation को लेकर उठे सवाल और Executive interference के आरोप अलग-अलग घटनाक्रम हैं; किसी न्यायिक निर्णय ने यह निष्कर्ष नहीं दिया कि उनके मामले में कोई अवैध हस्तक्षेप हुआ था।

2020 में Delhi High Court से transfer भी रहा चर्चा में

Justice Muralidhar का फरवरी 2020 में Delhi High Court से Punjab and Haryana High Court transfer भी काफी चर्चा में रहा था। उस समय उनके transfer को लेकर transparency और timing पर सवाल उठे थे। बाद में इस मुद्दे पर पूर्व Supreme Court judge Justice Madan B. Lokur सहित कई लोगों ने अपनी राय सार्वजनिक की। हालांकि transfer के संबंध में अलग-अलग सार्वजनिक दावों को न्यायिक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यही वजह है कि 2026 में Collegium और Executive के संबंधों पर मुरलीधर की टिप्पणी को उनके अपने judicial career के संदर्भ में भी काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Collegium पर सवाल नए नहीं हैं

Collegium System की आलोचना केवल मुरलीधर तक सीमित नहीं रही है। नियुक्ति प्रक्रिया में transparency, objective criteria और accountability की कमी को लेकर लंबे समय से बहस होती रही है। 2017 में Supreme Court Collegium ने transparency से संबंधित resolution जारी कर यह संकेत दिया था कि appointment process में अधिक institutional clarity की आवश्यकता है। दूसरी ओर, केंद्र सरकार judicial appointments को Judiciary और Executive के बीच एक collaborative और integrated process मानती रही है। सरकार के अनुसार High Court Collegium की recommendations पर विभिन्न inputs और reports के आधार पर उम्मीदवारों की suitability की जांच की जाती है, जबकि अंतिम नियुक्तियां Supreme Court Collegium की recommendations के आधार पर होती हैं। इसलिए मुरलीधर की ‘executive interference’ वाली टिप्पणी को उनके व्यक्तिगत आकलन के रूप में समझना जरूरी है, न कि किसी नए न्यायिक फैसले के रूप में।

‘बढ़ती पेंडेंसी के लिए सिर्फ जजों को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते’

मुरलीधर ने न्यायालयों में लंबित मामलों के लिए केवल judges को जिम्मेदार ठहराने की धारणा को भी चुनौती दी। उन्होंने कहा कि आंकड़े बताते हैं कि बड़ी संख्या में न्यायाधीश अपनी क्षमता के अनुसार मामलों का निपटारा कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हर अदालत में कुछ judges ऐसे हैं जो बेहद मेहनत से काम करते हैं और पूरे caseload का भारी हिस्सा संभालते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि न्यायपालिका में मौजूद समस्या को केवल judges की संख्या के नजरिए से देखना सही नहीं होगा।

हर महीने 29 लाख नए मामले, निपटते हैं करीब 24 लाख

मुरलीधर के अनुसार जिला अदालतों में हर महीने करीब 29 लाख नए मामले दाखिल होते हैं, जबकि लगभग 24 लाख मामलों का निपटारा होता है। High Courts में हर साल 10 लाख से अधिक मामले दाखिल होते हैं और लगभग इतनी ही संख्या में मामलों का disposal होता है। ऐसे में कुल pendency में तेजी से कमी नहीं आ पाती। उन्होंने Supreme Court का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां मौजूदा pendency करीब 93,000 मामलों की है। वर्ष 2025 में करीब 62,000 मामले दाखिल हुए, जबकि लगभग 57,000 मामलों का निपटारा हुआ।

Government litigation भी pendency का बड़ा कारण

मुरलीधर ने लंबित मामलों की समस्या में सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि सरकार देश के सबसे बड़े litigants में से एक है और कई मामलों में सरकार अपने खिलाफ आए फैसलों को आगे की अदालतों में चुनौती देती रहती है। उन्होंने छोटे monetary disputes का उदाहरण देते हुए बताया कि कम रकम से जुड़े मामले भी लंबे समय तक अदालतों में चलते रहते हैं। उनके अनुसार government lawyers को समय पर instructions नहीं मिलना, reply affidavits देर से दाखिल होना और बार-बार adjournment मांगना भी judicial delay बढ़ाता है।

‘20-30% जज बेहद मेहनती’

मुरलीधर ने judges की कार्यक्षमता पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि आंकड़ों से यह धारणा बनाना सही नहीं है कि सभी judges मामलों के disposal में पीछे हैं।

उनके मुताबिक लगभग 20 से 30 प्रतिशत serving judges ऐसे हैं जो punctual, conscientious, hardworking और efficient हैं तथा court और case management का भारी काम संभालते हैं। उन्होंने कहा कि चिंता उन judges को लेकर होनी चाहिए जो अपेक्षित दक्षता से काम नहीं कर रहे हैं।

2047 की न्यायपालिका कैसी होनी चाहिए?

मुरलीधर के पूरे भाषण का फोकस केवल Collegium System नहीं था। उन्होंने India@2047 के संदर्भ में न्यायपालिका को अधिक accessible, accountable, efficient और constitutional values के अनुरूप बनाने की जरूरत पर जोर दिया। उनके अनुसार judicial appointments, vacancies और pendency एक-दूसरे से जुड़े हुए मुद्दे हैं। यदि नियुक्तियों में देरी होती है तो vacancies बढ़ती हैं; vacancies बढ़ने से judges पर workload बढ़ता है और इसका असर case disposal पर पड़ता है।

क्यों महत्वपूर्ण है मुरलीधर का बयान?

Justice Muralidhar का बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह न्यायिक नियुक्तियों की उस बहस को फिर सामने लाता है जो वर्षों से Collegium और Executive की भूमिकाओं के बीच चलती रही है। एक तरफ Collegium को न्यायपालिका की स्वतंत्रता की सुरक्षा के लिए जरूरी माना जाता है, वहीं दूसरी तरफ उसकी transparency, selection criteria और accountability को लेकर सवाल उठते रहे हैं। दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि appointment process में Executive की भूमिका constitutional framework का हिस्सा है और candidates की suitability की जांच करना जरूरी है। ऐसे में मुरलीधर की टिप्पणी का व्यापक संदेश यह है कि 2047 की न्यायपालिका के लिए केवल judges की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। नियुक्ति प्रक्रिया को समयबद्ध और पारदर्शी बनाना, vacancies को कम करना, government litigation को नियंत्रित करना और अदालतों की overall efficiency बढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।