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नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा को बनाया जाएगा समग्र स्वास्थ्य का वैश्विक केंद्र, शोध और प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण पर जोर

केंद्रीय आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने कहा है कि सोवा-रिग्पा चिकित्सा पद्धति को केवल पारंपरिक ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि इसे वैज्ञानिक शोध, आधुनिक मानकों और प्रमाण आधारित चिकित्सा प्रणाली के रूप में वैश्विक पहचान दिलाई जाएगी। उन्होंने कहा कि भारत का लक्ष्य सोवा-रिग्पा को देश और दुनिया में एक प्रमुख स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में स्थापित करना है।

Vindhya Dubey07 अग. 2026, 05:59 PM IST
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नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा को बनाया जाएगा समग्र स्वास्थ्य का वैश्विक केंद्र, शोध और प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण पर जोर

केंद्रीय मंत्री ने नई दिल्ली में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा (NISR) की दूसरी गवर्निंग बॉडी बैठक की अध्यक्षता करते हुए संस्थान के विकास, शोध, शिक्षा और विस्तार को लेकर रणनीतिक दिशा-निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में संस्थान का फोकस केवल बुनियादी ढांचे के विकास तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैज्ञानिक अनुसंधान, अंतरराष्ट्रीय मानकों और हिमालयी क्षेत्रों में इसके विस्तार पर केंद्रित होगा।

सोवा-रिग्पा को मिलेगा वैज्ञानिक आधार

बैठक को संबोधित करते हुए प्रतापराव जाधव ने कहा कि सोवा-रिग्पा को विश्व के सामने एक प्रमाण आधारित चिकित्सा विज्ञान के रूप में स्थापित करना सरकार की प्राथमिकता है। इसके लिए शोध गतिविधियों को तेज करने और एक स्वतंत्र शोध परिषद स्थापित करने की दिशा में कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच समन्वय स्थापित करते हुए ऐसा मजबूत तंत्र विकसित किया जाएगा, जिसमें वैज्ञानिक शोध, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर के चिकित्सा मानकों को शामिल किया जाएगा। मंत्री ने कहा कि अब समय आ गया है कि सोवा-रिग्पा को केवल एक क्षेत्रीय चिकित्सा प्रणाली के रूप में नहीं बल्कि वैश्विक स्वास्थ्य व्यवस्था के महत्वपूर्ण हिस्से के रूप में विकसित किया जाए।

NISR बनेगा वैश्विक समग्र स्वास्थ्य केंद्र

प्रतापराव जाधव ने कहा कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा केवल लद्दाख का संस्थान नहीं है, बल्कि यह पूरे भारतीय हिमालयी क्षेत्र की चिकित्सा विरासत का संरक्षक है। उन्होंने संस्थान के दोनों क्षेत्रीय मॉडल को मजबूत करने और हिमालयी समुदायों के साथ अधिक प्रभावी जुड़ाव बढ़ाने पर जोर दिया। उन्होंने दुर्लभ औषधीय पौधों की सतत खेती, जैव विविधता संरक्षण, बायो-प्रॉस्पेक्टिंग और एग्रोफॉरेस्ट्री को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि स्थानीय समुदायों को इस विरासत के संरक्षण और विकास में बराबर का भागीदार बनाया जाना चाहिए।


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भोटी भाषा की प्राचीन पांडुलिपियों का होगा डिजिटलीकरण

केंद्रीय मंत्री ने सोवा-रिग्पा से जुड़ी भोटी भाषा की सैकड़ों प्राचीन पांडुलिपियों के संरक्षण पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि इन अमूल्य दस्तावेजों का व्यवस्थित रूप से डिजिटलीकरण और अनुवाद किया जाना चाहिए, ताकि शोधकर्ताओं और आम लोगों तक यह ज्ञान पहुंच सके। उन्होंने सुझाव दिया कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा, ज्ञान भारतम मिशन या संस्कृति मंत्रालय के सहयोग से इस कार्य को तेजी से आगे बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा विरासत को सुरक्षित रखने और भविष्य के शोध को मजबूत करने के लिए इन पांडुलिपियों का संरक्षण बेहद जरूरी है।

आयुष मंत्रालय संस्थागत विकास के लिए प्रतिबद्ध

आयुष मंत्रालय के सचिव वैद्य राजेश कोटेचा ने कहा कि मंत्रालय भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों को संरक्षित करने के साथ-साथ उन्हें आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण के माध्यम से आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा शिक्षा, चिकित्सा सेवाओं, शोध और क्षमता निर्माण के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में उभर रहा है। मंत्रालय इसके दीर्घकालिक विकास के लिए निरंतर सहयोग प्रदान करेगा।

डॉ. पद्मा गुरमेत को पद्म श्री मिलने पर सम्मान

गवर्निंग बॉडी ने नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सोवा-रिग्पा के निदेशक डॉ. पद्मा गुरमेत को वर्ष 2026 में पद्म श्री सम्मान मिलने पर बधाई दी। उन्हें सोवा-रिग्पा चिकित्सा प्रणाली के संरक्षण, पुनर्जीवन और संस्थागत विकास में उनके योगदान के लिए सम्मानित किया गया है। बैठक में डॉ. गुरमेत ने संस्थान की उपलब्धियों और भविष्य की योजनाओं का प्रस्तुतीकरण किया। उन्होंने शिक्षा, चिकित्सा सेवाओं, शोध, औषधीय पौधों के संरक्षण और जनजागरूकता कार्यक्रमों में हुई प्रगति की जानकारी दी।

क्या है सोवा-रिग्पा चिकित्सा प्रणाली?

सोवा-रिग्पा का अर्थ भोटी भाषा में "उपचार का ज्ञान" है। यह दुनिया की सबसे पुरानी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में से एक मानी जाती है। भारत सरकार ने इसे आयुष प्रणाली के अंतर्गत मान्यता दी है। इसे आमतौर पर अमची चिकित्सा पद्धति के नाम से भी जाना जाता है। यह प्रणाली भारतीय हिमालयी क्षेत्रों के अलावा कई पड़ोसी देशों में भी प्रचलित है। सदियों के दौरान यह ट्रांस-हिमालयी क्षेत्र में विकसित हुई और आज पारंपरिक चिकित्सा ज्ञान का एक महत्वपूर्ण भंडार मानी जाती है। गवर्निंग बॉडी की बैठक में सोवा-रिग्पा के शिक्षा, शोध, स्वास्थ्य सेवाओं और नीति संबंधी कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। आयुष मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि सरकार इस प्राचीन हिमालयी चिकित्सा परंपरा को वैज्ञानिक प्रमाण, संस्थागत मजबूती और व्यापक जन पहुंच के माध्यम से नई पहचान दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है।