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‘न्यायपालिका में ब्लैक शीप बढ़ रहे हैं, अदालतें बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ रही हैं’: पूर्व जस्टिस दीपक गुप्ता
न्यायपालिका की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस दीपक गुप्ता ने गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने अपने लेख में कहा कि न्यायपालिका में ‘ब्लैक शीप’ बढ़ रहे हैं और अदालतें धीरे-धीरे बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ रही हैं। जस्टिस गुप्ता ने कहा कि लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिए न्यायपालिका का स्वतंत्र, निडर और बिना भय या पक्षपात के काम करना बेहद जरूरी है।

न्यायपालिका में ‘ब्लैक शीप’ बढ़ रहे हैं और देश की अदालतें धीरे-धीरे बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ रही हैं। यह गंभीर टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्टिस दीपक गुप्ता ने अपने एक लेख में की है। उन्होंने कहा कि कोई भी देश तब तक वास्तव में स्वतंत्र नहीं हो सकता, जब तक वहां स्वतंत्र और निडर न्यायपालिका मौजूद न हो। स्वतंत्रता दिवस के संदर्भ में लिखे गए अपने लेख में जस्टिस गुप्ता ने कहा कि आजादी का मतलब केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। वास्तविक स्वतंत्रता तब है, जब नागरिक बिना डर के सोच और बोल सकें, असहमति व्यक्त कर सकें और अपने विचार खुलकर रख सकें। उन्होंने कहा कि जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव न हो और कमजोर वर्गों तथा अल्पसंख्यकों को समान अवसर मिले, तभी देश को वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र कहा जा सकता है।
‘निडर और रीढ़ वाले जज जरूरी’
लगभग पांच दशक तक कानूनी पेशे से जुड़े रहे जस्टिस गुप्ता ने न्यायपालिका की भूमिका पर विशेष जोर दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र न्यायपालिका तभी मजबूत हो सकती है, जब ऐसे जज हों जिनमें ईमानदारी, बौद्धिक क्षमता और सबसे बढ़कर अन्याय के खिलाफ खड़े होने की ‘रीढ़’ हो। उन्होंने कहा कि जजों में न्याय के लिए खड़े होने का साहस और अन्याय के खिलाफ लड़ने की क्षमता होनी चाहिए। उन्हें अपनी शपथ के अनुरूप बिना भय या पक्षपात के काम करना चाहिए। जस्टिस गुप्ता ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जैसे संवैधानिक न्यायालय केवल विवादों का निपटारा करने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा और उन्हें कायम रखने की भी जिम्मेदारी इन पर है। उन्होंने कहा कि संविधान निर्माताओं ने मौलिक अधिकारों को इतना महत्व दिया कि इन अधिकारों के उल्लंघन की शिकायत लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने का अधिकार स्वयं एक मौलिक अधिकार के रूप में अनुच्छेद 32 में शामिल किया गया।
संवैधानिक अदालतों की संवेदनशीलता पर सवाल
पूर्व जज ने चिंता जताई कि पिछले कुछ वर्षों में संवैधानिक अदालतों ने नागरिकों के अधिकारों के मामलों में अपेक्षित संवेदनशीलता और मजबूती नहीं दिखाई है। उन्होंने न्यायपालिका के सामने मौजूद चुनौतियों और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा में अदालतों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने न्यायमूर्ति एचआर खन्ना के ADM Jabalpur मामले में दिए गए ऐतिहासिक असहमति वाले फैसले का भी उल्लेख किया। जस्टिस गुप्ता के मुताबिक, न्यायपालिका की स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ तभी सामने आता है, जब जज कठिन परिस्थितियों में भी संविधान और नागरिकों के अधिकारों के पक्ष में मजबूती से खड़े हों।
‘बहुसंख्यकवाद’ की ओर बढ़ने की चिंता
जस्टिस गुप्ता ने न्यायपालिका में बढ़ते कथित बहुसंख्यकवादी रुझान पर भी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा कि अदालतों का काम बहुसंख्यक भावना के अनुसार चलना नहीं, बल्कि संविधान और कानून के अनुसार न्याय सुनिश्चित करना है। उन्होंने भ्रष्टाचार, पूर्वाग्रह, कट्टरता और असहिष्णुता से मुक्त समाज को वास्तविक स्वतंत्रता के लिए जरूरी बताया। साथ ही कहा कि आर्थिक प्रगति महत्वपूर्ण है, लेकिन केवल बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाना पर्याप्त नहीं है, यदि समाज के बड़े हिस्से को अभी भी गरीबी और असमानता का सामना करना पड़ रहा हो। जस्टिस गुप्ता का यह लेख न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संवैधानिक संस्थाओं की भूमिका और नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा को लेकर महत्वपूर्ण बहस खड़ी करता है। उनके अनुसार लोकतंत्र की मजबूती के लिए ऐसी न्यायपालिका आवश्यक है जो सत्ता, बहुसंख्यक दबाव या किसी अन्य प्रभाव से स्वतंत्र रहकर संविधान के अनुरूप निर्णय ले।
