एम.पी. परमेश्वरन का 92 वर्ष की उम्र में निधन भारतीय विज्ञान और जन-विज्ञान आंदोलन के लिए एक बड़ी क्षति माना जा रहा है। वे सिर्फ एक परमाणु वैज्ञानिक नहीं थे, बल्कि ऐसे विचारक और लेखक भी थे जिन्होंने विज्ञान को आम लोगों की जिंदगी और सामाजिक विकास से जोड़ने की कोशिश की। परमेश्वरन ने अपने करियर की शुरुआत परमाणु विज्ञान के क्षेत्र में की और Bhabha Atomic Research Centre (BARC) में काम किया। वैज्ञानिक क्षेत्र में काम करने के बाद उनका ध्यान धीरे-धीरे इस बात पर केंद्रित हुआ कि वैज्ञानिक ज्ञान सिर्फ प्रयोगशालाओं और विशेषज्ञों तक सीमित न रहे, बल्कि आम लोगों तक भी पहुंचे।
इसी सोच के कारण वे Kerala Sastra Sahitya Parishad (KSSP) से जुड़े। KSSP के माध्यम से विज्ञान को सरल भाषा में आम जनता तक पहुंचाने और समाज में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के प्रयासों में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। संगठन का उद्देश्य विज्ञान को केवल तकनीकी विषय न मानकर सामाजिक बदलाव के साधन के रूप में देखने से भी जुड़ा रहा है।परमेश्वरन का काम केवल विज्ञान के लोकप्रियकरण तक सीमित नहीं था। उन्होंने पर्यावरण, ऊर्जा, शिक्षा और ग्रामीण विकास जैसे विषयों पर भी काम किया। उनका मानना था कि विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल समाज के व्यापक हित और लोगों के जीवन में सुधार के लिए किया जाना चाहिए। ऊर्जा के मुद्दे पर भी उन्होंने काफी काम किया। भारत जैसे विकासशील देश में ऊर्जा की जरूरत, संसाधनों का इस्तेमाल और पर्यावरण के बीच संतुलन को लेकर उनकी सोच महत्वपूर्ण रही। उन्होंने विज्ञान और तकनीकी विकास को सामाजिक तथा पर्यावरणीय जरूरतों से जोड़कर देखने पर जोर दिया।
शिक्षा के क्षेत्र में भी परमेश्वरन की रुचि रही। वे विज्ञान की शिक्षा को अधिक व्यापक और जन-केंद्रित बनाने के पक्षधर थे। उनका प्रयास था कि बच्चों और आम लोगों में वैज्ञानिक सोच विकसित हो और वे सामाजिक समस्याओं को तर्क और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझ सकें।
ग्रामीण विकास भी उनके काम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। उन्होंने विज्ञान और तकनीक को ग्रामीण समाज की जरूरतों के साथ जोड़ने की दिशा में काम किया। उनके लिए वैज्ञानिक प्रगति का महत्व तभी था जब उसका लाभ समाज के कमजोर और ग्रामीण वर्गों तक भी पहुंचे।
परमेश्वरन की पहचान एक मार्क्सवादी विचारक के रूप में भी रही। उन्होंने विज्ञान, तकनीक और समाज के बीच संबंधों को राजनीतिक और सामाजिक दृष्टिकोण से समझने की कोशिश की। उनके लेखन और विचारों में विज्ञान के सामाजिक प्रभाव, विकास, पर्यावरण और समानता जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
वे All India People’s Science Network से भी जुड़े रहे। यह नेटवर्क देश में विभिन्न जन-विज्ञान संगठनों को जोड़ने और वैज्ञानिक चेतना को बढ़ावा देने के लिए काम करता रहा है। इसके अलावा वे Bharat Gyan Vigyan Samiti से भी जुड़े थे, जिसके जरिए विज्ञान साक्षरता और शिक्षा से जुड़े अभियानों को बढ़ावा दिया गया। उनकी पूरी सार्वजनिक और बौद्धिक यात्रा में एक बात लगातार दिखाई देती रही—विज्ञान को आम जनता से जोड़ना। उन्होंने वैज्ञानिक ज्ञान को समाज से अलग किसी विशेष वर्ग की संपत्ति के रूप में देखने के बजाय इसे सामाजिक विकास और जागरूकता का माध्यम बनाने पर जोर दिया। परमेश्वरन की पहचान ऐसे व्यक्ति के तौर पर बनी जिन्होंने वैज्ञानिक करियर से आगे बढ़कर विज्ञान और समाज के बीच संवाद को मजबूत किया। परमाणु विज्ञान से शुरू हुई उनकी यात्रा बाद में जन-विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण, ऊर्जा और ग्रामीण विकास जैसे व्यापक क्षेत्रों तक पहुंची।
उनके निधन के साथ विज्ञान और सामाजिक विचार के क्षेत्र में एक ऐसी आवाज का अंत हुआ जिसने कई दशकों तक वैज्ञानिक सोच और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संबंध पर जोर दिया। 92 वर्ष की उम्र में उनका निधन उन संगठनों और आंदोलनों के लिए भी महत्वपूर्ण क्षति है जिनसे वे लंबे समय तक जुड़े रहे। कुल मिलाकर, एम.पी. परमेश्वरन का जीवन केवल परमाणु वैज्ञानिक के रूप में उनके करियर तक सीमित नहीं रहा। BARC के वैज्ञानिक से लेकर जन-विज्ञान आंदोलन के प्रमुख कार्यकर्ता और मार्क्सवादी विचारक तक, उन्होंने विज्ञान को शिक्षा, पर्यावरण, ऊर्जा और ग्रामीण विकास जैसे सामाजिक मुद्दों से जोड़ने का लगातार प्रयास किया। KSSP, All India People’s Science Network और Bharat Gyan Vigyan Samiti जैसी संस्थाओं से उनका जुड़ाव उनके इसी व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।