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फर्जी डिग्री से वकालत या अपराध का नेटवर्क? यूपी में हाईकोर्ट की बड़ी कार्रवाई, 105 अधिवक्ताओं पर FIR के आदेश से मचा हड़कंप
जिस पेशे से कानून और न्याय की रक्षा की उम्मीद की जाती है, उसी में फर्जी डिग्री और आपराधिक मामलों से जुड़े अधिवक्ताओं के आंकड़ों ने उत्तर प्रदेश में हलचल मचा दी है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने रखी गई रिपोर्ट में 4,157 अधिवक्ताओं से जुड़े 5,056 आपराधिक मामलों का खुलासा हुआ। इतना ही नहीं, सत्यापन के दौरान 105 अधिवक्ताओं की शैक्षणिक योग्यताएं फर्जी पाई गईं, जिनके खिलाफ FIR दर्ज कराने के निर्देश दिए गए हैं। अब हाईकोर्ट की नजर करीब 5.37 लाख अधिवक्ताओं के रिकॉर्ड के व्यापक ऑडिट पर है।

प्रयागराज:
उत्तर प्रदेश में कानून और न्याय की रक्षा करने वाले वकालत के पेशे की विश्वसनीयता को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बेहद गंभीर चिंता जताई है। अदालत के सामने पेश किए गए आंकड़ों ने न्याय व्यवस्था के भीतर एक ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसने बार काउंसिल की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। रिकॉर्ड के मुताबिक उत्तर प्रदेश में 4,157 अधिवक्ताओं से जुड़े कुल 5,056 आपराधिक मामले सामने आए हैं। इनमें कुछ अधिवक्ताओं के खिलाफ 46 तक FIR दर्ज होने की जानकारी अदालत के सामने आई, इसके बावजूद वे अदालतों में प्रैक्टिस कर रहे थे।
मामला यहीं तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश बार काउंसिल की शैक्षणिक योग्यता और enrolment verification में 105 अधिवक्ताओं की qualifications कथित तौर पर फर्जी पाई गईं। हाईकोर्ट ने इन मामलों में FIR दर्ज कराने के लिए कार्रवाई का निर्देश दिया है। साथ ही अदालत ने संकेत दिया कि केवल 105 मामलों का सामने आना पूरी तस्वीर नहीं हो सकती और फर्जी enrolment तथा “ghost advocates” की पहचान के लिए बड़े स्तर पर रिकॉर्ड ऑडिट की जरूरत है। हालांकि, इस खबर में एक जरूरी कानूनी सावधानी समझना भी महत्वपूर्ण है—किसी व्यक्ति के खिलाफ FIR या आपराधिक मामला दर्ज होना उसे दोषी सिद्ध नहीं करता। इसलिए 4,157 अधिवक्ताओं को “अपराधी वकील” कहना सही नहीं होगा। सही तथ्य यह है कि उनके खिलाफ या उनसे संबंधित आपराधिक मामले अदालत के सामने रखे गए हैं।
3 जून 2026 के आदेश से खुला बड़ा मामला
यह पूरा मामला “Mohammad Kafeel बनाम State of Uttar Pradesh and Another” से जुड़ा है। न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने 3 जून 2026 को आदेश पारित किया। मूल मामला एक आपराधिक कार्यवाही से संबंधित याचिका से जुड़ा था, लेकिन सुनवाई के दौरान अदालत ने उत्तर प्रदेश में अधिवक्ताओं के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों, बार काउंसिल की disciplinary व्यवस्था और शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के सत्यापन से जुड़े आंकड़े मंगाए। यही आंकड़े सामने आने के बाद मामला एक व्यक्ति की याचिका से निकलकर पूरे राज्य में वकालत के पेशे की निगरानी व्यवस्था पर केंद्रित हो गया। हाईकोर्ट ने पाया कि समस्या केवल कुछ अधिवक्ताओं तक सीमित नहीं दिखाई देती, बल्कि इसके पीछे व्यापक regulatory और verification gaps की संभावना है।
यूपी में 5,14,439 अधिवक्ता, Certificate of Practice सिर्फ 2,49,809 को
अदालत के सामने रखी जानकारी के अनुसार उत्तर प्रदेश बार काउंसिल में 5,14,439 अधिवक्ता enrolled थे। इनमें 2,49,809 अधिवक्ताओं को Certificate of Practice जारी किया गया था। इस आंकड़े ने भी कोर्ट का ध्यान खींचा। अदालत ने यह सवाल उठाया कि इतने बड़े enrolment database में वास्तविक रूप से प्रैक्टिस कर रहे अधिवक्ताओं और केवल रिकॉर्ड में मौजूद नामों की स्थिति स्पष्ट करने के लिए व्यापक verification क्यों न किया जाए। इसी संदर्भ में करीब 5.37 लाख registered advocates के रिकॉर्ड के audit की जरूरत सामने आई, ताकि fake enrolments और “ghost advocates” की पहचान की जा सके।
4,157 अधिवक्ताओं से जुड़े 5,056 आपराधिक मामले
पुलिस की ओर से अदालत के सामने रखे गए statewide data के अनुसार 75 जिलों, सात commissionerates और Government Railway Police jurisdictions में 4,157 अधिवक्ताओं से जुड़े 5,056 आपराधिक मामले सामने आए।
इन आंकड़ों में:
418 अधिवक्ताओं से जुड़े तीन या उससे अधिक आपराधिक मामले बताए गए।
28 अधिवक्ताओं के खिलाफ 11 या उससे अधिक मामले दर्ज बताए गए।
126 अधिवक्ताओं के खिलाफ 5 से 10 मामले थे।
264 अधिवक्ताओं के खिलाफ 3 से 4 मामले बताए गए।
कुछ अधिवक्ताओं के खिलाफ 46 तक FIR दर्ज होने की जानकारी सामने आई।
हाईकोर्ट ने खास तौर पर इस बात पर चिंता जताई कि इतनी बड़ी संख्या में आपराधिक मामलों का सामना कर रहे कुछ अधिवक्ता अब भी न्यायालयों में प्रैक्टिस कर रहे थे।
लखनऊ के वजीरगंज से सामने आया चौंकाने वाला आंकड़ा
इस पूरे डेटा में लखनऊ का वजीरगंज थाना क्षेत्र भी विशेष रूप से चर्चा में आया। रिपोर्टों के अनुसार यहां 422 अधिवक्ताओं से जुड़े 236 आपराधिक मामलों का आंकड़ा अदालत के सामने रखा गया। यह आंकड़ा अदालत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि इससे एक ही स्थानीय क्षेत्र में अधिवक्ताओं से संबंधित आपराधिक मामलों के असामान्य concentration का संकेत मिला। कोर्ट ने ऐसे आंकड़ों को न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता के संदर्भ में गंभीरता से देखा।
फर्जी डिग्री का खेल कितना बड़ा?
बार काउंसिल की verification exercise में 105 अधिवक्ताओं की educational qualifications/enrolments को फर्जी पाए जाने की जानकारी अदालत के सामने रखी गई।
रिपोर्टों के अनुसार इन 105 मामलों में:
65 मामले LL.B. qualification से जुड़े थे।
28 मामलों में Graduation qualification फर्जी पाई गई।
5 मामलों में B.A. LL.B. qualification का सवाल उठा।
3 Intermediate certificates से जुड़े मामले सामने आए।
3 High School certificates से जुड़े मामले पाए गए।
1 मामले में BCA qualification से संबंधित फर्जी दस्तावेज सामने आया।
हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल को इन मामलों में FIR दर्ज कराने के लिए प्रभावी कदम उठाने का निर्देश दिया। (Shunyatax)
सिर्फ 105 फर्जी डिग्री वाले मामले ही क्यों? कोर्ट ने उठाया बड़ा सवाल
इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है। हाईकोर्ट ने 105 की संख्या को अंतिम तस्वीर मानने के बजाय verification exercise की प्रभावशीलता पर सवाल उठाया।
5 लाख से अधिक enrolled advocates के बीच केवल 105 फर्जी qualifications का सामने आना अदालत को प्रथम दृष्टया कम दिखाई दिया। इसी वजह से कोर्ट ने व्यापक audit की जरूरत बताई। रिपोर्टों के अनुसार कुछ कथित फर्जी qualifications वाले enrolments काफी पुराने भी थे। इससे अदालत के सामने यह चिंता उभरी कि फर्जी qualification के आधार पर enrolment की समस्या वर्षों से चली आ रही हो सकती है।
किन विश्वविद्यालयों के नाम सामने आए?
सत्यापन संबंधी विश्लेषण में अलग-अलग विश्वविद्यालयों के नाम सामने आए। इनमें University of Allahabad सहित कई विश्वविद्यालयों के नाम कथित फर्जी certificates से जुड़े मामलों में बताए गए। लेकिन यहां एक बेहद महत्वपूर्ण तथ्यात्मक सावधानी जरूरी है। किसी विश्वविद्यालय का नाम किसी कथित फर्जी certificate में इस्तेमाल होने का अर्थ यह नहीं है कि वह विश्वविद्यालय स्वयं फर्जी डिग्री जारी करने में शामिल था। इसलिए रिपोर्टिंग में “फलां विश्वविद्यालय ने फर्जी डिग्री दी” लिखना उचित नहीं होगा। सही भाषा यह होगी कि “फलां विश्वविद्यालय के नाम वाले certificate/document की सत्यता पर सवाल उठा और संबंधित qualification को verification में फर्जी पाया गया।”
5.37 लाख अधिवक्ताओं का होगा ऑडिट?
हाईकोर्ट के समक्ष सामने आए आंकड़ों के आधार पर लगभग 5.37 लाख registered advocates के records के व्यापक audit की जरूरत बताई गई है। इसका उद्देश्य fake enrolments और “ghost advocates” की पहचान करना है। इसके अलावा लगभग 2.6 लाख ऐसे अधिवक्ताओं के enrolment records की समीक्षा की जरूरत भी सामने आई, जिन्होंने Certificate of Practice प्राप्त नहीं किया है। इससे यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि कौन वास्तव में वकालत कर रहा है, किसका enrolment सक्रिय है और किन मामलों में रिकॉर्ड को आगे सत्यापित करने की जरूरत है।
पुलिस वेरिफिकेशन में भी सामने आई बड़ी कमी
मामले की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण बात सामने आई कि Certificate of Practice की verification प्रक्रिया में police verification अनिवार्य नहीं था।
हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत बताई। अदालत ने सुझाव दिया कि अधिवक्ताओं के enrolment के समय उनके character और criminal antecedents की police verification को अनिवार्य बनाने के लिए Bar Council of India के नियमों में बदलाव पर विचार किया जाए। इसका मकसद यह है कि किसी व्यक्ति को कानूनी पेशे में प्रवेश देने से पहले उसकी educational qualification के साथ-साथ आवश्यक background verification भी हो।
गंभीर आपराधिक मामलों वाले अधिवक्ताओं पर भी सख्ती
हाईकोर्ट ने मामला केवल फर्जी डिग्री तक सीमित नहीं रखा। अदालत ने गंभीर आपराधिक मामलों में आरोपी अधिवक्ताओं की practice और disciplinary proceedings को लेकर भी सख्त रुख अपनाया। अदालत की चिंता यह है कि यदि कोई अधिवक्ता गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहा है और उसी समय न्यायालय में पेशेवर प्रभाव का इस्तेमाल करता है, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया, गवाहों और अन्य पक्षों पर दबाव की संभावना पैदा हो सकती है। इसी कारण गंभीर मामलों को स्थानीय प्रभाव से दूर रखने की व्यवस्था पर जोर दिया गया।
आपराधिक मामलों की सुनवाई दूसरे जिले में कराने का निर्देश
रिपोर्टों के अनुसार हाईकोर्ट ने गंभीर आपराधिक मामलों को संबंधित अधिवक्ता के home/practice district से बाहर दूसरे जिले में transfer करने का निर्देश दिया है, ताकि local influence और पेशेगत दबाव से निष्पक्ष सुनवाई प्रभावित न हो। यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य सुधारना जरूरी है। इसे “कम से कम 100 किलोमीटर दूर” लिखना भ्रामक हो सकता है। उपलब्ध रिपोर्टिंग के अनुसार दूसरे जिले का चयन इस तरह करने की बात कही गई है कि वह संबंधित home district से 100 किलोमीटर से अधिक दूर न हो। उद्देश्य पर्याप्त दूरी और व्यावहारिक सुविधा के बीच संतुलन बनाना है।
बार काउंसिल की disciplinary व्यवस्था पर भी सवाल
हाईकोर्ट की चिंता सिर्फ पुलिस मामलों तक सीमित नहीं रही। अदालत ने यह भी देखा कि आपराधिक मामलों का सामना कर रहे अधिवक्ताओं की तुलना में Bar Council की disciplinary proceedings कितनी प्रभावी हैं। अदालत के सामने यह सवाल उभरा कि यदि हजारों अधिवक्ताओं से जुड़े आपराधिक मामले मौजूद हैं, तो professional misconduct के मामलों में disciplinary mechanism को समान रूप से सक्रिय क्यों नहीं किया गया।
रिपोर्टों के अनुसार कुछ disciplinary proceedings committees के dissolution और अन्य संस्थागत कारणों से प्रभावित हुईं। इससे अदालत की चिंता और बढ़ी कि वकालत के पेशे की internal accountability व्यवस्था कितनी प्रभावी है।
“घोस्ट एडवोकेट्स” की पहचान क्यों जरूरी?
हाईकोर्ट द्वारा “ghost advocates” का मुद्दा उठाया जाना इस आदेश का एक अलग और महत्वपूर्ण पहलू है। यदि कोई व्यक्ति वर्षों पहले enrolled हुआ हो लेकिन वास्तव में प्रैक्टिस नहीं कर रहा हो, या उसका enrolment फर्जी qualification पर आधारित हो, तो इससे बार के पूरे database की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। इसीलिए कोर्ट ने केवल 105 मामलों की कार्रवाई पर रुकने के बजाय व्यापक database audit की जरूरत बताई है।
Hardoi के आंकड़े पर भी कोर्ट की नजर
कोर्ट के सामने पेश district-wise data में Hardoi से संबंधित आंकड़ा भी चर्चा में आया। रिपोर्ट के अनुसार Hardoi के सभी 26 police stations से अधिवक्ताओं के खिलाफ शून्य आपराधिक मामले बताए गए। अदालत ने ऐसे आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाने योग्य स्थिति मानी, क्योंकि statewide data में जहां हजारों मामले सामने आए हों, वहां किसी जिले में बिल्कुल शून्य आंकड़ा अतिरिक्त verification की मांग कर सकता है।
कोर्ट की चिंता सिर्फ वकीलों तक नहीं, पूरी न्याय व्यवस्था तक
हाईकोर्ट ने वकालत के पेशे को न्याय वितरण प्रणाली का अभिन्न हिस्सा माना। अदालत की चिंता यह है कि यदि कानूनी पेशे में आपराधिक प्रभाव, फर्जी enrolment या पेशेगत शक्ति का दुरुपयोग बढ़ता है तो उसका असर सीधे आम litigants और न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता पर पड़ता है। अदालत की टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि न्याय व्यवस्था के किसी भी stakeholder को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।
26 या 105? वायरल खबर में सबसे बड़ा भ्रम
इस मामले से जुड़ी कुछ वायरल/प्रकाशित खबरों में 26 अधिवक्ताओं के खिलाफ FIR का उल्लेख किया गया है। लेकिन उपलब्ध हाईकोर्ट रिकॉर्ड और प्रमुख कानूनी रिपोर्टों में 105 अधिवक्ताओं की फर्जी qualifications/enrolments के संबंध में FIR की कार्रवाई का निर्देश स्पष्ट रूप से सामने आता है। इसलिए वेबसाइट की खबर में headline और मुख्य तथ्य के रूप में 105 का आंकड़ा इस्तेमाल करना अधिक सुरक्षित है। यदि 26 का उल्लेख करना हो तो उसे अलग से “कुछ रिपोर्टों में 26 का आंकड़ा” कहकर ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए, न कि पूरे मामले की अंतिम संख्या के रूप में।
क्या 4,157 वकील दोषी हैं?
नहीं।
यह इस खबर का सबसे जरूरी कानूनी clarification है। अदालत के सामने 4,157 अधिवक्ताओं से जुड़े 5,056 criminal cases का आंकड़ा रखा गया है। इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी मामलों में अधिवक्ता दोषी साबित हो चुके हैं। FIR, investigation, charge-sheet, trial और conviction अलग-अलग कानूनी चरण हैं।
इसी तरह 105 अधिवक्ताओं के खिलाफ FIR की कार्रवाई का निर्देश दिए जाने का अर्थ यह भी नहीं है कि सभी 105 को अदालत ने फर्जी डिग्री के अपराध में दोषी घोषित कर दिया है। संबंधित मामलों में जांच और आगे की न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही अंतिम निष्कर्ष निकलेगा।
अब आगे क्या होगा?
अब इस आदेश के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि संबंधित संस्थाएं अदालत के निर्देशों को किस तरह लागू करती हैं।
मुख्य तौर पर नजर रहेगी:
105 अधिवक्ताओं के खिलाफ FIR की कार्रवाई पर।
फर्जी enrolment की आगे की जांच पर।
5.37 लाख से अधिक records के audit पर।
Certificate of Practice नहीं लेने वाले लगभग 2.6 लाख अधिवक्ताओं के verification पर।
गंभीर आपराधिक मामलों वाले अधिवक्ताओं के खिलाफ disciplinary proceedings पर।
criminal antecedents के police verification को मजबूत करने की दिशा में कदमों पर।
गंभीर मामलों को local influence से बाहर transfer करने की व्यवस्था पर।
वकालत के पेशे की सफाई का बड़ा अभियान?
इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह मामला सिर्फ 105 कथित फर्जी qualifications वाले अधिवक्ताओं के खिलाफ FIR तक सीमित नहीं है। अदालत के सामने आए आंकड़े बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में enrolment verification, criminal background checking और professional disciplinary mechanism की पूरी व्यवस्था को मजबूत करने की जरूरत महसूस की गई है। 4,157 अधिवक्ताओं से जुड़े 5,056 आपराधिक मामले, कुछ अधिवक्ताओं के खिलाफ 46 तक FIR, 105 कथित फर्जी qualifications और लाखों enrolment records के audit की जरूरत—ये सभी तथ्य मिलकर संकेत देते हैं कि अदालत इस मामले को केवल व्यक्तिगत अनियमितता के रूप में नहीं, बल्कि legal profession की institutional credibility के मुद्दे के रूप में देख रही है। अब असली परीक्षा अदालत के निर्देशों के पालन की है। यदि verification, police background checks, disciplinary action और enrolment audit प्रभावी तरीके से लागू होते हैं, तो यह आदेश उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि देश में legal profession की regulatory व्यवस्था को अधिक पारदर्शी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
