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फर्जी स्कूल सर्टिफिकेट से नाबालिग बताकर POCSO लगाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, UP सरकार को 2 महीने में गाइडलाइंस बनाने का निर्देश

POCSO Act जैसे सख्त कानून में किसी की उम्र सिर्फ एक कागज से तय नहीं हो सकती—खासकर तब, जब वही कागज फर्जी निकले। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में फर्जी स्कूल और ट्रांसफर सर्टिफिकेट के जरिए लड़की को नाबालिग दिखाने की कोशिश पर गंभीर चिंता जताई है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की गड़बड़ी से प्रेम संबंधों के मामलों में कई युवकों पर POCSO की कठोर धाराएं लग सकती हैं और उन्हें जमानत तक हासिल करने में मुश्किल होती है। अब हाईकोर्ट ने यूपी सरकार को दो महीने में ऐसी गाइडलाइंस बनाने का निर्देश दिया है, ताकि उम्र के नाम पर फर्जी दस्तावेजों से कानून का दुरुपयोग रोका जा सके।

Sonali23 अग. 2026, 05:49 PM IST
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फर्जी स्कूल सर्टिफिकेट से नाबालिग बताकर POCSO लगाने पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, UP सरकार को 2 महीने में गाइडलाइंस बनाने का निर्देश

क्या किसी लड़की की उम्र सिर्फ एक संदिग्ध स्कूल प्रमाणपत्र के आधार पर 18 साल से कम मान ली जाए? और अगर वही प्रमाणपत्र बाद में फर्जी निकले तो उस दस्तावेज के आधार पर POCSO जैसे सख्त कानून के तहत आरोपी बनाए गए युवक का क्या होगा? ऐसे ही गंभीर सवाल पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने POCSO Act के कथित दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए कहा है कि कुछ मामलों में पीड़िता को नाबालिग दिखाने के लिए फर्जी स्कूल सर्टिफिकेट या ट्रांसफर सर्टिफिकेट पेश किए जा रहे हैं। कोर्ट के अनुसार इससे कई युवा लड़कों को POCSO मामलों में गलत तरीके से फंसाए जाने का खतरा पैदा होता है, जबकि इस कानून में आरोपी के खिलाफ वैधानिक presumption होने के कारण जमानत हासिल करना भी कठिन हो सकता है। इस मामले में Justice Arun Kumar Singh Deshwal की एकल पीठ ने उत्तर प्रदेश के Basic Education Department के Principal Secretary को निर्देश दिया है कि ऐसे छात्रों के लिए स्कूलों द्वारा जारी किए जाने वाले जन्मतिथि प्रमाणपत्र की प्रक्रिया को लेकर आवश्यक दिशानिर्देश तैयार किए जाएं। कोर्ट ने इसके लिए दो महीने की समय-सीमा तय की है

क्या है पूरा मामला?

यह मामला Shivam Yadav @ Chhotu v. State of U.P. and 3 Others से जुड़ा है, जिसमें हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत दी। मामले में पीड़िता की उम्र को लेकर अलग-अलग दस्तावेज सामने आए थे। एक ओर ossification test में पीड़िता की उम्र लगभग 18 से 20 वर्ष के बीच बताई गई थी। दूसरी ओर स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट में उसकी जन्मतिथि 12 नवंबर 2012 दर्ज थी, जिसके आधार पर उसे नाबालिग माना जा सकता था। उम्र को लेकर इस विरोधाभास को देखते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित स्कूल के Headmaster को रिकॉर्ड के साथ अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया।

स्कूल रिकॉर्ड की जांच में सामने आया बड़ा सवाल

Headmaster ने अदालत को बताया कि स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज जन्मतिथि एक कथित Transfer Certificate के आधार पर दर्ज की गई थी। यह Transfer Certificate Gram Samaj Junior High School से जारी किया गया बताया गया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने Investigating Officer को उस Transfer Certificate की सत्यता जांचने का निर्देश दिया। जांच के दौरान संबंधित Junior High School के Headmaster ने स्पष्ट किया कि पीड़िता का उस स्कूल में कभी दाखिला ही नहीं हुआ था और कथित Transfer Certificate उस स्कूल द्वारा जारी नहीं किया गया था। इसके बाद हाईकोर्ट ने माना कि वर्ष 2023 में तैयार किया गया कथित Transfer Certificate फर्जी था। इसलिए उस फर्जी दस्तावेज के आधार पर तैयार किया गया School Leaving Certificate भी उम्र निर्धारित करने के लिए भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।

'POCSO Act के स्पष्ट दुरुपयोग' पर कोर्ट की टिप्पणी

Justice Arun Kumar Singh Deshwal ने कहा कि अदालत के सामने ऐसे कई मामले आए हैं, जहां पीड़िता को 18 वर्ष से कम दिखाने के लिए माता-पिता द्वारा फर्जी स्कूल प्रमाणपत्र, Transfer Certificate या Headmaster द्वारा जारी किए गए बताए जाने वाले पत्र पेश किए गए। कोर्ट ने इस तरह की घटनाओं को POCSO Act के "clear misuse" के रूप में देखा और कहा कि ऐसी स्थिति में कानून का इस्तेमाल किसी युवक को दंडित करने के लिए किया जा सकता है, जबकि लड़की स्वयं घर से निकलकर आरोपी के साथ संबंध में गई हो। यह टिप्पणी POCSO Act की गंभीरता को कम करने के लिए नहीं, बल्कि उम्र निर्धारण की प्रक्रिया को विश्वसनीय और दस्तावेजी रूप से सुरक्षित बनाने की आवश्यकता को लेकर है।

POCSO में उम्र इतनी महत्वपूर्ण क्यों?

POCSO Act में 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चे के संबंध में यौन अपराधों के लिए कड़े प्रावधान हैं। इसलिए किसी व्यक्ति की उम्र का निर्धारण पूरे मामले की दिशा बदल सकता है।

हाईकोर्ट ने विशेष रूप से इस बात पर चिंता जताई कि यदि कोई फर्जी दस्तावेज पीड़िता को नाबालिग साबित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, तो आरोपी पर POCSO Act के कड़े प्रावधान लागू हो सकते हैं। ऐसे मामलों में कानून में मौजूद presumption के कारण आरोपी के लिए जमानत और मुकदमे का सामना करना कठिन हो सकता है।

Matriculation Certificate नहीं होने पर क्या होगा?

हाईकोर्ट ने उम्र निर्धारण से जुड़ी एक व्यावहारिक समस्या की ओर भी ध्यान दिलाया। यदि किसी पीड़िता के पास matriculation certificate नहीं है, तो कई बार स्कूल द्वारा जारी जन्मतिथि प्रमाणपत्र ही उम्र निर्धारित करने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेज बन जाता है। लेकिन यदि वही प्रमाणपत्र किसी संदिग्ध या फर्जी Transfer Certificate के आधार पर तैयार किया गया हो, तो उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो जाते हैं। इसी समस्या को देखते हुए अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को स्पष्ट प्रक्रिया बनाने का निर्देश दिया है।

UP सरकार को क्या करना होगा?

हाईकोर्ट ने Principal Secretary, Basic Education, Uttar Pradesh को निर्देश दिया है कि दो महीने के भीतर आवश्यक guidelines जारी की जाएं।

इन दिशानिर्देशों में मुख्य रूप से:

  • Matriculation पास नहीं करने वाले छात्रों के लिए जन्मतिथि प्रमाणपत्र जारी करने का निर्धारित format;

  • Admission के समय माता-पिता या guardians से लिए जाने वाले दस्तावेज;

  • स्कूल रिकॉर्ड में जन्मतिथि दर्ज करने की प्रक्रिया;

  • और दस्तावेजों की सत्यता सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक safeguards शामिल किए जाने हैं।

आरोपी को क्यों मिली जमानत?

मामले में पीड़िता ने BNSS की Sections 180 और 183 के तहत दिए गए अपने बयानों में कहा था कि वह स्वयं घर से गई थी और बाद में applicant के साथ अपनी इच्छा से गई क्योंकि दोनों के बीच relationship था। आरोपी की ओर से ossification test का भी हवाला दिया गया, जिसमें पीड़िता की उम्र 18 से 20 वर्ष के बीच बताई गई थी। मेडिकल जांच में चोटों की अनुपस्थिति, आरोपी का कोई criminal antecedent नहीं होना और chargesheet दाखिल हो जाना भी उसके पक्ष में रखा गया।

State और informant ने bail का विरोध किया, लेकिन इन तथ्यों को विवादित नहीं किया। इन परिस्थितियों में हाईकोर्ट ने bail application स्वीकार कर ली। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उसने मामले के merits पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की है।

कब और किस जज ने दिया आदेश?

यह मामला 22 अगस्त 2026 को सामने आया। आदेश Justice Arun Kumar Singh Deshwal की पीठ ने पारित किया। मामले का शीर्षक Shivam Yadav @ Chhotu v. State of U.P. and 3 Others है और इसे 2026 LiveLaw (AB) 611 के रूप में रिपोर्ट किया गया है।

हाईकोर्ट के आदेश का बड़ा संदेश

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी दो महत्वपूर्ण पहलुओं को सामने लाती है। पहला, POCSO Act बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देने वाला कठोर कानून है और इसका प्रभावी इस्तेमाल जरूरी है। दूसरा, किसी व्यक्ति को POCSO के तहत आरोपी बनाने के लिए उम्र से जुड़े दस्तावेज भी विश्वसनीय और सत्यापित होने चाहिए।

अदालत का UP सरकार को guidelines बनाने का निर्देश इसी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और भरोसेमंद बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

साथ ही, यह ध्यान रखना जरूरी है कि हाईकोर्ट ने इस मामले में आरोपी को जमानत दी है; अदालत ने न तो POCSO मामलों में पीड़िताओं के आरोपों को सामान्य रूप से खारिज किया है और न ही मामले के अंतिम merits पर कोई निष्कर्ष दिया है।