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‘मेरिट से कभी समझौता नहीं हो सकता’, मेडिकल फीस रिइम्बर्समेंट योजना में ‘पिक एंड चूज’ पर बॉम्बे हाईकोर्ट नाराज
मेडिकल एडमिशन में मेरिट से खिलवाड़ पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने साफ कहा कि जब कम मेरिट वाले छात्रों को फीस रिइम्बर्समेंट योजना का लाभ दिया गया, तो अधिक मेरिट वाले छात्रों को इससे बाहर नहीं रखा जा सकता। अदालत ने ‘पिक एंड चूज’ नीति को खारिज करते हुए कहा—“मेरिट से कभी समझौता नहीं हो सकता।” मामले में कोर्ट ने अधिकारियों पर ₹50 हजार का exemplary cost भी लगाया।

मुंबई:
मेडिकल कॉलेज में दाखिले जैसी महत्वपूर्ण प्रक्रिया में मेरिट से समझौता किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट ने मेडिकल छात्रों की फीस रिइम्बर्समेंट योजना को लेकर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार की ‘पिक एंड चूज’ नीति पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि यदि कम मेरिट वाले छात्रों को सरकारी योजना का लाभ दिया गया है, तो अधिक मेरिट वाले छात्र को उसी लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। बॉम्बे हाईकोर्ट की जस्टिस किशोर सी. संत और जस्टिस अजित बी. कडेथंकर की डिवीजन बेंच दो मेडिकल छात्रों की याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। छात्रों ने 20 सितंबर 2019 के सरकारी प्रस्ताव (Government Resolution) के तहत फीस रिइम्बर्समेंट का लाभ दिए जाने की मांग की थी।
क्या है पूरा मामला?
20 सितंबर 2019 के सरकारी प्रस्ताव के तहत उन छात्रों को फीस की प्रतिपूर्ति का प्रावधान किया गया था, जिन्हें EWS और SEBC आरक्षण लागू होने के कारण सरकारी या सहायता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों में दाखिला नहीं मिल सका था। ऐसे छात्रों को निजी मेडिकल कॉलेज में सरकारी मेडिकल कॉलेज की फीस से अधिक चुकाई गई राशि की प्रतिपूर्ति का लाभ दिया जाना था। याचिकाकर्ता छात्रों का नाम इस योजना के लाभार्थियों की सूची में शामिल नहीं किया गया। छात्रों ने कोर्ट के सामने यह महत्वपूर्ण तथ्य रखा कि कुछ ऐसे छात्रों को रिइम्बर्समेंट का लाभ दिया गया, जिनकी मेरिट उनसे कम थी।
सरकार ने क्या दलील दी?
राज्य सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता यदि EWS या SEBC आरक्षण लागू नहीं होता, तब भी सरकारी या सहायता प्राप्त मेडिकल कॉलेज में दाखिला हासिल नहीं कर सकते थे। इसलिए उन्हें फीस रिइम्बर्समेंट देने का कोई आधार नहीं था। अधिकारियों ने छात्रों के अलग-अलग मेरिट रैंक के बावजूद दाखिले को सही ठहराने के लिए 70:30 कोटा सिस्टम का भी हवाला दिया।
‘मेरिट से कभी समझौता नहीं हो सकता’
हाईकोर्ट ने राज्य की इस दलील को स्वीकार नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि जब कम मेरिट वाले छात्रों को योजना का लाभ दिया गया है, तो अधिक मेरिट वाले याचिकाकर्ताओं को उसी लाभ से बाहर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मेरिट से कभी समझौता नहीं किया जा सकता और उसे दूसरे पायदान पर नहीं रखा जा सकता। यदि याचिकाकर्ता की मेरिट रैंक बेहतर थी, तो उसे दाखिले अथवा योजना के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने अधिकारियों द्वारा दी गई सफाई को अस्वीकार करते हुए याचिकाकर्ताओं को 20 सितंबर 2019 के सरकारी प्रस्ताव के तहत लाभ देने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने लगाया ₹50 हजार का हर्जाना
मामले में राज्य अधिकारियों के रवैये को देखते हुए हाईकोर्ट ने ₹50,000 का exemplary cost भी लगाया। अदालत की टिप्पणी का मूल संदेश साफ था कि सरकारी योजनाओं को लागू करते समय प्रशासन मनमाने तरीके से लाभार्थियों का चयन नहीं कर सकता। यह फैसला मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता और मेरिट के महत्व को रेखांकित करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि समान परिस्थितियों वाले छात्रों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं किया जा सकता और किसी सरकारी योजना के लाभ के लिए ‘पिक एंड चूज’ की नीति अपनाना उचित नहीं है।
